बुधवार, 29 नवंबर 2017

अभिनंदन

*सुविख्यात कवि शिव कुमार अर्चन और जयप्रकाश श्रीवास्तव का साहित्यकारों ने किया अभिनंदन*

छिन्दवाड़ा। साहित्य जगत में अपनी काव्य प्रतिभा के जरिये देश भर में चर्चित कवि शिव कुमार अर्चन और उनके अनुज जयप्रकाश श्रीवास्तव के छिन्दवाड़ा आगमन पर साहित्यिक संस्थाएं पाठक मंच, मध्यप्रदेश आंचलिक साहित्यकार परिषद, बुंदेलखंड साहित्य परिषद ने अपने संयुक्त तत्वावधान में बुंदेलखंड साहित्य परिषद के अध्यक्ष पी दयाल श्रीवास्तव के सत्यम सुंदरम नगर निवास में काव्य गोष्ठी आयोजन कर उनका साल श्रीफल और स्थानीय साहित्यकारों की काव्य कृतियाँ भेंट करते हुए हार्दिक अभिनंदन किया!

कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ व्यंगकार डॉक्टर कौशल किशोर श्रीवास्तव ने की तथा कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सुविख्यात कवि शिवकुमार अर्चन और विशिष्ट अतिथि जय प्रकाश श्रीवास्तव थे! कार्यक्रम का संचालन मध्यप्रदेश आंचलिक साहित्य परिषद के अध्यक्ष शिव शंकर शुक्ल ने किया !

कार्यक्रम के प्रारम्भ में पाठक मंच के संयोजक युवा कवि विशाल शुक्ल ने अतिथियों का परिचय दिया वहीँ कवि राजेन्द्र यादव ने काव्य गोष्ठि का आगाज करते हुए पहली रचना पढ़ी सूनी है घर की दीवारे सूना घर का कोना कोना! याद हमें आता है अक्सर बूढ़ी माँ का अलग बिछोना कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुये कवि रामलाल सराठे रश्मि ने अपनी रचना पढ़ी!

जय हिंद लिखो यशगान लिखो युगजननी का यशगान लिखो
अभिमान करें सब जनम जनम कवि ऐसा हिंदुस्तान लिखो

ग्रामीण परिवेश के काव्य के माध्यम से चित्रण करते हुए कवि अवधेश तिवारी ने अपनी कविता पढ़ी!

तन्नक सो पैसा मिलो तो खोदन लगे पहाड़
उचकन लगे मेंदरा जैसई आओ असाढ़
करलय वेद पुरान को कोरो सुग्गा पाठ
बेटा अपने ज्ञान खें बैठो बैठो चाट

कवि रमाकांत पांडेय ने अपनी पंक्तियों से ध्यान खींचा

तुम सुरीली तान हिय की मैं अनवरत साधना हूँ
तुम सदा आराध्य मेरे मैं सतत आराधना हूँ
कवि नंद कुमार दीक्षित ने चिंतन देते हुए पढ़ा
मैंने जब भी पूछा हथेलियों से
तुमने कभी गिरे हुए लोगो को उठाया है
किसी व्यक्ति को सहारा दिया है
किसी के आंसुओं को हथेलियों पर सजाया है

युवा कवि विशाल शुक्ल ने अपनी प्रतिनिधि रचना पढ़ी

शत शत नमन तेरे त्याग और साहस को
तेरे कारण काली रात भी उजाली है

राकेश राज ने लोगो का ध्यान खींचा

झूठ छल कपट बन गए जीवन का आधार
अब तो सच्चा प्यार भी बन बैठा व्यापार

बाल कविताओं के जरिये चर्चित कवि पी दयाल श्रीवास्तव ने अपनी कविता से जीने का अंदाज सीखाया

बहुत देर चुप थे जरा गुन गुनाओं
अरे ! भाई थोड़ा हंसो मुस्कराओ

मंच संचालन कर रहे कवि शिव शंकर शुक्ल ने अपने
व्यंग के माध्यम से प्रहार किया

हम शोषक है तुम शोषत हो बात नही बेमानी है
प्रजातंत्र में तुम्ही दूध हो दूध मिले हम पानी है

इस यादगार कार्यक्रम के अंतिम चरण कार्यक्रम अध्यक्ष डॉक्टर कौशल किशोर श्रीवास्तव ने अपनी गजलों और कविताओं से जहाँ मंच को ऊंचाइयां प्रदान की वही कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि जयप्रकाश श्रीवास्तव ने अपने गीत ओ चिड़िया तटों को ना लांघना पढ़कर  कार्यकम को सफलता के सोपान पर चढ़ाया!

कार्यक्रम के अन्तिम कवि के रूप में मुख्य अतिथि कवि शिवकुमार अर्चन ने अपनी व्यंग क्षणिकाओं

जूते में निकली कील
पूछ रही और कितने मील
से बात प्रारम्भ करते हुए अपने सुमधुर  गीतों से समां बाँधा!

आभार प्रदर्शन पी दयाल श्रीवास्तव ने किया!


रविवार, 19 नवंबर 2017

पद्मावती काल्पनिक या ऐतिहासिक पात्र, जानिए सच्चाई

पद्मावती एक काल्पनिक पात्र है या सच्चाई इस बात को लेकर काफी बहस छिड़ी हुई है चूंकि इतिहास मेरे पसंद के  विषयों में से एक है इसलिए मैनें नेट पर उपलब्ध सामग्री और मेरे खुद की लाइब्रेरी में उपलब्ध इतिहास की किताबो में से ये निष्कर्ष निकाला है कि रानी पद्मावती जिन्हें पद्मिनी भी कहते है इनके अस्तित्व में होने का कालघटनाक्रम चित्तौड़ में मिल रहा है । इस बात को हम नकार नही सकते लेकिन  अलाउद्दीन खिलजी जिसने अपने वृद्ध चाचा जो इनके ससुर भी थे, जलालुद्दीन  खिलजी इनकी हत्या की और इनके सिर के टपकते लहू के सामने खुद का राज्याभिषेक कराया। इस अलाउद्दीन ने क्या वाकई पद्मावती को पाने के लिए 1303 में  चितौड़ पर हमला किया था? ये पक्का नही मालूम लेकिन हमला किया चितौड़ पर विजय पाई ये सच है । इसके पहले उसने 1301 में रणथंभौर भी जीता और बाद में 1305 में मांडू भी जीता।

रानी पद्मावती का महल उसका जौहर कुंड सभी के प्रमाण मिल रहे है। इनके पति रतनसिंह मात्र एक साल ईसवी 1302 से 1303 तक राजा रहे । बाद में ये अलाउद्दीन खिलजी के हाथों पराजित हुए। अब सवाल ये है मलिक मुहम्मद जायसी की रचना पद्मावत का काल ईसवी 1520-25 से 1540 के बीच का समय है यानि पद्मावती और पद्मावत रचना के बीच दो सौ साल से ज़्यादा लम्बी अवधि का अंतराल है जो मुहम्मद जायसी को सवालों के घेरे में खड़ा करती है।अब सवाल ये है बरसो बाद मलिक मुहम्मद जायसी को अलाउद्दीन खिलजी रतनसिंह सिंह पद्मावती के बारे में लिखने की प्रेरणा कैसे मिली। कुछ तो प्रमाण जायसी को मिला होगा तब तो वो आगे बढ़ा है । जायसी को अचानक कोई सपना तो नही आया था कि दो सदी से पहले की घटना को महाभारत काल के संजय की दृष्टि से देखे और उनकी कथा को लिख दे। जायसी ने कैसे इसे लिखा इस बात को समझने के लिए हमे अलाउदीन खिलजी की अगली पीढ़ियों की तरफ बढ़ना होगा जिसमे इस वंश के आखिर में खुसरो खां का वध गाजी मलिक यानी गयासुद्दीन तुगलक ने किया। खिलजी वंश में अंतिम व्यक्ति खुसरो खां जो कुतुबुद्दीन मुबारक शाह का प्रधानमंत्री था ये कुतुबुद्दीन मुबारक शाह को मारकर भी खिलजी वंश का शासन चला ही नही पाया और इसी बरस यानि सन 1320 में इसे गाजी मलिक तुरंत मार कर गद्दी पर बैठ गए। और तुगलक वंश की नींव रख दी।

गाजी मलिक यानि गयासुद्दीन तुगलक का काल  1325 तक है ।उसके बाद मोहम्मद बिन तुगलक आया । यही मोहम्मद बिन तुगलक ही वो कड़ी है जिसके काल मे पद्मावती रतनसिंह और अलाउद्दीन की गाथा गायन के रूप में ज़िन्दा थी मोहम्मद बिन तुगलक दिल्ली सल्तनत का सबसे ज़्यादा पढ़ा लिखा विद्वान था वो बहुत बड़ा  कला प्रेमी था संगीत से गहरा लगाव था यहां उसके काल में लगभग 1200 गायक थे वो गणित चिकित्सा, दर्शन शास्त्र व अन्य विषयों का विद्वान था ये बात और है उसने दो निर्णय युक्तिपूर्ण नही लिए इसलिए उसे सनकी राजा या मूर्ख बुद्धिमान कहा जाता है पहला उसने अपनी राजधानी का नाम बदलकर दौलताबाद बदला दूसरा मुद्रा के सम्बंध में था l जो उसकी सनक को घोषित करता था।लेकिन ये सच है मुहम्मद बिन तुग़लक़ संगीत का बहुत बड़ा प्रेमी था। इसके बाद उसका चचेरा भाई फिरोज़ शाह तुगलक जो बाद में गद्दी पर बैठा ये तुगलक भी संगीत प्रेमी था है  ये राजा जब सिंहासन पर बैठते तो, जन-साधारण के लिए 21 दिनों तक लगातार  संगीत गोष्ठी का प्रबन्ध किया जाता था।

खुद अलाउद्दीन खिलजी के समय संगीत बहुत ज़्यादा पोषित सम्पन्न विस्तारित था  उसके बाद तुगलक वंश में  गयासुद्दीन तुगलक को छोड़कर संगीत का अस्तित्व आगे बढ़ रहा था ये संगीत ही इस बाद का प्रमाण है कि अलाउद्दीन पद्मावती और रतन सिंह की दासता गान में उपलब्ध थी वरना मुहम्मद जायसी को लिखने के लिये ये सबूत कहाँ से मिलते। यहाँ हमें ये प्रमाण मिल रहे है कि संगीत गायक उस समय भक्ति, राजा महाराजा की वीरता, उनकी प्रेम कथाओं या अन्य चर्चित प्रेमकथाएँ या प्रकृति के चित्रण का गायन में अनुसरण करते थे। तुगलक वंश सन 1414 तक था । अब इस क्षेत्र में और आगे बढ़े तो सैयद वंश आया है जिसने बहुत ज़्यादा उपलब्धि हासिल नही की । ये वंश 1451 तक चला फिर बहलोल लोधी ने लोधी वंश की स्थापना की। लोधी वंश में संगीत बहुत ज़्यादा सक्रिय रहा है, यानि अलाउद्दीन खिलजी पद्मावती की गाथा को आगे बढ़ने का पूरा अवसर मिला 1526 में बाबर ने इब्राहिम लोधी को हराकर मुग़ल वंश की नींव रख दी। मुहम्मद जायसी की रचना के प्रमाण सन लगभगसन 1520 -25से लेकर 1540 के बीच के समय के मिल रहे है और मलिक मुहम्मद जायसी की रचना पद्मावत में शेरशाह सूरी की तारीफ भी हुई है यानि जायसी आरंभ से शेरशाह के साथ रहा और शेरशाह सूरी बाबर के साथ रहा है। सूरी 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई बाबर की सेना में एक सैनिक था 1530 तक बाबर का शासन था फिर उसके बेटे हुमायूँ का शासनकाल आया। अब सन 1540 की बात करे जब पद्मावत की रचना अस्तित्व में आई। उस समय शेरशाह सूरी के साथ मुहम्मद जायसी की उपस्थिति मिल रही है साथ ही उसके शेरशाह सूरी के प्रति वफ़ादार होने के प्रमाण भी मिल रहे है। इस पद्मावत के भीतर शेरशाह सूरी की प्रशंसा भी शामिल है।कुछ विद्वान प्रमाण के आधार पर ये माने कि पद्मावत का लेखन कार्य 1540 के बहुत  पहले  हो चुका था तो सही लगता है। मोहम्मद जायसी भी शेरशाह सूरी का वफादार था वरना एकदम से सन1540 में शेरशाह सूरी का दिल्ली सल्तनत पर बैठना और जायसी का पद्मावत तुरंत लिख लेना सम्भव नही है।साथ ही इस बात के प्रमाण भी मिल रहे है शेरशाह सूरी की नज़र दिल्ली पर सिहांसन पर घात लगाने की बरसों पहले से थी वो बस हुमायूँ के लापरवाह होने का इंतज़ार कर रहा था और ये बात जायसी भी जानते था तभी तो वह अपनी रचना पद्मावत  का श्रेय  शेरशाह के शासन काल को देना चाहते थे।यानी ये निश्चित था 1540 से पहले से पद्ममावत लिखी जा रही थी या लिखी जा चुकी थी बस मुगलवंश के पतन का अवसर तलाशा जा रहा था। जायसी अपनी कृति पद्मावत मुग़लो को भी समर्पित कर सकता था पर वो तो सूरी का वफादार था। शेरशाह सूरी की ताकत 1537 से उजागर होने लगी थी। 1540 में उसने  हुमायूँ को हराया दिल्ली छोड़ने को मजबूर कर दिया। और 1540 में शेरशाह सूरी और मलिक मुहम्मद  जायसी दोनों पर्दे के पीछे से निकलकर एकदम सामने आ गए और 1540 में पद्मावत कृति पर  प्रमाणिकता की मुहर लग गयी ।

यहां एक और शब्द है मलिक,,, अलाउद्दीन खिलजी  के समय मलिक काफूर साथ था। इन मलिकों को अलाउद्दीन अपने चाचा को मौत के घाट उतारने के लिए लाया था। उसके समय मलिक सैनिक या सेनापति को कहते थे।
खिलजी वंश के बाद तुगलक वंश आया और इसका संस्थापक गयासुद्दीन तुगलक का नाम पहले गाजी मलिक ही तो था। मुहम्मद जायसी भी मलिक थे यानि मलिक पहले से ही किसी प्रभावी राजा के साथ चल रहे थे। इस आधार पर ये भी तो हो सकता है ये पद्मावत किसी अन्य मलिक की रचना रही हो और शेरशाह सूरी के वफादार होने के कारण 1540 में इसने इस कृति से मूल मलिक को हटाकर अपना नाम दे दिया  या उसकी कृति के आधार पर पद्मावत लिख ली ।क्योकि 1542 में मुहम्मद जायसी की मृत्यु हो चुकी है औरउसके नाम 21 रचनाओं का उल्लेख है ।लेकिन जायसी पद्मावत से प्रसिद्ध हुआ क्यो?पहले से प्रसिद्ध क्यो नही हुआ ।21 रचनाओं में उसने अगर 1540 के पहले भी लिखा हो तो उसके प्रसिद्धि के प्रमाण पद्मावत से पहले क्यो नही मिल रहे है,,यदि हम दिल्ली सल्तनत के इतिहास पर नज़र डालें तो तुगलक वंश के फिरोज शाह तुगलक के समय घूस ख़ोरी और भ्रष्टाचारी शुरू हो चुकी थी।तो हो सकता है शेरशाह सूरी के समय भी भ्रष्टाचार व्याप्त हो।

जो भी हो ये सच है पद्मावती इतिहास के पन्नो में उपस्थित थी वो काल्पनिक नही थी।

शोध कर्ता---
रेडियो ऑडियो प्रोड्यूसर, एंकर ,नाट्यकर्मी,लेखिका
गीतांजलि गीत
20-11-2017


शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

सती प्रथा : समाज ने स्त्रियों पर जबरन थोपी कुप्रथा

जब इब्नबतूता मप्र के धार में बेहोश हुआ----

फ़िल्म पद्मावती के लिए मच रहे बवाल से मुझे याद आया। मैंने कॉलेज लाइफ में  एक लाइब्रेरी से निकाली किताब में अफ्रीकी मोररको यात्री इब्नबतूता के बारे में पढ़ा था ।कुछ रोचक या दिमाग को झकझोरने वाली बातें दिमाग मे रह जाती है उस इतिहास लेखक ने विदेशी यात्रियों से सम्बंधित इस क़िताब में लिखा था कि इब्नबतूताने भारत यात्रा के दौरान अपनी किताब में सती प्रथा का वर्णन किया है।उसने राजस्थान की यात्रा के समय साथ ही  मध्यप्रदेश के कुछ जिलों जिसमे धार छतरपुर जिलों की यात्रा का वर्णन  किया है।

    अपनी युवावस्था के आरंभिक काल मे इब्नबतूता ने मध्यप्रदेश के धार जिले में जब सती प्रथा को पहली बार अपनी आंखों के सामने देखा कि किस तरह वो महिला जो  सती  होने वाली है वह एक हाथ मे नारियल और एक हाथ में दर्पण पकड़कर  घोड़े पर सवार होकर सती स्थल की ओर बढ़ रही है चारों तरफ ढोल नगाड़ों का बहुत ज्यादा शोर है  वो पूर्ण श्रृंगार में एक हाथ मे थामे दर्पण में अपने रूप को देखते हुए आगे बढ़ रही है सती स्थल के चारों के ओर दस बारह लोग जलती हुई पतली लकड़ी थामे खड़े है उसे आग में झोंकने से पहले उसके शरीर पर कम्बल जैसा मोटा कपड़ा ओढ़ाया गया है।

इब्नबतूता ने वर्णन किया है उस समय वो स्त्री चीखे तो भी उसकी आवाज़ ढोल नगाड़ों शहनाई की आवाज़ में दब जाती है ।

इब्नबतूता ने जब यह दृश्य देखा तो इतना घबरा गया था कि बेहोश होकर गिर पड़ा। उसके मित्र ने उसके चेहरे पर पानी डालकर उसे उठाया था।

इब्नबतूता ने उस वक्त सतीप्रथा के द्वारा यहां के क्रूर  कठोर मानसिकता की आलोचना की है।

मित्रो थोड़ा इस बात पर गौर कीजिए यहां के मुग़ल बादशाह इतने ताकतवर रहे है फिर उन्होंने इस कुप्रथा को रोकने के लिए कदम क्यों नहीं उठाए सदियों ये प्रथा यहां कायम रही आश्चर्य है!

इसके पीछे ये तर्क मिलता है एक औरत किसी की कुदृष्टि का शिकार न होने पाए इसलिए सतीप्रथा की शुरुआत हुई है।

यहां पर ये तर्क सामने आए कि औरत खुद जाकर सती हो गयी और इस सती होने की क्रिया में उसने व्यवस्था भी ख़ुद की है तो ये मान लिया जाए वो अपने पति से बहुत प्रेम करती थी इसलिए उसने ऐसा किया ये उसकी अपनी मानसिकता है।

लेकिन इस सती प्रक्रिया की तैयारी उस काल में पुरुष वर्ग कर रहा है तो निंदनीय है

क्या उस समय वो इतना कमजोर था कि एक औरत की रक्षा नहीं कर सकता था?

उसके पास एक औरत पर अत्याचार करने के लिए भीड़ जुटाने के लिए ताकत है वहाँ वो कमज़ोर नहीं है आश्चर्य?
यहां मैं तारीफ करूँगी कट्टर कहे जाने वाले मुग़ल बादशाह औरंगजेब की जिसने पहली बार ये कदम उठाया कि सती प्रथा बन्द हो। अगर उस समय मीडिया सशक्त होता तो इस दिशा मे औरंगजेब कामयाब हो जाता ये निश्चित था लेकिन मुग़ल बादशाहों में वो अकेला बादशाह है,
जिसने ये कदम उठाया बहुत बाद  में  राजा राममोहन राय  ने इस दिशा में जो सराहनीय कार्य किया वो प्रशंसनीय है।

अब आगामी फिल्म पद्मावती में संजय लीला भंसाली जी क्या कहने जा रहे है किस उद्देश्य को लेकर उन्होंने फ़िल्म बनाई है ये उसे देखने के बाद ही पता चलेगा।सुनी सुनाई बाते जो आधी झूठ होती है उस पर पहले से कैसे अपनी प्रतिक्रिया दे दे?

साभार फेसबुक : https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1183941068404847&id=100003668967648

गीतांजलि गीत 18-11-2017


रविवार, 12 नवंबर 2017

आकाशवाणी छिंदवाड़ा : एनाउंसर गीतांजलि गीत के संस्मरण

फैन तो फैन होते है चाहे वो पुराने हो या नए। रामकृष्णा जी एक श्रोता के रूप में आप उत्कृष्ट श्रोता रहे है। आपके पोस्टकार्ड की लिखावट आज भी मुझे याद है। ओपी जी भी पत्र लिखते थे और उनसे फोन इन कार्यक्रम में भी मेरी बातचीत हुई है। मेरे लिए ये सुखद है कि आज मीडिया के क्षेत्र में आप दोनों सफल है। ओपी जी को तो मैंने उनकी आवाज़ को और तराशने की सलाह दी है क्योंकि कुदरत ने उन्हें भी अच्छी आवाज़ दी है। आप दोनों को असीम शुभकामनाएं।
कवयित्री गीतांजलि गीत जी के साथ ओपी पवार
रामकृष्णा जी,

आपकी बात से मुझे और किस्से याद आ गए, जिसमें से दो किस्से मैं साझा करूँगी। पहला किस्सा लगभग 10 साल पुराना है। आपके एरिया  में किसान वाणी कंपेयर नरेन्द्र शक्रवार जी रिकॉर्डिंग के लिए गए थे। उन्हें लौटते समय बस में एक नेत्रहीन व्यक्ति उमरानाला के पास मिला। वे यात्रियों को गाने सुनाकर भीख मांगकर अपना जीवन यापन किया करते थे। वो रेडियो सुना करते थे। तब उसने नरेंद्र भाई से मेरे बारे में पूछताछ शुरू कर दी और ये बताया कि वो मेरा बहुत ज़्यादा फेन है।

नरेंद्र भाई मुझे किस्सा सुनाते हुए बोलते है  अच्छा हुआ बहना उन्हें मैंने आपके घर का पता नहीं बताया। नहीें तो वे लाठी टेकते हुए आपके घर पहुंच जाते। आपके घर वाले परेशान हो जाते।

एक और किस्सा है जिसे शासकीय शिक्षा विभाग की प्राइमरी स्कूल की प्रधान पाठिका श्रीमती रजनी साहू ने मुझसे शेयर किया। वो अपने किसी परिचिता से मिलने हॉस्पिटल गयी थी। उनकी परिचिता ने एक शिशु को बेटे के रूप में जन्म दिया था। वही सामने एक बेटी को जन्म देने वाली मां का भी पलँग था। उस बेटी के पापा उस बच्ची को गोद मे खिला रहे थे और उसे गीतांजलि  नाम से संबोधित कर रहे थे। तब आवाज़ सुनकर रजनी जी ने कहा अरे वाह आपने इसका नामकरण भी कर दिया तब उन्होंने कहा मैंने इसका पूरा नाम गीतांजलि गीत रखा है। और मैं रेडियो पर बोलने वाली गीतांजलि गीत जी का बहुत बड़ा फैन हूँ। इसलिए इसका नाम भी  यही रखा है।

रजनी जी ने पूछा- क्या आप कभी उनसे मिले हो। उन्होंने कहा-नही मैं उनसे कभी नही मिला हूँ। जब रजनी जी ने मुझसे मिलकर ये किस्सा सुनाया, तब खुद की अहमियत समझ आई  और यही कारण है कि अनजान चेहरों के प्यार स्नेह ने ही मेरी स्क्रिप्ट लेखन को आत्मीयता का रंग दिया।

आप लोग तो प्रत्यक्ष रूप से लिखकर अपनी भावनाएं प्रकट कर लेते थे लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से जिन श्रोताओ का स्नेह साथ रहा और साथ है वो भी यादगर पल है जो सदा साथ रहेंगे।

फैन तो फैन होते है चाहे वो पुराने हो या नए। रामकृष्णा जी एक श्रोता के रूप में आप उत्कृष्ट श्रोता रहे है। आपके पोस्टकार्ड की लिखावट आज भी मुझे याद है। ओपी जी भी पत्र लिखते थे और उनसे फोन इन कार्यक्रम में भी मेरी बातचीत हुई है। मेरे लिए ये सुखद है कि आज मीडिया के क्षेत्र में आप दोनों सफल है। ओपी जी को तो मैंने उनकी आवाज़ को और तराशने की सलाह दी है क्योंकि कुदरत ने उन्हें भी अच्छी आवाज़ दी है। आप दोनों को असीम शुभकामनाएं।


ओपी पवार की फेसबुक पोस्ट 
उस दौर में जब मल्टीमीडिया जैसे साधन नहीं थे... तब रेडियो की आवाज ही मनोरंजन और सूचना का माध्यम हुआ करती थी.... और उसमें भी ऐसी मधुर आवाजें जिनका रोज इंतज़ार रहता था... ऐसी ही एक फ़नकार Geetanjali Geet मैम... आकाशवाणी केंद्र #छिंदवाड़ा से आज भी आपकी आवाज किसी पहचान की मोहताज नहीं है....बचपन में रेडियो कार्यक्रमों के लिए मैं चिट्ठियां लिखा करता था... कई बार तो कौन पढ़ेगा ये भी लिखकर भेजता था ... जिसमें #गीतांजलि #मैम का नाम पहले होता था... इस बार घर आया तो संयोगवश हुई ये मुलाकात हमेशा यादगार रहेगी... आपके अनुभव का पिटारा काफी बड़ा है... मार्गदर्शन और स्नेह हमेशा मिलता रहे.

नोट- 11 नवंबर 2017 को भाई ओमप्रकाश पवार के फेसबुक पोस्ट और उस कमेंट पर आधारित लेख। गीतांजलि गीत जी जानी मानी कवयित्री भी है। लेकिन उनकी पहचान आकाशवाणी छिंदवाड़ा की मशहूर एनाउंसर यानी आरजे से सबसे ज्यादा है। उनकी आवाज के जादू को शब्दों में बयां कर पाना मुमकिन नहीं है।  

बुधवार, 8 नवंबर 2017

श्रद्धांजलि : बिना बहीखाता पढ़ाते थे स्वर्गीय डीएस बोरीकर सर

राष्ट्रीय विज्ञान प्रदर्शनी 2003 में सम्मान समारोह के दौरान दाएं से दूसरे स्थान पर स्वर्गीय बोरीकर सर। साथ में वाडिया सर, गंगवार मेडम, दिनेश डिगरसे और पंकज चौधरी । 

स्वर्गीय श्री डीएस बोरीकर सेनि शिक्षक (दाएं से दूसरे स्थान पर) शाउमा वि उमरानाला में बतौर वाणिज्य के व्याख्याता व प्रभारी प्राचार्य रहे। गांव की तीन पीढ़ियों ने उनसे शिक्षा प्राप्त की।

मेरे परिवार में मेरे पिता, भाई व मातृकुल से मामा-मौसी ने भी उनसे पढ़ा। श्री बोरीकर सर को विद्यालय में अनुशासन के प्रतीक रूप में जाना जाता रहा है। बिना किताब अकाउंटस, बहीखाता पढ़ाने वाले बोरीकर सर जिन्हें पूरी किताब रटी थी वे इसी विद्यालय मे पढ़े और यहीं से सेवानिवृत्त हुए।

उमरानाला से उनका खास लगाव था। वर्ष 2003 में जब  मैंने राष्ट्रीय विज्ञान प्रदर्शनी में प्रतिभागिता की तब उस हेतु आयोजित सम्मान समारोह में श्री बोरीकर सर भी उपस्थित थे, यह मेरे लिए गौरवान्वित होने का क्षण रहा है।

आज वह वाणिज्य का महारथी अपनी भू-लोक की यात्रा को विराम दे, एक नई यात्रा पर चल पड़ा है। उनका इस संसार से विदा होना शिक्षा जगत में भारी क्षति है।

बताते हुए गर्व महसूस होता है कि सर सेवानिवृत्त होकर भी शिक्षा का ज्ञान प्रसारित करने में पीछे ना रहें वे निरंतर पढ़ाते रहे, गांगीवाड़ा के एक विद्यालय में वे बतौर मेहमान शिक्षक के तौर पर एवं घर में भी पढ़ाते रहे।

मेरे गांव के वरिष्ठ नागरिक और बोरीकर सर के मित्र दादा रामाजी खापरे (69) ने सर के दिव्यलोक प्रस्थान पर गहरे दु:खद शब्दों में कहा "मेरा एक अच्छा दोस्त भी आज चला गया, स्कूल के समय से आज यह समय कैसे आ गया पता ही ना चला। "

(इन शब्दों के साथ स्वर्गीय बोरीकर सर को श्रद्धांजलि अर्पित की है, उनके छात्र और शिक्षक पंकज चौधरी ने)