गुरुवार, 5 अक्तूबर 2017

श्रद्धांजलि मोहनलाल पवार जी : किसी को भी मंजूर नहीं था उनका ऎसे अचानक चले जाना

स्व. श्री मोहनलाल पवार का पूरा घर ही वसुधैव कुटुम्बकम था -

पापा बहुत अच्छे इंसान थे अंकल। पापा के बिना अब हमारा जीवन अधूरा रहेगा। पापा आप हमें छोड़ कर जा रहे हैं। पापा आप अच्छे से रहना। प्रियंका और दीपिका बार बार अपने पापा को याद कर अपनी आखों में आंसू भरकर रो रही थी। मन में लग रहा था वे पिता  कितने दुर्भाग्य शाली होते होंगे जिनकी अंतिम विदाई पर कोई दो आंसू भी नहीं बहाते होंगे। क्योंकि आजकर बेटी तो विलुप्त प्रजाति में गिनी जाने लगी है। चित्तोड़ काम्प्लेक्स एम् पी नगर भोपाल से श्री मोहन लाल पवार जी को अंतिम विदाई देते समय सबके चेहरे बुझे और डरे सहमे से थे।

छोटे बड़े, महिला, पुरुष, घर, परिवार, रिश्तेदा, समाज, मोहल्ले, कार्यालय, विभाग के लोग बड़ी संख्या में  श्री  मोहन लाल पवार खरफूसेजी को अंतिम विदाई देने  एकत्रित थे। श्री मोहनलाल पवार जी लोक निर्माण विभाग के प्रमुख के निज सहायक थे। सदैव चेहरे पर मुस्कराहट और ख़ुशी के भाव उनके धार्मिक और आध्यात्मिक स्वभाव के साथ साथ ईश्वर में उनकी गहरी आस्था के द्योतक थे।

सुखवाड़ा को उन्होंने लोक निर्माण विभाग की मासिक पत्रिका बना दिया था। विभाग के साथी सुखवाड़ा के अंकों का इंतज़ार किया करते थे और पढ़ते भी थे। सदैव अंकों पर उनकी सटीक और सार्थक प्रतिक्रिया भी आया करती थी।

श्री पवार जी का पूरा जीवन ही शिक्षाप्रद था। उन्होंने अपने घर को शिक्षालय बनाकर रखा था। अपने परिचितों अपने रिश्तेदारों के बच्चों को अपने घर पर उच्च शिक्षा हेतु आश्रय देना और चार पांच साल तक उन्हें बिना किसी शिकवा शिकायत के उच्च शिक्षा प्राप्त करने तक और नौकरी लगने तक सहारा देना अपने आप में एक चुनौती होता है। श्री पवार के  चाहने वालों में समाज से ज्यादा गैर समाज के लोग ज्यादा थे। समाज के बहुत कम लोग श्री पवार की बहुमुखी प्रतिभा से परिचित थे। श्री पवार के घर पर हर शनिवार को सुन्दर कांड का संगीतमय पाठ हुआ करता था। वे एक अच्छे मंच संचालक थे। अच्छे पाठक थे और अच्छे समीक्षक भी थे। वे एक अच्छे गीतकार संगीतकार भी थे।

श्री पवार का अपने परिचितों में कितना सम्म्मान था यह इस बात से ही पता चलता है कि उनके  विभाग के एक सज्जन श्री श्रीवास्तव जी द्वारा स्वेच्छा से श्री पवारजी की छोटी बेटी के फलदान का पूरा व्यय वहन किया गया था। श्री पवारजी भी सिवनी के श्रीवास्तव जी को अपनी बेटी मानते थे और उसके विवाह अवसर पर उपस्थित रहकर उन्होंने पिता के दायित्व बोध का परिचय भी दिया था।

श्री पवार जी सदैव सामाजिक कार्यक्रमों में बढ़  चढ़ कर सहभागिता किया करते थे।  भोपाल में समाज के लिए सागोनी कलां रायसेन रोड में जो भूखंड लिया गया उसमें श्री पवार जी की अहम् भूमिका रही है। समाज के बहुत काम लोग इनकी इस भूमिका से परिचित है।

श्री पवार को अंतिम विदाई देते समय ऐसा लग रहा था जैसे कोई अपना सगा हमसे बिछुड़ रहा हो। यह मेरे प्रति उनके सम्मान भावना का ही प्रतिफल प्रतीत होता है। हम श्मशान तक तो श्री पवार जी के साथ थे पर आगे की यात्रा उनको ही तय करनी थी। भगवान् उनकी आगे की यात्रा को सफल व् शुभ बनाये। उनकी दिवंगत आत्मा को शांति व् मुक्ति प्रदान करे। परिजनों को इस आकस्मिक दुःख को सहन करने और इससे उबरने की शक्ति प्रदान करे।

कहते है अच्छे इंसान की ऊपर वाले को भी जरुरत पड़ती है,इसलिए ऊपर वाला अच्छे इंसान को समय पूर्व अपने पास बुला लेता है। शायद श्री पवारजी का इस तरह समय पूर्व चले जाना यही प्रमाणित करता है।

सादर नमन पवारजी।

मिथिलेश पवार ने दिया साहस का  परिचय, पिता की मृत्यु पर केवल श्रृद्धांजलि

भोपाल। श्री मिथिलेश पवार द्वारा अपने पिता श्री मोहनलाल पवार खरफूसे गोनी निवासी बिछुआ जिला छिंदवाड़ा के आकस्मिक निधन पर केवल श्रृद्धांजलि का आयोजन कर मृत्युभोज जैसी कुरीति को तोड़ने का साहस दिखाकर एक सार्थक और सटीक सन्देश समाज को देने का प्रयास किया गया है।

पिता की आकस्मिक मृत्यु के अथाह दुःख की स्थिति में भी श्री मिथिलेश द्वारा उठाया गया यह कदम अनुकरणीय है। उसे इस दुःख की  घडी में सम्बल प्रदान करने और सही निर्णय लेने में उसकी दोनों बहनें दीपिका और प्रियंका तथा  दोनों दामादों सुनील रावत और विजय घागरे का पूरा सहयोग और समर्थन  मिला। माता अनुसुइया द्वारा भी सहमति जताई गई।

स्व. श्री मोहनलाल खरफूसे (पवार जी)
उल्लेखनीय है कि स्व.  श्री मोहनलाल पवार जी कभी भी मृत्यु भोज के पक्ष में नहीं रहे। अपने परिजनों के  इस निर्णय और कदम से निश्चित ही उनकी आत्मा को शांति मिलेगी।

सुखवाड़ा, सतपुड़ा संस्कृति संस्थान संस्थान, भोपाल


मंगलवार, 7 फ़रवरी 2017

अरशद को सुनिए वीडियो एलबम "जिंदगी खूबसूरत है" में

मोहगांव हवेली के मूल निवासी अरशद अली इन दिनों मुंबई में कार्यरत है। वे पढ़ने लिखने में भी रुचि रखते हैं।
वीडियो एलबम "जिंदगी खूबसूरत है" में सुनिए छिंदवाड़ा जिले के युवा चेहरे अरशद अली को 

गौतमी ने किया कमाल, महज 18 साल में बनीं लीडिंग ऑथर



अपने चाचा डॉ. दीपक आचार्य के साथ गौतमी।
छिंदवाड़ा . अभी तक आमतौर पर पीएचडी शोधार्थी द्वारा ही शोधपत्र पढऩा देखने और सुनने में आया होगा, लेकिन छिंदवाड़ा की एक छात्रा ने बगैर पीएचडी शोधार्थी के ऐसा किया है। वह भी उस छात्रा ने अपना शोधपत्र किसी आम साइंस सेमिनार में नहीं बल्कि गुजरात साइंस कांग्रेस में पढ़कर पूरे जिले को गौरवान्वित किया है।
हम बात कर रहे हैं छिंदवाड़ा में पली-बढ़ी गौतमी आचार्य की। बीते वर्ष गौतमी ने विद्या भूमि पब्लिक स्कूल से बायोलॉजी विषय में हायर सेकंडरी प्रथम श्रेणी में पास किया और वर्तमान में गुजरात के अहमदाबाद में लाइफ साइंसेस विषय के साथ अहमदाबाद यूनिवर्सिटी से इंटीग्रेटेड एमएससी का कोर्स कर रही हैं। इस समय वे दूसरे सेमेस्टर में हैं।
पूरी तरह से रिसर्च से जुड़े इस पाठ्यक्रम में गौतमी का चयन राष्ट्रीय चयन प्रतिस्पर्धा से हुआ है। महज 18 वर्ष की आयु में इतने बड़े विज्ञान महोत्सव में गौतमी को वक्तव्य और अपने विषय इरिटेबल बाउल सिंड्रोम पर जानकारी देने का मौका मिला जो समस्त छिंदवाड़ा वासियों के लिए हर्ष और गौरव का विषय है। चार और पांच फरवरी को पंडित दीनदयाल पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी, गांधीनगर में आयोजित इस कांग्रेस के दौरान प्रकाशित जर्नल में गौतमी के रिसर्च पेपर को भी स्थान दिया गया है। जिसमें वे लीडिंग ऑथर हैं। सामान्यत: इस तरह के शोध प्रकाशन के लिए पीएचडी शोधार्थी होना जरूरी होता है लेकिन गौतमी के शोधकार्य को चयनित किया जाना बड़ी उपलब्धि है।

जिले को नई पहचान दिलाना है उद्देश्य
गौतमी के पिता विजय आचार्य छिंदवाड़ा जिले में शिक्षा विभाग से सम्बद्ध हैं और माता अनामिका आचार्य गृहिणी हैं। गौतमी वैज्ञानिक बनना चाहती है और अपना प्रेरणा स्रोत अपने चाचा डॉ. दीपक आचार्य को मानती हैं और उनके पदचिह्नों पर चलते हुए जिले को नई पहचान दिलाना चाहती है।

कुकिंग की शौकीन गौतमी
गौतमी को गाने सुनना, टीवी पर कुकिंग शो देखना, फैमिली के साथ ट्रेवल और दोस्तों के साथ गपशप करना बहुत पसंद है। ज्यादातर वक्तअपने लैपटॉप पर पढ़ाई लिखाई करते हुए गुजारती है।

2017-02-07, पत्रिका डॉट कॉम

सोमवार, 2 जनवरी 2017

शाबास शिवानी : रेसलर शिवानी के सफर की कुछ तस्वीरें


 एक साथ पढ़ी चारों खिलाड़ी गई थी तुर्की

मध्यप्रदेश मार्शल आर्ट कुश्ती अकादमी की चार पहलवान लड़कियों की खास बात यह है कि वे चारों एक साथ पढ़ी। एक ही कोच से प्रशिक्षण लिया। एक साथ स्कूल वर्ल्ड गेम्स के लिए भोपाल की तरफ से पहली बार क्वालिफाई किया। टर्की में जुलाई 2016 में हुई इस प्रतियोगिता में इन छात्राओं में से दो ने क्रमश:रजत एवं कांस्य पदक जीते थे। शिवानी पवार ने रजत पदक जीता तो रमन यादव ने कांस्य। दो अन्य ज्योति सरेआम एवं गेशू ने उम्दा प्रदर्शन किया था। शिवानी जूनियर नेशनल चैंपियनशिप में भी सिल्वर मेडल जीत चुकी हैं।

भारतीय टीम की फीमेल कोच भी रही हैं मोनिका 

कोच मोनिका चौधरी और साथी खिलाड़ियों के साथ शिवानी
चारों बालिका पहलवानों की कोच मोनिका चौधरी हैं। वह वर्ष 2007 से 2014 तक भारतीय महिला टीम की इकलौती फीमेल कोच भी रह चुकी हैं। उन्होंने नेशनल कुश्ती में सिल्वर मेडल भी जीता है। उनके द्वारा प्रशिक्षित खिलाड़ियों ने कई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पदक जीते हैं। साईं एकेडमी पंजाब में भी वह कोच रह चुकी हैं।



साथी खिलाड़ियों के साथ शिवानी पवार।
कोच और साथी खिलाड़ियों के साथ शिवानी।


शाबास शिवानी : हमारी छाेरियां भी नहीं हैं छोरों से कम...

छिंदवाड़ा .अगर आपने फिल्म दंगल देखी है तो अभिनेता आमिर खान द्वारा बेटियों के लिए कहा गया संवाद जरूर याद होगा। जिसमें चार बेटियों से निराश पिता की चेतना जागती है तो कहता है कि हमारी छोरियां क्या छोरों से कम हैं । फिल्म का यह डायलॉग वास्तविक रूप में अब लोगों को प्रेरित करने लगा है। हालांकि छिंदवाड़ा में ऐसे भी एक पिता हैं जिन्होंने बेटियों के रेसलिंग में जाने के मन को भा लिया और पूरा परिवार मिलकर उनका सपोर्ट कर रहा है।
दो बहनें अपने सपनों को पंख लगाने में जुट गई हैं। एक ने तो शुरुआत करते हुए प्रतिभा का लोहा भी मनवा दिया है। हम बात कर रहे हैं छिंदवाड़ा जिले के उमरेठ कस्बे की पहलवान शिवानी पवार की। जिनके पिता किसान हैं। कहते हैं कि हमारी बेटियां, बेटों से कम नहीं। शिवानी ने दसवीं तक की पढ़ाई उमरेठ से करने के बाद इन दिनों भोपाल के नूतन कॉलेज से बीए की पढ़ाई कर रही हैं। तुर्की में हुए स्कूल वल्र्ड गेम में उन्होंने सिल्वर मेडल जीता था।
ओलम्पिक में मेडल जीतने की चाह: शिवानी पवार
पहलवान शिवानी पवार
पहलवान बनने का सपना कब देखा।
बचपन में सिर्फ पढ़ाई करती थी।थोड़ी बड़ी होने के बाद समर कैम्प में फुटबाल खेला। फिर एथलेटिक्स। कुछ माह बाद रेसलिंग का ट्रायल दिया। उसमें सलेक्ट होने के बाद मध्यप्रदेश मार्शल आर्ट कुश्ती अकादमी में प्रवेश मिल गया।
कुश्ती की प्रैक्टिस के बारे में कुछ बताइए।
एमपी स्पोर्टस एकेडमी में कोच मोनिका चौधरी और साथी खिलाडिय़ों के साथ हम यहां अच्छी प्रैक्टिस करते हैं। पिछले कुछ सालों में सागर, रीवा और इंदौर में कई मेडल जीते हैं। जनवरी में पटना में आयोजित जूनियर नेशनल कॉम्पीटिशन में भी गोल्ड मेडल जीतने का लक्ष्य है। मेरी कोशिश है ओलम्पिक तक जाने की। साक्षी मलिक की तरह मुझे भी मेडल लेकर आना है।
अपनी कामयाबी के सफर में किसे खास मानती हो।
 मेरे परिवार से पिता नंदलाल पवार, माता पुष्पा पवार और दादाजी रघुनंदन पवार ने हमेशा मुझे सपोर्ट किया। मेरे मामा रवि पवार कोयला खदान में कर्मचारी है। वे बहुत हेल्प करते हैं। इसके अलावा कोच कलसराम मर्सकोले, कोच फातिमा बानो, मोनिका चौधरी, विनय प्रजापति का खास योगदान रहा है।
बहन रतिका भी कुश्ती में सक्रिय
शिवानी की छोटी बहन रितिका अभी कक्षा 10वीं में अध्ययनरत हंै। वह भी अपनी बड़ी बहन की तरह कुश्ती में ही कॅरियर बनाना चाहती है। शिवानी जहां पिछले तीन साल से कुश्ती में सहभागिता कर रही हैं, वहीं रितिका को एक साल हो गया है।

और भी लड़कियां कुश्ती में आए। क्या संदेश देना चाहेंगी।
मेरा मानना है कि लड़कियां हर काम कर सकती हैं। वे फिजिकली लड़कों से कमजोर होती है यह सोचना गलत है। वे हर जगह लड़कों से अच्छा प्रदर्शन करती है। पढ़ाई हो या खेल। इसलिए लड़कियों को भी पहलवानी जैसे गेम्स भी हाथ आजमाना चाहिए।

जब अपनी प्रतिद्वंद्वी को पहले पटकनी दी, फिर मरहम लगाया
पत्रिका छिंदवाड़ा, 2 जनवरी, 2017
पिछले दिनों सागर में आयोजित राज्यस्तरीय कुश्ती प्रतियोगिता में 48 किग्रा वर्ग के फाइनल मुकाबले में खेल भावना की मिसाल देखने को मिली। यह मुकाबला भोपाल की शिवानी पवार एवं जयारानी के बीच हुआ। शिवानी के जोरदार दांव से जया चित हो गईं। इस बीच जया को पेट के पास चोट लग गई। जब जया दर्द से कराह उठीं, तो उनकी मदद शिवानी ने ही की। शिवानी पांच मिनट तक जया की चोट को ठीक करने का प्रयास करती रहीं। खेल के मैदान में ऐसा नजारा कम ही देखने को मिलता है।
साभार : पत्रिका छिंदवाड़ा