बुधवार, 24 दिसंबर 2008

Kahini Ghosh, wildlife film director and producer


Kahini Ghosh
Our film - Wild Saga of Corbett - was launched in Corbett National Park on August 23, 2008। The 35 mins travel film aims to orient a tourist before his arrival in the park.

MLA Deewan Singh Bisth is seen unweiling the DVD of Wild Saga of Corbett in a ceremony in Ramnagar। Also seen is Vinod Singhal, Director, Corbett Tiger Reserve and Kahini Ghosh Mehta (third from left) - the producer and director of the film.
The film is up of sale in all nature shops in Corbett National Park।

Kahini Ghosh
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Have: loads of love and passion for wildlife, wildlife content, finished films and scripts and a creative mind
Want: networking with wildlife enthusiasts; environmentalists, filmmakers; support for conservation issues, people looking for wildlife film content and concepts

Title: Director
Company: Jolly Productions
Industry: Motion Pictures
Home: New Delhi, Delhi India
From: Chhindwara, Madhya Pradesh India
Interests:
University: Nagpur University; SKV Gwalior

Kahini Ghosh
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I have been a media marketing professional having worked with magazines such as Business & Economy and 4Ps। My latest stint with the corporate world included handling marketing for Steel RX - a steel trading company. Recently, I changed streams in order to pursue a passion for wildlife and nature... I have started a production venture - Jolly Productions and have been trying to bring together like-minded people from varied walks of life - and spread awareness about environment and wildlife conservation through the medium of short films... I certainly believe that the future of Indian wilderness lies in the youth of our country and it is a pleasure working with them! Born in Chhindwara (MP) {I bet most of you have never heard of this place... it lies in the periphery of popular jungles like Pench Tiger Reserve, Kanha National Park and hillstations like Pachmadi},


I have had a close association with the wild since my childhood. The love and fascination for forests and wildlife grew leaps and bounds after marriage - my husband being an equally avid wildlife lover. Have just finished a film on elephants in Jim Corbett National Park. The 17 minutes educational film is available in VCD/DVD format. To catch a glimpse, please visit: http://www.youtube.com/watch?v=9jvvMiD2nSU You can contact me for more details on the film by writing at " href="mailto:kahinighosh@rediffmail.com kahinighosh@rediffmail.com।


Currently having tied up with a lucknow-based NGO to work for the cause of wildlife conservation through the medium of films and am working on few more projects on Jim Corbett National Park - one of which is scheduled to finish by 2007 end. Leading wildlife and enviromentalists have rightly stated that the lack of awareness on the part of the general public has been the prime cause of failure of many conservation programs. As a young professional, I on behalf of my team welcome you all to support the cause by contributing intellectually, financially or in any other suitable manner and help the generation next to witness the supreme wilderness which fascinates people from across the globe! Looking forward to networking with like minded people.. Kahini Ghosh Mehta kahinighosh@rediffmail.com

Kahini Ghosh Mehta
kahinighosh@rediffmail.com
contact number - 09871367945



by : MUKESH CHOURASE, PRO, HAZARDS CENTRE, NEW DELHI

शुक्रवार, 21 नवंबर 2008

भगनी समाज हाल में कथन की ओर से बैठक

बाबा धरणीधर की डायरी ...
दिनांक २९ नवंबर , १९९२

अपरान्ह तीन बजे भगनी समाज हाल में कथन की ओर से बैठक का आयोजन हुआ . धर्म धर्मान्धता और धर्मोन्माद जैसे ज्वलंत विषय पर चर्चा था . आज घाटे साहब भी साथ आ गए थे . मनोज कुलकर्णी और उसका ग्रुप समय- समय पर ऐसी चर्चा रख लेता है . बोलने वालों में नवीन चौबे , प्रदीप श्रीवास्तव , अनिल करमेले , यूनुस ( रेडियोवाणी ब्लॉग वाले यूनुस यानी ... मशहूर अनाउंसर यूनुस खान, विविध भारती मुंबई, रेडियो जॉकी) और काफी संख्या में महिलाएं भी थी .

सब लोगों ने एक स्वर रखे . यही प्रतिपादित किया की धर्म के नाम पर मुल्ला पंडित जी जो आम आदमी को बरगलाने का काम कर रहे है. यह नहीं होना चाहिए . बुध्दिजीवी और विचारशील व्यक्तियों को चाहिए की वह इस कुप्रवृति को रोके आदि आदि . वैसे बीमारी और बीमारी का इलाज़ दोनों बहुत पुराने हो चुके हैं . इससे हटकर भी हमें अब कुछ करना होगा .

मैंने (बाबा धरणीधर) इस प्रकार की चर्चा के साथ यह भी करने का सुझाव दिया कि जब प्रधानमंत्री एकता परिषद् बुलाते हैं साधु समाज और मुस्लिम उलेमा और हिंदू परिषद् से बात करते हैं तो बुध्दिजीवी कलाकार और साहित्यकारों से बात क्यों नहीं करते . अत: आवश्यक है कि प्रधानमंत्री को इसके लिए लिखा जाए .

प्रस्तुति

रामकृष्ण डोंगरे तृष्णा

मंगलवार, 7 अक्तूबर 2008

विजया दशमी पर शुभकामनाएं, बाबा धरणीधर की चिंताएं,

आप सभी को दशहरा और दीपावली की शुभकामनाएं।
आज हम बाबा की डायरी का अंश आपके सामने रख रहे हैं। इस पर क्या लिखा जाए। बाबा की चिंताएं.... आतंकवाद, अलगाववाद, फिजूलखर्ची, चाटुकारिता और धर्म की आड़ में मनमानी आज भी जारी है।

उम्मीद है बाबा धरणीधर को पढ़कर आपको अच्छा लगेगा।


बाबा धरणीधर की डायरी से------

आज पूरे भारत में यह रुग्ण मानसिकता काम कर रही है। धर्म की आड़ लेकर जबरन चंदा वसूली से लेकर आठ दस दिन तक अराजकता गुंडागिरी सब कुछ हो जाता है। फिर यही धार्मिक तथाकथित आस्था, साम्प्रदायिकता बनकर गंभीर परिस्थितियां निर्माण करती है। हर शांतिप्रिय और सफल नागरिक पूरे महोत्सव के दिनों भयभीत रहता है। लाऊंड स्पीकरों का विकराल संगीत नींद हराम तो कर ही देता है। शासन और प्रशासन अलग परेशान कि कहीं कुछ हो न जाये।

साक्षिता-2
बाबा धरणीधर की डायरी
प्रधान संपादक - हनुमंत मनगटे

संपादक- पं. राजेन्द्र राही मिश्रा
प्रकाशक- म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मलेन छिन्दवाड़ा
बाबा स्व. संपतराव धरणीधर की डायरी के अंश

दिनांक 18-10-91 विजया दशमी
आज प्रेस से आ रहा हूं। मशीन की पूजा हर साल के मुताबिक विशेष नहीं। विशेष यह कि महाराष्ट्रीय पंचांग वालों ने पूरे बड़बन और विवेकानंद कॉलोनी वालों ने कल 17 को यह पर्व मना लिया। मोटे रूप में उत्तर भारत वाले आज विजयादशमी का पूजन कर रहे हैं। उत्तर भारत में कल रुद्रपुर गांव में खूनी दशहरा हुआ। किसी रामलीला केदर्शकों के बीच दो जगह बम विस्फोट हुआ 46 लोग गंभीर रूप से घायल हैं। कहते हैं विजयादशमी मुहूर्त में किया गया कार्य शुभ होता है कौन कहेगा कि आतंकवादियों का यह दुभाग्यापूर्ण काम शुभ है? लगता है सारे देश में आतंक और अलगाववाद ने अपनी जड़ें काफी मजबूत कर ली हैं। कोई ऐसी सूरत नजर नहीं आती जो निकट भविष्य में इसका खात्मा कर दे।

नवाब शरीफ और नृसिंहराव हरारे में आपसी मेल जोल की बात कर रहे हैं और यहां दिनों दिन उग्रवादियों की गतिविधियां बढ़ रही है। आज दिन भर शारजांह में मैच चला। भारत विजयादशमी के दिन भी भारत विजय हुई थी।

शाम को शफक और जलील आये थे दशहरे की मुबारकबाद लेकर। आज कल छिन्दवाड़ा का दुर्गा उत्सव रात्रि में न होकर दूसरे दिन विसर्जन जुलूस बनता है। इसमें धर्म की या आस्था भक्त की उतनी चिंता नहीं जितनी अपने अपने मंडल और मोहल्ले की शान और प्रतिष्ठा की बात है। गंज वालों ने अपनी दुगाü और उसके डेकोरेशन पर साठ सत्तर हजार रुपयों का खर्च किया बताते हैं। प्रतिस्पर्धा अर्थ-प्रदर्शन और उथले आडम्बर के सिवाय यहां कुछ भी नहीं। यह शुरुआत भी वहीं से हुई जहां से दुर्गा स्थापना इतिहास शुरु होता है।

बंगाल में अंग्रेजों ने जब अपना वर्चस्व कायम कर आम बंगाली पर अपने सामंती प्रवत्ति की छाप डालना शुरु की तो धार्मिक और सांस्कृतिक कर्मकांड पर अंग्रेजों को प्रसन्न करने के लिये होने लगे। बड़े बड़े बंगाली जमींदार और पूंजीपतियों, व्यापारियों ने अपने दुर्गा मंडपों में अंग्रेज प्रभुओं को आमंत्रित कर उनके कर कमलों से देवी की पूजा करवाना शुरू किया। अंग्रेजों की मेमों को खुश करने के लिये देवियों के चहरे तक उन मेमों के चेहरों से मिलते जुलते बनवाये जाने लगे।

सम्राज्ञी विक्टोरिया जैसे दिखने वाली दुर्गा मूर्तियां बड़ी लोकप्रिय होती गई। अंग्रेजों ने भी बंगाल की इस रुग्ण मानसिकता का फायदा उठाकर नवदुर्गा के अवसर पर बंगाल को कई सहूलियते दी। पूजा हॉलीडे से तो बंगाल अभिभूत हो गया। आज पूरे भारत में यह रुग्ण मानसिकता काम कर रही है। धर्म की आड़ लेकर जबरन चंदा वसूली से लेकर आठ दस दिन तक अराजकता गुंडागिरी सब कुछ हो जाता है। फिर यही धार्मिक तथाकथित आस्था, साम्प्रदायिकता बनकर गंभीर परिस्थितियां निर्माण करती है। हर शांतिप्रिय और सफल नागरिक पूरे महोत्सव के दिनों भयभीत रहता है। लाऊंड स्पीकरों का विकराल संगीत नींद हराम तो कर ही देता है। शासन और प्रशासन अलग परेशान कि कहीं कुछ हो न जाये।

आपका ही
रामकृष्ण डोंगरे

गुरुवार, 2 अक्तूबर 2008

http://bichhu.com/

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छिन्दवाड़ा शहर के आकर्षण

मुख्य व्यापारिक केन्द्र

गोलगंज, गांधीगंज, छोटा बाजार, शनिचरा बाजार और मानसरोवर काम्पलेक्स

धार्मिक स्थल

गोलगंज में काँच जैन मंदिर, पातालेश्वर में स्थित शिव मन्दिर, छोटी बाज़ार में राम मंदिर, नागपुर रोड पर हनुमान मंदिर, मेन रोड पर पुरानी जामा मस्जिद, सत्कार चौराहा पर प्रसिद्ध दरगाह, खजरी रोड पर कैथोलिक चर्च, विवेकानंद कॉलोनी में साई मंदिर, स्टेशन रोड पर पुराना गुरुद्वारा

स्पोर्ट्स स्टेडियम

पुलिस ग्राउंड, शुक्ला ग्राउंड, पोला ग्राउंड और मेन स्टेडियम। एक पुरानी और प्रसिद्ध जिमनैजियम (सर्वोत्तम हेल्थ क्लब) भी है।

शहर की पहचान बनीं प्रतिमाये ....

फव्वारा चौक पर महात्मा गांधी की मूर्ति, ईएलसी चौक पर शिवाजी महाराज की प्रतिमा , इंदिरा चौक पर इंदिरा गाँधी की मूर्ति , ओल्ड पावर हाउस पर प्रतुल चन्द द्विवेदी की प्रतिमा और सत्कार चौराहा पर भीमराव अम्बेडकर की मूर्ति ।

विद्या निकेतन स्कूल परिसर में हिन्दी प्रचारणी समिति की पुरानी लायबेरी । नई- पुरानी हजारों पुस्तकों का संग्रह है, नवीनतम पत्रिकाओं और हिन्दी, अंग्रेजी समाचार पत्रों का संग्रह भी.

देखने के लिए अन्य अच्छी जगह

चार अच्छे सिनेमा हॉल, बीएसएनएल कार्यालय, नया बस स्टेशन और मानसरोवर कॉंम्प्लेक्स

गुरुवार, 14 अगस्त 2008

मुझे फांसी पे लटका दो

15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस विशेष पोस्ट ....

मुझे फांसी पे लटका दो


पत्रकार एवं साहित्यकार बाबा स्व. श्री संपतराव धरणीधर एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में भी जाने जाते रहे .

यहाँ हम उनके इसी रूप को याद कर रहे है . पेश है यह कविता ---

मुझे फांसी पे लटका दो .


मैं ईमान से कहता हूँ कि मैं देशद्रोही हूँ


मुझे फांसी पे लटका दो
कि मैं भी एक बागी हूँ .


ये कैसा बाग़ है जिसमे गुलों पर सांप लहराते
ये कैसा राग है जिसमें सुरों से ताल घबराते


तुम्हारी ये बज्म कैसी जहाँ गुलज़ार हैं सपने
तुम्हारे दीप ये कैसे , लगे जो शाम से बुझने


ऐसे अधजले दीपक जलाना भी मनाही है
तो मैं ईमान से कहता हूँ कि
मैं देशद्रोही हूँ .


मुझे फांसी पे लटका दो
कि मैं भी एक बागी हूँ .


( पत्रकार एवं साहित्यकार बाबा स्व. श्री संपतराव धरणीधर एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में भी जाने जाते रहे . यहाँ हम उनके इसी रूप को याद कर रहे है . पेश है यह कविता --- मुझे फांसी पे लटका दो . १९४६ मैं नागपुर केंदीय जेल में जेलर एवं जेल कर्मचारियों को तंगाने के लिए यह रचना बाबा एवं उनके ७०० साथी जोर -जोर से गाते थे . )


बाबा स्व. श्री संपतराव धरणीधर


जन्म १० मार्च , १९२४ और निधन १५ मई , २००२
रचनाए- गजल संग्रह " किस्त किस्त जिंदगी "

कविता और लोकगीतों का संग्रह " महुआ केशर "

कविता संग्रह - नहीं है मरण पर्व

बुधवार, 13 अगस्त 2008

मेरे बारे में

रामकृष्ण डोंगरे


शिक्षा : -
  • पीजी कॉलेज छिंदवाड़ा से हिंदी साहित्य में एमए, वर्ष 2004 में. (डॉ. हरीसिंह गौर यूनिवर्सिटी सागर से)
  • डीडीसी कॉलेज छिंदवाड़ा से बीए, 2002 में .(डॉ. हरीसिंह गौर यूनिवर्सिटी सागर से)
  • माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विवि, भोपाल से वर्ष 2005-07 में पत्रकारिता में मास्टर डिग्री, एमजे।
कार्यानुभव : -

पिछले आठ-दस वर्ष से पत्रकारिता में सक्रिय. अमर उजाला, नोएडा में सीनियर सब एडीटर (2007-13). भोपाल में दैनिक भास्कर, राज्य की नई दुनिया, स्वदेश और सांध्य दैनिक अग्निबाण में संवाददाता के रूप में(2004-2007)। पत्रकारिता की शुरुआत छिंदवाड़ा में लोकमत अखबार से (2003)। कुछ समय तक रचनाधर्मियों की मासिक संवाद पत्रिका-शब्दशिल्पियों के आसपास में भी।

प्रकाशन-प्रसारण : -

'जन जन की वाणी आकाशवाणी' रेडियो रूपक का आकाशवाणी छिंदवाड़ा से। लेख, कविताएं पत्र-पत्रिकाओं में।

संप्रति :-  दैनिक भास्कर रायपुर में सिटी डेस्क इंचार्ज.

संपर्क : -

बिछुआ रोड, तंसरामाल
पोस्ट-उमरानाला
जिला-छिंदवाड़ा (एमपी) 480107


वेबसाइट : http://chhindwara-chhavi.blogspot.in 
                http://dongretrishna.blogspot.in 

मंगलवार, 5 अगस्त 2008

Priy Ramkrishna

Main ab bhi usi ki (Chhindwara)
galiyon-mohallon men
kahin ghoom raha hoon : Vishnu khare


Priy Ramkrishna,

Maine ab tak tumhara (mere bete se bhi chhote ho,isliye "tum" ke siwa kuchh aur likh nahin sakta) blog na to dekha tha na mujhe uska pata tha, lekin aaj surfing karte hue achanak vah mujhe dikha aur usmen mera ullekh bhi.

Mujhe yaad karne ke liye bahut dhanyavaad.

Mere aajaa Muralidhar Khare Chhindwara ki zila adaalat men naazir the aur mere pita Sunder Khare,(B.Sc. II Class,Nagpur University), Government High School men 1955 tak Science aur Mathematics ke shikshak the.

Hamara paitrik ghar Budhwari Mohalle ke chhote Ram Mandir ke paas jo chhota Hanuman Mandir hai uski chhendi men tha - ab use khareednewale ne ( hamne use nahin becha - vah ek alag qissa hai ) tudvakar ek naya makaan banva liya hai.

Mere bade bhai Shyam Khare, chhota bhai Gopal Khare aur swayam main Chhindwara ke Main Board Primary School aur Government High School men padhe hain - bade bhai saheb ne to 1953 men Chemistry aur Maths I men Distiction haasil karte hue Matric first division men pass kiya aur Air Force men jaane se pahle 16 varsh ki naabaaligh umr men Danielson School men mastery bhi ki.

1955 men bhautik roop se Chhindwara men rahna chhoot gaya lekin sthaayi roop se main ab bhi usi ki galiyon-mohallon men kahin ghoom raha hoon.

Yah sab isliye likha ki Dongre surname mujhe yaad hai, lekin vah Dongre mujhse/hamse kaise sambandhit the yah smaran nahi ho pa raha hai.

Sambhav hai tumhare pita ya ajoba se ham parichit rahe hon ya unmen se koi hamare saath padha ho.

Tumhare blog se hi maloom hua ki ab tum Dilli men ho. Kab se ? Kya kar rahe ho ?

Liladhar ne bhi kabhi zikr nahin kiya.

Filhaal main Mumbai men hoon - abhi kal hi Dilli se aya hoon. Kab lautoonga abhi kah nahin sakta.Lekin ichchha aur sambhavana ho to likhna.

Sasneh,

Vishnu Khare

शनिवार, 2 अगस्त 2008

हिंदी में लिखने के हथियार

हिंदी में लिखने के लिए क्लिक कीजिए :
http://www.google.com/intl/hi/inputtools/cloud/try/

हिंदी फांट यूनीकोड में बदलें
http://rajbhasha.net/drupal514/UniKrutidev+Converter

http://ganjbasoda.net/converter/chanakya-to-unicode-to-chanakya.html
बसेरा ....
http://rajneesh-mangla.de/unicode.php

www.basera.de login
welcome to 3-step font conversion.this program converts the indic text written in a variety of fonts into unicode format.
http://rajneesh-mangla.de/unicode.phphttp://rajneesh-mangla.de/unicode.phphttp://rajneesh-mangla.de/unicode.php
लिपिक.इन
http://lipik.in/hindi.html
यूनीनागरी
http://uninagari.kaulonline.com/inscript.htm
गूगल का रोमन से हिंदी कनवर्टर
http://www.google.com/transliterate/indic/
डायरेक्ट फोनेटिक में लिखें
http://www.gate2home.com/?language=hi&sec=2
हिंदी यूनीकोड फोनेटिक टूलकिट
http://www.zshare.net/download/883249c5514e/
क्लासीफाइड्स.को.इन
http://www.classifieds.co.in/hindi.html
इंडिकइनस्क्रिप्ट लेआउट
http://java.sun.com/products/jfc/tsc/articles/InputMethod/indiclayout.html
हिंदी फांट यूनीकोड में बदलें
http://pratibhaas.blogspot.com/2008/03/blog-post_28.html
http://pratibhaas.blogspot.com/2008/03/blog-post_28.html
------------------------------------------------
देवनागरी फाण्ट परिवर्तक नीचे बहुत से फाँट परिवर्तकों के लिंक दिए गए हैं। ये सभी जावास्क्रिप्ट में हैं। वैज्ञानिक एवम तकनीकी हिन्दी समूह पर जाकर इन्हें डाउनलोड करके अपने डेस्कटाप पर भी चलाया जा सकता है।
जिस परिवर्तक को चलाना चाहते हैं उसके लिंक पर क्लिक कीजिये:
पुराने फाँट से यूनीकोड में परिवर्तन
Agra font to unicode converter03
Chanakya to Unicode converter08
DV-YogeshEN-to-Unicode converter06
DVB-YogeshEN-to-Unicode converter02
DVBW-YogeshEN-to-Unicode converter02
HTChanakya-to-Unicode converter07
krutidev010-to-Unicode converter04
sanskrit99 to unicode converter15
shivaji to unicode converter05
श्री-लिपि से यूनिकोड परिवर्तक

यूनीकोड से पुराने फाँट में परिवर्तन :
Unicode to Agra font converter03
Unicode-to-Chanakya converter06
Unicode-to-DV-YogeshEN converter03
Unicode-to-DVB-YogeshEN converter02
Unicode-to-DVBW-YogeshEN converter02
Unicode-to-HTChanakya converter02
Unicode-to-krutidev010 converter03
Unicode-to-sanskrit99 converter07

उपरोक्त परिवर्तकों के अतिरिक्त बहुत से अन्य परिवर्तक भी उपलब्ध हैं। फाँट परिवर्तकों की विस्तृत सूची औरउनके लिंक के लिए यहाँ जाइए
http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%AA%E0%A5%80%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE:%E0%A4%87%E0%A4%82%E0%A4%9F%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%9F_%E0%A4%AA%E0%A4%B0_%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A4%A8#.E0.A4.AB.E0.A4.BE.E0.A4.A3.E0.A5.8D.E0.A4.9F_.E0.A4.AA.E0.A4.B0.E0.A4.BF.E0.A4.B5.E0.A4.B0.E0.A5.8D.E0.A4.A4.E0.A4.95_.28Font_Converters.29
सौजन्य : भड़ास और प्रतिभास

शुक्रवार, 1 अगस्त 2008

हमारे छिंदवाड़ा को किसकी नज़र लगी

हमारे छिंदवाड़ा को किसकी नज़र लगी

छिंदवाड़ा यूँ तो शांत शहर और जिला है ... बस इसीलिये वहां बड़ी घटनाये नहीं होती ...
अपने शहर से दूर देश की राजधानी दिल्ली में छिंदवाड़ा की खबरे कभी देखने को नहीं मिलती
... और आज जब देखने में आ रही तो
... बच्चे की मौत... बच्चे की मौत .
छिंदवाड़ा के संत आसाराम बापू गुरुकुल आश्रम में फिर एक बच्चे मौत
... सारे चैनल - अखबार ...बच्चों की मौत की खबरों से भरे पड़े है ...

पहले रामकृष्ण ... और अब वेदांत काल के गाल में समा गए
...एक तीसरा बच्चा विशाल... निजी अस्पताल में भर्ती है ....

छिंदवाड़ा में पिछले 36 घंटों में दो बच्चों की मौत हो चुकी है।

घटना के बाद लोगों में रोष है ...
पालकों में दहशत है .... और वे अपने बच्चों को आश्रम से ले जा रहे हैं।

पालकों का कहना है कि वे अब किसी भी कीमत पर अपने बच्चों को आश्रम में नहीं छोड़ सकते।
आश्रम की योग वेदांत सेवा समिति के अध्यक्ष ने 7-8 दिन के लिए आश्रम बंद करने की सिफारिश की है ताकि घटना की निष्पक्ष जांच हो सके। उन्होंने शक जाहिर किया कि घटना के पीछे कोई बाहरी तत्व हो सकता है।

बाहरी तत्व ...

जिस तरह से दोनों मौत हुई है ...
वे कुछ संदेह तो पैदा करती है ...
कौन है वे लोग जो छिंदवाड़ा की छवि को ख़राब करना चाहते है
...हमारे छिंदवाड़ा को आख़िर किसकी नज़र लग गई ....

Another ashram schoolboy dead

Another ashram schoolboy dead

Ads By Google HT Correspondents
Bhopal, July 31, 2008
Yet another student was found dead in Asaram Bapu Ashram school in Chhindwara, Madhya Pradesh, on Thursday. The ashram is already under the scanner due to the discovery of the body of a four-year-old boy, Ram Krishna Yadav, near the hostel toilet on Tuesday. Earlier this month, two more students of the ashram’s Ahmedabad branch were found dead.
Like Ram Krishna, Vedant Manmode, 5, was found in the hostel bathroom. Ashram inmates rushed him to hospital, where he was declared dead. School doctor Lokesh Sharma said Vedant was found with his head in a bucket of water, leading to suspicion.

The police haven’t lodged a complaint as the boy’s father, who hails from Maharashtra, said he didn’t suspect foul play.

But Chhindwara SP RK Shivhare said: “Prima facie evidence has established it is a case of foul play.” IG (Jabalpur Range) MR Krishna said post-mortem reports in both cases were awaited. “The matter is serious and will be probed at a high level.”

Additional District Magistrate Chandrashekhar Neelkanth has ordered a magisterial probe. As the news spread, a mob attacked the school and parents rushed in to get their children. Social and political activists were up in arms.

In Ahmedabad, the discovery of the bodies of Deepesh and Abhishek Vaghela, aged 11 and 12, from the Sabarmati riverbed had triggered widespread violence.
First Published: 23:53 IST(31/7/2008)
Last Updated: 23:54 IST(31/7/2008)

गुरुवार, 31 जुलाई 2008

छिंदवाड़ा में आसाराम बापू आश्रम में एक और बच्चे की मौत

आश्रम के बाथरूम में मृत मिला चार साल का वेदांत

भास्कर न्यूज Friday, August 01, 2008 08:56 [IST]

छिंदवाड़ा. छिंदवाड़ा के संत आसाराम बापू गुरुकुल आश्रम में फिर एक बच्चे (वेदांत) की मौत हो गई। पिछले 36 घंटों में यहां दो बच्चों की मौत हो चुकी है।

घटना के बाद आश्रम के बाहर भारी संख्या में लोग एकत्र हो गए और चक्काजाम कर दिया। पालकों में दहशत है और वे अपने बच्चों को आश्रम से ले जा रहे हैं।

पालकों का कहना है कि वे अब किसी भी कीमत पर अपने बच्चों को आश्रम में नहीं छोड़ सकते। उधर जिला प्रशासन ने घटना की मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दे दिए हैं। इससे पूर्व अहमदाबाद के आश्रम में भी दो बच्चों की संदिग्ध मौत हो गई थी।

केजी-टू में पढ़ने वाले वेदांत का शव बाथरूम में मिला। मंगलवार शाम को भी आश्रम के बाथरूम में एक छात्र का शव मिला था। जिला प्रशासन ने इस मामले में मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिए हैं।
जानकारी के मुताबिक गुरुवार शाम 6.30 से 6.45 बजे के बीच एक बच्चे ने बाथरूम क्रमांक दो में केजी-1 के छात्र वेदांत को बाल्टी में औंधा पड़ा हुआ पाया। सूचना मिलने पर आश्रम प्रबंधन के सदस्य उसे लेकर जिला अस्पताल पहुंचे जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। वेदांत का परिवार पुणो में रहता है। बच्चे की मौत की जानकारी मिलते ही पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने आश्रम पहुंचकर सभी कमरों और बाथरूमों का बारीकी से निरीक्षण किया। कलेक्टर ने मामले की मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दे दिए हैं।

आश्रम बंद करने की सिफारिश

आश्रम की योग वेदांत सेवा समिति के अध्यक्ष एम.एम. परसाई ने बताया कि उन्होंने अहमदाबाद पत्र लिखकर 7-8 दिन के लिए आश्रम बंद करने की सिफारिश की है ताकि घटना की निष्पक्ष जांच हो सके। उन्होंने शक जाहिर किया कि घटना के पीछे कोई बाहरी तत्व हो सकता है।
एक बच्चा अस्पताल में: आसाराम गुरुकुल आश्रम की कक्षा दूसरी के छात्र विशाल पुत्र दिलीप सिंह को बुधवार को उल्टी दस्त और बुखार से पीड़ित होने पर एक निजी र्न्िसग होम में भर्ती किया गया है। यह बच्च चौरई का रहने वाला है।

संयोग या..
1. दोनों बच्चों की मौत बाथरूम में हुई।
2. दोनों बच्चों की मौत शाम के समय ही हुई।
3. रामकृष्ण के शव पर चोट के निशान नहीं मिले।
4. सिर्फ एक दिन के अंतर से हुई दूसरी मौत।

रविवार, 27 जुलाई 2008

About me


Ramkrishna Dongre TRISHNA
E-mail : dongre.trishna@gmail.com
________________________

Education

• 2002-04 M.A. Hindi literature from Sagar University (M .P) with 73.13%

• 2002 Bachelor degree in arts from Sagar University (M .P) with 54.56%

Professional Qualification

• 2005-07 Master of Journalism from Makhanlal Chaturvedi National University of Journalism & Communication Bhopal

• 2003 “O” Level Computer Course from P.G.College Chhindwara (M .P)

• 2003-06 Diploma in creative writing in Hindi from IGNOU, New Delhi

Achievements

• Broadcast ‘Radio Roopak ‘from F.M Radio station Aakashvani Chhindwara

• Published articles in magazines & newspapers

Work with various media organization

• Presently working as a Chief Sub Editor in ‘Dainik Bhaskar Raipur (city desk)

• Worked as a Senior Sub Editor in ‘Amar ujala’ Noida ( central desk),  2007-13

• Worked as a Crime Reporter in ‘Rajya ki Naidunia’ daily newspaper Bhopal, Jan -June 2006

• 2005 Worked as a Art & Culture Reporter, Feature Desk in evening daily newspaper Aganiban, Bhopal

• 2002-2005 Worked as a news Reporter in samvad patrika ‘Aaspas’ Bhopal

• 2004 Worked as a news Reporter in Swadesh daily newspaper Bhopal.

• 2003 Worked as a news Reporter in Lokmat samachar daily newspaper chhindwara

Trainings undergone

• One month internship as a trainee journalist in See tv Bhopal

Workshop & seminars

• Attended BBC workshop on ‘ONLINE JOURNALISM’.
• Attended workshop on parliamentary proceeding
• Attended UNICEF workshop on Women Health & media.

Ramkrishna Dongre
Chief Sub-Editor/Reporter
Dainik Bhaskar (Hindi daily newspaper) , Raipur

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रविवार, 13 जुलाई 2008

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CHHINDWARA : beauty and diversity



Atishay Jain( Ahmedabad)

City Chhindwara is developing at a very fast pace with huge infrastructure and latest educational achievements. Danielson College, Government P.G. College, Girls College and Satpuda College are providing latest educational courses. Whereas, NIIT is giving professional education along with awesome placements.
Searching Chhindwara on India’s Map..?? It’s so simple, just see closely to India’s map and decide the precise center point of the country. You’ll get vibrant Chhindwara. .Isn’t it so simple..??? Yes similarly it’s very easy to understand Chhindwara’s nature and culture. Geographically it’s located at 22.07o N 78.93o E as a part of state of Madhya Pradesh, touching the borders of Maharashtra.

Majority of the population of Chhindwara is Hindi speaking but Marathi and English are also other popular spoken languages. Interiors of district Chhindwara are predominantly tribal areas but main town has mixed population, almost all casts and religions are easily found in the urban area. Chhindwara have got this name because one plant species called Chhind locally, which looks almost like a plant of dates. This plant found significantly in the city.
Great Satpuda hills sanctify it with immense greenery, wild life and Biodiversity. Patalkot and Tamia has been area of research of Medicinal plants from last long time which has attracted the attention of not only Indian but of International scientists also. Bhariya and Bheels are the original natives of this land who are also studied extensively for their traditional knowledge of treatment of diseases and their unmatchable cultural rituals.

Western part of Chhindwara is rich with coal and it has been a big coal producing area from last many decades. Chhindwara has been a significant political territory for all the major political parties, it becomes a perfect political arena during the time of Parliament elections and the whole India give an eye on the results of this important seat.

City Chhindwara is developing at a very fast pace with huge infrastructure and latest educational achievements. Danielson College, Government P.G. College, Girls College and Satpuda College are providing latest educational courses. Whereas, NIIT is giving professional education along with awesome placements.

When we talk about spirituality, Chhindwara is not legging behind. It has given birth to Great Spiritual gurus like Nirmala Devi who has enlightened the world with Sahaj Yoga. Nirmala Devi’s ashram at her birth place has become the center for international devotees. In nutshell, Chhindwara is a place which is specially blessed by the god with liveliness, beauty and diversity.
Article by Atishay Jain
(Ahmedabad)

शनिवार, 28 जून 2008

लीलाधर मंडलोई


Leeladhar Mandloi, Hindi-Poet


लीलाधर मंडलोई


[ हिन्दी कविता के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर और दूरदर्शन के उप महानिदेशक लीलाधर मंडलोई कविता के अतिरिक्त गद्य लेखन के लिए भी जाने जाते हैं। ]


जन्म स्थान ग्राम-गुढ़ी, जिला-छिन्दवाड़ा, मध्यप्रदेश, भारत

कुछ प्रमुख कृतियां
घर-घर घूमा, रात-बिरात,

मगर एक आवाज(कविता संग्रह),
ये बदमस्ती तो होगी,
देखा पहली दफ़ा अदेखा(काव्य पुस्तिका),

अंदमान-निकोबार की लोक कथाएँ,
पहाड़ और परी का सपना(लोक कथाएँ),
चाँद पर धब्बा, पेड़ बोलते हैं ( बालकहानी संग्रह),
इसके अतिरिक्त गद्य की विभिन्न विधाओं में लेखन प्रकाशन।
विविध चेखव की कथा पर फिल्म एवं प्रख्यात कथाकार ज्ञानरंजन पर वृत्तचित्रका निर्देशन।
घर -घर घूमा कविता संग्रह पर मध्यप्रदेश साहित्य परिषद केरामविलास शर्मा सम्मान से पुरस्कृत,
रात-बिरात कविता संग्रह मध्य प्रदेश साहित्य सम्मेलन के वागेश्वरी पुरस्कार तथा मध्य प्रदेश कला परिषद के रज़ा सम्मान से सम्मानित। कई देशों की यात्रायें।


लीलाधर मंडलोई की एक कविता

बहुत कुछ बीच-बाज़ार

कुछ पेड़ हैं वहाँ कि इतने कम
एक कुत्ता है कोठी में भागता-भौंकता
बकरियाँ व्यस्त हैं इतनी कि मुश्किल से
ढूँढ पातीं घास के हरे तिनके कि उगे कहीं-कहीं

सड़क जो पेड़ों के पीछे बिछी उस पर
कारों के दौड़ने के दृश्य ख़ूब
और एक साइकिलवाला है चेन उतारने-चढ़ाने में मशगूल
इधर कमरे में जो बैठा हूँ देखता
निचाट अकेलेपन की स्थिर हवा का शिकार

पुरानी पड़ चुकी ट्यूबलाइट से रोशनी इतनी कम
कि उदास होने के अहसास में डूबी चीजें
कहीं कोई हड़बडी नहीं कि बदलती है सदी
एक मेरी अनुपस्थिति की हाज़िरी के बग़ैर
बाज़ार में बढ़ती ललक है हस्बमामूल

दुकानों का उजाला चौंधता बंद आँखों में इस हद
कि बची-ख़ुची रेजगारी उछलती हाथों से
रोकता मैं कि आख़िरी दिन है तिस पर
देखता कि लुट रहा है बहुत कुछ बीच-बाजार


('मगर एक आवाज़' से)

गुरुवार, 26 जून 2008

वरिष्ठ कवि-आलोचक विष्णु खरे




Kneeling down to the Kalevala, women left to right Hilkka Ten-kanen-Sondergaard, Ursula Ojanen, Mercedeh Mohseni, and Bui Viet Hoa; men left to right Eino Kiuru, Vishnu Khare, and Mahmoud Amir Yari.

विष्णु खरे

जन्म: 9 फरवरी 1940
उपनाम --
जन्म स्थान छिन्दवाड़ा (मध्यप्रदेश), भारत

कुछ प्रमुख कृतियाँ

टी.एस., एलिअट का अनुवाद 'मरुप्रदेश और अन्य कविताएँ' (1960), 'विष्णुखरे की कविताएँ' नाम से अशोक वाजपेयी द्वारा संपादित पहचान सीरीज की पहलीपुस्तिका , ख़ुद अपनी आँख से (1978), सबकी आवाज़ के पर्दे में (1994),पिछला बाक़ी (1998) और काल और अवधि के दरमियान (2003)।

विदेशी कविता से हिन्दी तथा हिन्दी से अंग्रेजी में सर्वाधिक अनुवादकार्य।
श्रीकांत वर्मा तथा भारतभूषण अग्रवाल के पुस्तकाकार अंग्रेजीअनुवाद। समसामयिक हिन्दी कविता के अंग्रेजी अनुवादों का निजी संग्रह 'दिपीपुल एंड दि सैल्फ'। लोठार लुत्से के साथ हिन्दी कविता के जर्मन अनुवाद'डेअर ओक्सेनकरेन' का संपादन। 'यह चाकू समय' (आॅत्तिला योझेफ़), 'हम सपनेदेखते हैं' (मिक्लोश राद्नोती), 'काले वाला' (फ़िनी राष्ट्रकाव्य), डचउपन्यास 'अगली कहानी' (सेस नोटेबोम), 'हमला' (हरी मूलिश), 'दो नोबलपुरस्कार विजेता कवि' (चेस्वाव मिवोश, विस्वावा शिम्बोरर्स्का) आदिउल्लेखनीय अनुवाद।

विविध कालेवाला सोसाइटी, फ़िनलैंड, यूनेस्को-हेतु भारतीय सांस्कृतिकउपयोग तथा केन्द्रीय साहित्य अकादमी आदि की सदस्यता। फ़िनलैंड काराष्ट्रीय 'नाइट ऑफ दि व्हाइट रोज़' सम्मान, शिखर सम्मान, हिन्दी अकादमी,दिल्ली का साहित्य सम्मान। रघुवीरसहाय सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान।

जीवनी विष्णु खरे / परिचय
http://hi.literature.wikia.com/wiki/

Chhindwara district

Chhindwara (also spelt Chindawara or Chindwara) is a city and a municipality in Chhindwara district in the Indian state of Madhya Pradesh. It is the administrative headquarters of Chhindwara District. It is reachable by rail or road from adjacent cities Nagpur and Jabalpur. The nearest airport is in Nagpur (125 km).


It has two lakes located in the middle of the town. Chhindwara is known for its richness in flora and fauna. Hundreds of important medicinal plants are grown naturally in the forest of this district. Tamia hills and Patalkot- The Hidden World is known as treasure of medicinal plants in Satpura plateau.


Tourist attractions

Golganj, Gandhiganj, Chotta Bazar, Shanichra Bazar and Mansarovar Complex are the main commercial centers of the city।


Hanuman temple at Nagpur road, Ram mandir at Chhota Bazar, Jain Kanch Mandir at Golganj, Shiv Mandir at Pataleshwar, Old Jama Masjid at Main Road,famous Dargaah at Satkaar chauraha, Catholic Church at Khajri Road, Sai mandir at vivekanand colony,old Gurudwara at Station Road and Nirmala Devi's birthplace at Nagpur road are worthseeing religious places of the city।


There are some big playgrounds and stadiums in the city with sports training facilities like Police Ground, Shukla Ground, Pola Ground and Main Stadium। A old and famous Gymnasium (Sarvottam Health Club)is also there for fitness freaks.


Statue of Mahatma Gandhi at Fawwara Chawk, Shivaji Maharaj at ELC, Indira Gandhi at indira Chawk, Pratul Chand Dwivedi at Old Power House and BheemRao Ambedkar at Satkaar Chauraha gives an identity to these places.


Very old library of Hindi Pracharni Samiti (on Vidhya-Niketan School premises) which has collection of thousands of old-new books, latest magazines and Hindi-English newspapers.
Four Good cinema Halls, BSNL office, New Bus Stand and Mansarovar Conmplex are other good places to see.


Education
District Learning Center: Chhindwara is a small district of MP but there are opportunities available for students in this town. TNI (The NIIT Institute of Information Technology), a non-profit, has set up the first-of-its kind District Learning Center (DLC) in Chhindwara, Madhya Pradesh to harness talent and skilled manpower for global readiness.

It was inaugurated by Mr. Kamalnath, Commerce & Industry Minister of the Government of India on 13th August, 2007. NIIT's chairman, Rajendra Singh Pawar, and top managers from IT companies like IBM, Infosys, TCS and Wipro were also present.


It currently has a strength of 200+ and many courses are available for students who are graduates or in the final year of their graduate program. The center has been designed to create an ambience of an urban training facility and uses state-of-the-art technology-fully networked classrooms, machine rooms, labs, library, high-bandwidth internet, amongst other learning resources.

One can opt for any of the following after meeting the qualifying criterion:


Certificate in Basic Infomation Technology (CBIT) Certificate in Programing Infrastructure Management (CPIM) Certificate in J2EE or .Net. It is situated on the Seoni Road and is about a km. from the railway station. DLC is a reflection of unique public-private-partnership. The project has witnessed a strong industry support by way of corporate sponsored training to identified candidates from this region. The unique initiative has already garnered support from leading global organisations such as IBM, Wipro Technologies, Tata Consultancy Services and NIIT Technologies to utilize the talent pool created by this District Learning Centre.The model is being tested and NIIT plans to roll out similar initiatives in other districts of the country. These graduates will be equipped with various skills, such as IT, communication (verbal and written), and business etiquette that will enable them to acquire gainful employment.


Colleges


Danielson Degree College which is situated at Nagpur road is the oldest educational Institue of whole chhindwara region and a Hot-Spot for students of chhindwara and nearby places. Danielson College is offering latest professional courses like BBA, BCA, MCM and B.Sc. with Microbiology etc. It is also providing placement facilities to its students.


PG College is situated at Dharam Tekri near khajri.
Govt. Girls College is situated at the heart of the town.
Satpuda Law College is offering some professional courses like MBA (aff. with Panjab Technical University) and LLB.


Notable residents
Shri Mataji Nirmala Devi, birthplace of the founder of Sahaja Yoga.
Kamal Nath, Minister for Commerce and Industry with Cabinet Rank, and a member of the Congress Party. [1]


Industries
HINDUSTAN UNILEVER LIMITED.
It is a multinational company, this company is originally from England. Earlier this company's name was Hindustan Lever Limited. Now its name has been changed. Now a days company name is HINDUSTAN UNILEVER LIMITED. Chhindwara Hindustan Unilever Limited is situated at village Lahgadua which 5 km from Chhindwara. There are 210 workers in Hindustan Unilever, they work in 3 shifts. This company has completed 75 years in 2008. The factory unit of Chhindwara produces 3 main products- Rin washing soap, Wheel washing powder and Surf Excel washing powder. It is only 1 factory unit of Hindustan Unilever in Madhya Pradesh. In the year 2007 the production was 70,000 units


References
^ Falling Rain Genomics, Inc - Chhindwara
^ Patalkot- The Hidden World (www.patalkot.com) as seen on 12/02/2008)


External links
Chhindwara district website

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गुरुवार, 19 जून 2008

पातालकोट और डॉ. दीपक आचार्य



Dr. Deepak Acharya
Director, Abhumka Herbal Pvt Ltd- Ahmedabad, India
Email (Personal): deepak@patalkot.com
Email (Personal): info@patalkot.com
Email (Professional): deepak@abhumka.com
**************************************************
अमेरिकन दैनिक अखबार द वॉल स्ट्रीट जर्नल में
कवर स्टोरी पर आने वाले पहले भारतीय डॉ. दीपक आचार्य
डॉ. दीपक आचार्य के अनुसार ---


आधुनिक विज्ञान की सहायता से किसी एक नई दवा को बाजार में आने तक 15 वर्ष लग जाते हैं, इस दवा की खोज में कई बिलियन डॉलरों की लागत भी लग जाती है। आदिवासियों का हर्बल ज्ञान एक सूचक की तरह कार्य कर सकता है। उनका भरोसा है कि अनेक वर्षों और खर्चों को खत्म करने में यह ज्ञान एक प्रमुख स्रोत बन सकता है। पुरातन ज्ञान को नकारना समझदारी नहीं कही जाएगी। पातालकोट के आदिवासी लकवा, मधुमेह, त्वचा रोगों, पीलिया, बवासीर, हड्डी रोग और नेत्र रोगों को ठीक कर देने का दावा ठोंकते हैं।

वर्तमान में डॉ. दीपक आचार्य स्वयं अपनी कंपनी स्थापित कर चुके हैं। भुमकाओं को समर्पित यह कंपनी अभुमका हर्बल प्रायवेट लिमिटेड के नाम से जानी जाती है।

डॉ. आचार्य की यह कंपनी मध्यप्रदेश के पातालकोट और गुजरात के डाँग के आदिवासियों की चिकित्सा प्रणालियों को आधुनिक विज्ञान के परिदृश्य में प्रभावित करने का कार्य कर रही है।
इन चिकित्सा पद्धति का पेटेंट आदिवासियों के ही नाम होगा।डॉ. दीपक आचार्य30 अप्रैल, 197 को कटंगी, बालाघाट, मध्यप्रदेश में जन्म, सागर विवि से डॉक्टरेट। इतनी कम उमर में डॉ. आचार्य ने दुनियाभर में नाम कमाया है।



उनकी कुछ प्रमुख उपलब्धियाँ गौर करने लायक हैं। मसलन- अमेरिकन दैनिक अखबार द वॉल स्ट्रीट जर्नल में कवर स्टोरी पर आने वाले वे पहले भारतीय हैं।


उनके विभिन्न अंतरराष्ट्रीय व राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में दो दर्जन से अधिक शोधपत्रों का प्रकाशन हो चुका है।उन्हें यंग एचीवर्स अवार्ड 2004 से नवाजा जा चुका है।


कामिनी रामरतन - 30 सितंबर, 1961 को गुयाना, वेस्टइंडीज में जन्म, वनस्पतिशास्त्र में एम.एस-सी.।
इनके बुजुर्ग 1960 के दशक से पहले हिंदुस्तान से जाकर गुयाना में बस गए थे। हिंदुस्तान के आदिवासियों से विशेष लगाव महसूस करती हैं। वर्तमान में आप गुयाना के एक कॉलेज में पढ़ाने का काम कर रही हैं।


डॉ. दीपक आचार्य ने की चुनौतीपूर्ण अभियान शुरुआत


चुनौती के आईने में भारतीय युवाजहाँ चाह, वहाँ राह जैसी लोकोक्ति डॉ. दीपक आचार्य के संदर्भ में सटीक समझ पड़ती है। लगभग 10 वर्ष पूर्व जिस अनोखे और चुनौतीपूर्ण अभियान की शुरुआत डॉ. दीपक आचार्य ने सतपुड़ा की सुरम्य वादियों से की थी, अब उस अभियान को अंजाम तक पहुँचाने में डॉ. आचार्य सफल होते दिखाई दे रहे हैं।


पातालकोट घाटी का विशालकाय धरातल लगभग 3000 फीट नीचे


दक्षिण मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा शहर से लगभग ७५ किलोमीटर दूरी पर स्थित यह विशालकाय घाटी का धरातल लगभग ३००० फीट नीचे है। इस विहंगम घाटी में गोंड और भारिया जनजाति के आदिवासी रहते हैं। इन आदिवासियों के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं हैं, किंतु ये आदिवासी आमजनों से ज्यादा तंदुरुस्त हैं। ये आदिवासी घने जंगलों, ऊँची-नीची घाटियों पर ऐसे चलते हैं, मानो किसी सड़क पर पैदल चला जा रहा हो। आधुनिकीकरण से कोसों दूर पातालकोट घाटी के आदिवासी आज भी अपने जीवन-यापन की परम्परागत शैली अपनाए हुए हैं। रोजमर्रा के खान-पान से लेकर विभिन्न रोगों के निदान के लिए ये आदिवासी वन संपदा पर ही निर्भर करते हैं। भुमका वे आदिवासी चिकित्सक होते हैं तो जड़ी-बूटियों से विभिन्न रोगों का इलाज करते हैं।


1997 में पातालकोट पहुँचे डॉ। दीपक


भुमकाओं के पास औषधीय पौधों का ज्ञान भंडार है। 1997 में डॉ। दीपक आचार्य अपने शोधकार्य के सिलसिले में पातालकोट पहुँचे। आदिवासियों के बीच रहकर कार्य करना चुनौतीपूर्ण था। सामान्यतः अपने बीच अजनबी की उपस्थिति से आदिवासी विचलित हो जाते हैं। कटु जिज्ञासा और दृढ़ निश्चितता के कारण डॉ. आचार्य इन आदिवासियों का दिल जीत गए। इस समय तक घाटी के आदिवासी भी नहीं जानते थे कि एक दिन दुनिया से दूर स्थित इस घाटी को विश्व जान सकेगा। औषधीय पौधों की खोज में डॉ. आचार्य पातालकोट घाटी के भुमकाओं से मिलते रहे। इसके अलावा छिंदवाड़ा के दानियलसन कॉलेज में उनका शोध व अध्यापन कार्य भी चलता रहा।


इसी कॉलेज की छोटी-सी प्रयोगशाला गवाह है उनके काम की, जहाँ डॉ। आचार्य ने आदिवासियों की चिकित्सा पद्धति को प्रमाणित करने के लिए जी-जान लगा दी। शुरुआती दौर में आदिवासियों के द्वारा बताई चिकित्सा पद्धति के प्रमाणीकरण से साबित होने लगा कि ये हर्बल औषधियाँ वर्तमान बाजार में उपलब्ध अनेक एलोपैथिक दवाओं से ज्यादा कारगर हैं। अपने शोधपत्रों को प्रकाशित कर डॉ. आचार्य ने पातालकोट के भुमकाओं का डंका विश्व पटल पर बजा दिया।



एक डिजिटल लायब्रेरी बनाने का सफर

2002 आते-आते पातालकोट घाटी एक अन्य समस्या से जूझने लगी थी। आदिवासी पलायन करके दूसरे नजदीकी शहरों की ओर कूच करने लगे थे। जैविक दबाव बढ़ने के कारण और बाहरी लोगों के घाटी प्रवेश के कारण घाटी के औषधीय पौधे समाप्त होने लगे। अधिकतर भुमका अपनी जीवनबेला के अंतिम पड़ाव में थे। डॉ। आचार्य ने आदिवासी भुमकाओं के ज्ञान संरक्षण की सोची और फिर शुरू हुआ एक डिजिटल लायब्रेरी बनाने का सफर। आदिवासी चिकित्सकों की तमामा चिकित्सा पद्धतियों को विस्तृत रूप से संकलित कर एक डेटाबेस बनाया गया। भुमकाओं की युवा पीढ़ी अब इस पारम्परिक ज्ञान में कोई दिलचस्पी नहीं ले रही थी, उन्हें बाहरी दुनिया और आधुनिकीकरण की समझ तो आ गई, किंतु इस अमूल्य ज्ञान को सीखने की समझ न आ पाई।



इस ज्ञान के महत्व को डॉ। आचार्य ने समझा और संकलित करने का बीड़ा उठाया। डॉ. दीपक आचार्य के अनुसार आधुनिक विज्ञान की सहायता से किसी एक नई दवा को बाजार में आने तक 15 वर्ष लग जाते हैं, इस दवा की खोज में कई बिलियन डॉलरों की लागत भी लग जाती है। आदिवासियों का हर्बल ज्ञान एक सूचक की तरह कार्य कर सकता है। उनका भरोसा है कि अनेक वर्षों और खर्चों को खत्म करने में यह ज्ञान एक प्रमुख स्रोत बन सकता है। पुरातन ज्ञान को नकारना समझदारी नहीं कही जाएगी। पातालकोट के आदिवासी लकवा, मधुमेह, त्वचा रोगों, पीलिया, बवासीर, हड्डी रोग और नेत्र रोगों को ठीक कर देने का दावा ठोंकते हैं।



अभुमका हर्बल प्रायवेट लिमिटेड


वर्तमान में डॉ। दीपक आचार्य स्वयं अपनी कंपनी स्थापित कर चुके हैं। भुमकाओं को समर्पित यह कंपनी अभुमका हर्बल प्रायवेट लिमिटेड के नाम से जानी जाती है। डॉ। आचार्य की यह कंपनी मध्यप्रदेश के पातालकोट और गुजरात के डाँग के आदिवासियों की चिकित्सा प्रणालियों को आधुनिक विज्ञान के परिदृश्य में प्रभावित करने का कार्य कर रही है। अहमदाबाद स्थित इस कंपनी ने काफी रफ्तार से आदिवासियों के परंपरागत ज्ञान पर कार्य करना शुरू कर दिया है। पातालकोट और डाँग के आदिवासियों की चिकित्सा पद्धतियों से उन पद्धितियों का चयन किया जा रहा है, जो वर्तमान बाजार में उपलब्ध दवाओं से ज्यादा कारगर हैं तथा प्रयास किया जा रहा है कि आमजनों तक सस्ती, सुलभ दवाओं को पहुँचाया जाए।






इन हर्बल पद्धतियों के प्रमाणीकरण के पश्चात डॉ. आचार्य बड़ी फार्मा कंपनियों से मिलकर इन उत्पादों को बाजार में लाने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसा करने पर प्राप्त रकम का बड़ा हिस्सा आदिवासियों को दिया जाएगा। ऐसा करने से इन आदिवासियों के ज्ञान को सम्मान तो मिलेगा, साथ ही उनकी आर्थिक तंगहाली से उन्हें निजात भी मिल सकेगी। इन चिकित्सा पद्धति का पेटेंट आदिवासियों के ही नाम होगा।डॉ. दीपक आचार्य30 अप्रैल, 197 को कटंगी, बालाघाट, मध्यप्रदेश में जन्म, सागर विवि से डॉक्टरेट। इतनी कम उमर में डॉ. आचार्य ने दुनियाभर में नाम कमाया है। उनकी कुछ प्रमुख उपलब्धियाँ गौर करने लायक हैं। मसलन- अमेरिकन दैनिक अखबार द वॉल स्ट्रीट जर्नल में कवर स्टोरी पर आने वाले वे पहले भारतीय हैं। उनके विभिन्न अंतरराष्ट्रीय व राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में दो दर्जन से अधिक शोधपत्रों का प्रकाशन हो चुका है। उन्हें यंग एचीवर्स अवार्ड 2004 से नवाजा जा चुका है।

अंतरराष्ट्रीय इथनोबॉटनी व औषधीय ज्ञान सम्मेलन 2005 में चयनित होने वाले वे इकलौते भारतीय हैं। अमेरिकन लेखिका शैरी एमजेल की पातालकोट के आदिवासियों और उनकी चिकित्सा पद्धतियों पर लिखी किताब में सहयोगी लेखक हैं। अपनी सारी उपलब्धियों का श्रेय डॉ. आचार्य अपनी माताजी को देते हैं, जिनकी प्रेरणा से वे आज इस मुकाम पर पहुँचे हैं।


साभार- वेब दुनिया

बुधवार, 18 जून 2008

पातालकोट घाटी का भारिया जनजीवन

पातालकोट घाटी का भारिया जनजीवन / ध्रुव कुमार दीक्षित

Dikshita, Dhruva Kumāra

2003

प्रकृति में पुराण- पचमढी

प्रकृति में पुराण- पचमढी


पातालकोट, हांडी खोह, धूपगढ, कैथलिक चर्च और क्राइस्ट चर्च भी दर्शनीय स्थान

उत्तर भारत के पर्वतीय स्थलों से हटकर किसी और दिशा में घूमने निकलना हो तो आप मध्य प्रदेश के सबसे ऊंचे स्थान पचमढी पहुंच जाएं। प्रकृति प्रेमियों के लिए यह आदर्श पर्यटन स्थल है। सतपुडा की पहाडियों से घिरा स्थल मध्य प्रदेश के हरे नगीने के समान है। इसे प्रकृति ने बडी तन्मयता से संवारा है। यहां की प्राणदायक शुद्ध वायु सैलानियों में नए जोश का संचार कर देती है। यहां आकर पता चलता है कि नियमित जीवन की आपाधापी से कुछ दिन का अवकाश कितना जरूरी है।

पचमढी में चाहें तो वहां की साफ-सुथरी शांत सडकों पर घूमते रहें या फिर चारों दिशाओं में फैले मोहक स्थानों की सैर कर आएं। यहां मौजूद कई धार्मिक स्थल इस सैरगाह को आस्था से भरपूर एक अलग ही गौरव प्रदान करते हैं, जबकि झरने शीतलता तो देते ही हैं, इसका प्राकृतिक गौरव भी बढाते हैं। शैलाश्रयों में प्राचीन शैलचित्र उत्सुकता जगाते हैं और जंगल प्रकृति के संसर्ग में भटकने को आमंत्रित करते हैं।

पचमढी के देवालय : जटाशंकर एक पवित्र गुफा के रूप में ऊंची-ऊंची चट्टानों के मध्य स्थित है। यहां की रॉक फॉर्मेशन ऐसी है मानो शिव की जटाएं फैली हों। कहते हैं भस्मासुर से बचने के लिए भगवान शिव ने यहीं आश्रय लिया था। यहां पावन शिवलिंग के दर्शन होते हैं। महादेव एक 35 फुट लंबी गुफा में स्थित शिवालय है। यहां निरंतर जल टपकता रहता है। यह शिव भक्तों की आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र है। हर महाशिवरात्रि पर यहां भव्य मेला लगता है। इसके पास ही छोटा महादेव एवं गुप्त महादेव भी पवित्र स्थल हैं। चौरागढ पहाडी का मार्ग पैदल ही तय करना पडता है। करीब चार किलोमीटर का यह पहाडी मार्ग हरियाली से घिरा है। इस पहाडी पर भी एक शिव मंदिर है। जहां त्रिशूल चढाने की परंपरा है। पचमढी को यह नाम पांडव गुफाओं से मिला था, जिन्हें पचमढी यानी पांच कुटी कहा जाता था। मान्यता है कि अपने वनवास के दौरान पांडव कुछ समय इन गुफाओं में रहे थे।

मनमोहक झरने : पचमढी में कई सुंदर झरने है, जिन्हें देखने के लिए घने वृक्षों के मध्य होकर जाना होता है। इनमें बी-फाल, डचफाल और सिल्वर फॉल प्रमुख हैं। ये झरने ऐसे चमकते हैं मानो चांदी पिघल रही हो। इनके पास ही अप्सरा विहार तथा सुंदर कुंड नामक स्थान पर सुंदर जलाशय भी सैलानियों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।

अन्य स्थान : प्रियदर्शनी एक ऐसा व्यू पॉइंट है जहां से प्रकृति के दिलकश नजारे देखने को मिलते हैं। इसके अलावा हांडी खोह, धूपगढ, पातालकोट, कैथलिक चर्च और क्राइस्ट चर्च भी दर्शनीय स्थान हैं। इस तरह देखा जाए तो पचमढी की शांत फिजाओं में 4-5 दिन आराम से बिताए जा सकते हैं।

मंगलवार, 17 जून 2008

जैव विविधता की दृष्टि से समृद्ध क्षेत्र पातालकोट घाटी




जैव विविधता की दृष्टि से समृद्ध क्षेत्र पातालकोट घाटी


पठार की ऊंचाई से 300-400 मी0गहराई में बसी हुई पातालकोट घाटी से
नर्मदा की सहायक दूधी नदी निकलती है।

विश्व प्रकृति निधि ने इस पारिस्थितिक अंचल को संकटापन्न की श्रेणी में रखा है ।

छिंदवाडा जिले में स्थित पातालकोट घाटी जैव विविधता की दृष्टि से नर्मदाघाटी का दूसरा अति समृद्ध क्षेत्र है । पठार की ऊंचाई से 300-400 मी0गहराई में बसी हुई पातालकोट घाटी से नर्मदा की सहायक दूधी नदी निकलती है। यहाँ साल, सागौन और मिश्रित तीनों प्रकार के वन पाए जाते हैं जिनमें 83वनस्पतिक कुलों की 265 से अधिक औषधीय प्रजातियाँ मिलती हैं ।

विश्व प्रकृति निधि द्वारा संवेदनशील पारिसिथतिक अंचलों के वर्गीकरण में नर्मदाघाटी शुष्क पर्णपाती वन को एक विशिष्ट पहचान देते हुए इको रीजन कोड 0207आवंटित किया गया है । यह क्षेत्र रोजर्स और पवार (1988) द्वारा दिए गएजैविक-भू वर्गीकरण के जैवीय अंचल 6ई-सेन्ट्रल हाईलैण्ड्स से मिलता-जुलताहै । उत्तर में विन्ध्य और दक्षिण में सतपुडा पर्वत श्रेणियों से घिरे500 वर्ग कि0मी0 से भी अधिक क्षेत्र में फैले इस अंचल को बाघ संरक्षण कीदृष्टि से अत्यंन्त महत्वपूर्ण क्षेत्र माना गया है ।

इस क्षेत्र में स्तनधारी वर्ग के वन्य प्रााणियों की 76 प्रजातियाँ पाई जाती हैं जिनमेंबाघ, गौर (बॉयसन), जंगली कृष्णमृग आदि सम्मिलित हैं। यहां 276 प्रजातियोंके पक्षी भी मिलते हैं । इसके अतिरिक्त यहाँ सरीसृपों कीटों व अन्य जलीयव स्थलीय प्राणियों की प्रचुर विविधता है ।

विश्व प्रकृति निधि ने इस पारिस्थितिक अंचल को संकटापन्न की श्रेणी में रखा है । इस अंचल मेंविशेषकर सतपुडा पर्वत श्रेणी के वनों में वन्य जैव विविधता की भरमार है ।यह पूरा क्षेत्र प्राकृतिक सौंदर्य, वनस्पतियों वन्य प्राणियों और खनिजोंकी अपार संपदा से भरा पडा है । जैविक विविधता से परिपूर्ण सतपुडा तथाविन्ध पर्वत श्रृंखलाओं के पहाड नर्मदा घाटी को न केवल प्राकृतिक ऐश्वर्यबल्कि समृद्धि और पर्यावरणीय सुरक्षा भी प्रदान करते हैं । वन्य जन्तुओंकी दृष्टि से भी यह पूरा अंचल काफी समृद्ध है । जूलाजिकल सर्वे ऑफइण्डिया के मध्य अंचल कार्यालय जबलपुर द्वारा नर्मदा घाटी में पाये जानेवाले कशेरूकीय प्राणियों की प्रजातियों की संख्या के संबंध में विशेष रूपसे दी गई जानकारी निम्न है ।

http://www.narmadasamagra.org/Bio-diversity

कमलनाथ को भेंट किए धनुष-बाण

02 Feb, 2008, त/">http://www.rajexpress.in
ामिया के पातालकोट के पास बसे कौडिया गांव के मार्डन विलेज परिवार नेकेन्द्रीय मंत्री कमलनाथ को पातालकोट के प्रतीक के रूप में धनुष बाण भेंटकिए। उनके गांव पहुचने पर ग्रामीणों ने परंपरागत आदिवासी नृत्य से उनकास्वागत किया। वही मार्डन विलेज परिवार संस्था के ओम प्रकाश श्रीवास्तव,भारती पतलु, आनंद नीखरा, अजब लाल, विश्राम एवं अन्य सदस्यों ने उन्हेधनुष बाण भेंट किया।

बुधवार, 11 जून 2008

स्व. श्री संपतराव धरणीधर की अंतिम कृति बाबा की डायरी

तीन दिन होंगे साहित्यिक कार्यक्रम

12 Nov, 2007 09:51 PM

स्व. श्री संपतराव धरणीधर की अंतिम कृति बाबा की डायरी व

नगर के उदयीमान कवियत्री मोनालिसा के काव्य संग्रह का विमोचन होगा।


छिंदवाडा। मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन जिला इकाई का 5 वां वार्षिक उत्सव इस वर्ष भी स्थानीय रविन्द्र भवन में 17-18 एवं 19 नवंबर को समारोह पूर्वक मनाया जाएगा।


कार्यक्रम में हिंदी के श्रेष्ठ समीक्षक डा. कमलाप्रसाद सम्मेलन के प्रदेश प्रबंध मंत्री राजेन्द्र शर्मा व प्रसिद्ध व्यंग्यकार जब्बार ढाकवाला आईएएस भोपाल अपनी गरिमामय उपस्थिति देंगे। संस्था के प्रबंध मंत्री पं. राजेन्द्र राही ने बताया कि 17 नवंबर को नन्हें चित्रकारों की चित्रकला प्रतियोगिता के साथ वार्षिक उत्सव का शुभारंभ होगा।


स्थानीय दीनदयाल पार्क में दोपहर 3 बजे से यह स्पर्धा होगी। इस कार्यक्रम में कर्नल आनंद सक्सेना प्रमुख अतिथि के रूप में उपस्थित रहगे। 18 नवंबर को दोपहर 2 बजे से प्रख्यात मूर्तिकार सरस्वती नारद के मुख्य आतिथ्य व श्रीमती एस ब्राउन की अध्यक्षता में अनूठा कार्यक्रम विरासत आयोजित किया गया है जिसमें जिले के प्रसिद्ध शायर व कवियों के पुत्र-पुत्री व बाल साहित्यकार रचनाएं प्रस्तुत करेगे।


इसी दिन रात को जिले के ख्यातिलब्ध गायकों द्वारा शाम ए गजल की प्रस्तुति दी जावेगी जिसमें पी आरोडकर व पदमाकर रोडे विशेष रूप से अपनी उपस्थिति देंगे। 19 नवंबर को दोपहर के सत्र में देश के प्रसिद्ध व्यंग्यकार जब्बार ढाकवाला के मुख्य आतिथ्य में लघु कथा कथन का आयोजन कियया गया है जिसमें जिले के चर्चित कथाकार अपनी लघु कथायें प्रस्तुत करेंगे।


प्रसिद्ध शायर पंकज सक्सेना की अध्यक्षता में रात्रि 8 बजे से डा. कमलाप्रसाद जी का लोक साहित्य का भविष्य विषय पर व्याख्यान होगा। तत्पश्चात स्व. श्री संपतराव धरणीधर की अंतिम कृति बाबा की डायरी व नगर के उदयीमान कवियत्री मोनालिसा के काव्य संग्रह का विमोचन होगा। इस बार जिले की सात विभूतियों को साधना सम्मान प्रदान किया जाएगा। संस्था के जिला प्रमुख हनुमंत मनगटे ने नगर व जिले के समस्त साहित्य,संगीत व कलाप्रेमियों से कार्यक्रम को यादगार बनाने में अपना सहयोग देने कहा है।

http://www.rajexpress.in/newsindetail.htm?newsId=12925&slotId=124

सोमवार, 9 जून 2008

मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले का गोटमार मेला

प्रेमियों की याद में अनोखा मेला

लगभग 80 हजार आबादी वाले पाढुरना नगर और सावर गांव के बीच जाम नदी बहती है। इसी के निकट गुजरी चौक बाजार स्थित राधाकृष्ण मंदिर वाले हिस्से में यह गोटमार मेला लगता है।

इस मेले में भाग लेने के लिए महाराष्ट्र व मध्यप्रदेश के अनेक जिलों से लोग प्रति वर्ष आते हैं।

पत्थरों से मारे गए प्रेमी-प्रेमिका की याद में मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के पांढुरना में प्रत्येक वर्ष भाद्रपद की अमावस्या के दिन आयोजित होने वाले गोटमार मेले को पूरे उत्साह से मनाने की तैयारियां पूरी हो गई है। मराठी भाषा के शब्द गोटमार का अर्थ होता है पत्थरों से मारा जाना।

उल्लेखनीय है कि इस क्षेत्र में मराठी भाषी लोगों की बहुलता है। गोटमार मेले के बारे में कोई दस्तावेजी विवरण उपलब्ध नहीं, है लेकिन क्षेत्र में मान्यता है कि पांढुरना नगर का एक युवक पड़ोसी सावर गांव की युवती पर मोहित हो गया। प्रेमिका को जीवनसाथी बनाने के लिए जब वह अमावस्या के दिन पांढुरना लाने का प्रयास कर रहा था तभी इसे प्रतिष्ठा पर आघात समझ कर सावर गांव के लोगों ने युवक पर पत्थरों की बौछार शुरू कर दी। युवक के गांव के लोगों को जब इसका पता चला तो उन्होंने भी पत्थर बरसाने शुरू कर दिए इससे प्रेमी-प्रेमिका की जाम नदी में मृत्यु हो गई। इसके बाद दोनों पक्षों ने शर्मिदगी के चलते उनके शवों को गांव न ले जाकर निकट के चंडिका देवी मंदिर ले गए और पूजा-अर्चना के बाद वहीं उनका अंतिम संस्कार कर दिया।

इसी घटना की याद में मां चंडिका की पूजा कर प्रत्येक वर्ष भादों माह की अमावस्या को दोनों गांवों के लोग पत्थर बरसाकर एक दूसरे का लहू बहाते हैं। इस युद्ध जैसे आयोजन में सैकड़ों लोग घायल होते हैं। कई तो अपने प्राण भी गवां चुके हैं1 इस मेले में भाग लेने के लिए महाराष्ट्र मध्यप्रदेश के अनेक जिलों से लोग प्रति वर्ष आते हैं। लगभग 80 हजार आबादी वाले पाढुरना नगर और सावर गांव के बीच जाम नदी बहती है। इसी के निकट गुजरी चौक बाजार स्थित राधाकृष्ण मंदिर वाले हिस्से में यह गोटमार मेला लगता है। इस दिन पूरा गोटमार स्थल तोरणों से सजाया जाता है। प्रात: चार बजे जंगल से पलाश के पेड़ को लाकर पूजा-अर्चना के बाद दोनों पक्षों की सहमति से जाम नदी के बीच गाड़ देते हैं इसके बाद एक-दूसरे पक्ष पर पत्थर बरसाने का क्रम शुरू होता है।

पत्थरों का यह युद्ध दोपहर दो बजे से शाम पांच बजे तक पूरे शबाब पर होता है। इसमें घायल हुए लोग मंदिर की भभूत लगाकर पुन: पत्थर से मार करने चले जाते हैं। पांढुरना नगर के लोग शाम छह बजे योद्धा पलाश रूपी वृक्ष को काट कर गगनभेदी नारों के बीच चंडिका मंदिर ले जाकर पूजा-अर्चना करते हैं और मां चरणों में अर्पित करते हैं। इसी के साथ गोटमार मेला समाप्त हो जाता है।

radhika

http://fsy2.com/forums/archive/index.php/t-233.html

अपने गढ़ में ही फंस गए हैं कमलनाथ






अपने गढ़ में ही फंस गए हैं कमलनाथ



सुशील झा, छिंदवाड़ा से. बीबीसी हिन्दी, रविवार, 02 मई, 2004


मध्य प्रदेश की छिंदवाड़ा लोकसभा सीट को राज्य में ‘मदर ऑफ़ ऑल बैटेल्स’ यानी सबसे रोचक और कठिन संघर्ष के रूप में देखा जा रहा है.

यहाँ से पिछले छह चुनाव जीत चुके कांग्रेस महासचिव कमलनाथ मैदान में हैं और इन्हें चुनौती दे रहे हैं केंद्रीय कोयला मंत्री और भाजपा नेता प्रहलाद पटेल.

इन दोनों की लड़ाई को गोंडवाना गणतंत्र पार्टी की उपस्थिति ने तीसरा आयाम दे दिया है.

छिंदवाड़ा उन संसदीय क्षेत्रों में से है, जहाँ 1977 के आम चुनावों में कांग्रेस विरोधी देशव्यापी लहर के बावजूद कांग्रेस का ही प्रत्याशी जीता था.

'प्रहलाद पटेल बाहरी'


कमलनाथ यहाँ से छह बार चुनाव जीत चुके हैं और इस बार यानी सातवीं बार भी अपनी जीत को लेकर आश्वस्त हैं. कमलनाथ को विश्वास है कि इस बार भी जनता उनका ही साथ देगी.
कमलनाथ कहते हैं, ''प्रहलाद पटेल बाहर के हैं और उन पर कई मामले भी चल रहे हैं, प्रहलाद आपराधिक छवि के हैं और लोगों का भरोसा कमलनाथ के साथ है.''

कमलनाथ ने गोंडवाना गणतंत्र पार्टी और भाजपा के बीच साठ-गाँठ का आरोप लगाते हुए कहा कि दोनों ही दल मिलकर कांग्रेस के वोट काटना चाहते हैं.

कमलनाथ यहाँ से सिर्फ़ एक बार 1996 के उपचुनाव में हारे थे लेकिन 1998 और 1999 में वो दोबारा जीत गए.

इससे पहले उनकी पत्नी अलका नाथ भी एक बार चुनाव जीत चुकी हैं.

'कमलनाथ की तानाशाही'


हालांकि भाजपा ने इस बार उनके ख़िलाफ़ केंद्रीय मंत्री और मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री, उमा भारती के ख़ास समझे जाने वाले प्रहलाद पटेल को उतारा है.

प्रहलाद का चुनाव प्रचार युद्ध स्तर पर चल रहा है. इससे पहले प्रहलाद बालाघाट से सांसद रह चुके हैं जबकि छिंदवाड़ा उनके लिए नया संसदीय क्षेत्र है.

पटेल का दावा है कि लोग कमलनाथ के आतंक से त्रस्त हैं.
उन्होंने कहा, ''क्षेत्र में अराजकता का माहौल है, यहाँ तानाशाही चलती है और यहाँ कमलनाथ के गुंडों का आतंक है.''

उन्होंने कमलनाथ को चुनौती देते हुए कहा कि इस बार कमलनाथ हारेंगे क्योंकि गोंडवाना गणतंत्र पार्टी भी उनके वोट काटेगी.

निर्णायक हैं आदिवासी वोट


उधर गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के एकमात्र विधायक मनमोहन शाह आदिवासी वोटों के आधार पर चुनाव जीतने की कोशिश कर रहे हैं.

शाह के सहयोगी और गोंडवाना आंदोलन से जुड़े डीके प्रजापति दावा करते हैं कि इस बार के चुनाव में कमलनाथ की ऐतिहासिक हार होगी और उन्हें एक लाख से भी कम वोट मिलेंगे.

उन्होंने बताया कि अटल के पक्ष में भाजपा प्रत्याशी को ढाई से तीन लाख वोट मिल सकते हैं जबकि शाह को साढ़े तीन लाख वोट मिलने की उम्मीद है.

क्षेत्र में कुल 12 लाख मतदाता हैं जिनमें से 40 फीसदी वोट आदिवासियों के हैं.
जानकारों का मानना है कि शाह के आने से कमलनाथ की मुश्किलें बढ़ गई हैं.
शाह को जो आदिवासी वोट मिल सकते हैं, उन्हें कांग्रेस का आधार माना जाता है.

कमलनाथ भी इस बात को समझ रहे हैं लेकिन वे दावा करते हैं कि वे इसे लेकर चिंतित नहीं हैं.
कई लोग ये मानते हैं कि कमलनाथ अगर जीतते हैं तो जीत का अंतर बहुत अधिक नहीं होगा वहीं कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि इस बार छिंदवाड़ा में कुछ उलटफेर हो सकता है.

परिणाम जो भी हो, लेकिन यहाँ के माहौल से साफ़ पता चलता है कि छिंदवाड़ा को मुख्यमंत्री उमाभारती ने अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया है.

यही वजह है कि अब कमलनाथ के लिए यह चुनाव आसान नहीं रह गया है.

http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2004/05/040502_chhindwara_profile.shtml

शुक्रवार, 6 जून 2008

चुनावी वर्ष में छिंदवाड़ा संभाग अस्तित्व में आ जाएगा।

छिंदवाड़ा संभाग बनाने पर विरोध


पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल -----


प्रशासनिक और भौगोलिक दृष्टि से छिंदवाड़ा को संभाग बनाने का औचित्य नहीं है। अगर संभाग बनाना है तो सिवनी को बनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि एक केंद्रीय मंत्री को खुश करने के लिए ही छिंदवाड़ा को संभाग बनाया जा रहा है।


सत्तापक्ष और विपक्ष के विरोध के बावजूद सीएम अपनी 8 मार्च 08 की घोषणा पर अमल कराना चाहते है। उन्होंने इस बारे में तैयार प्रस्ताव पर अपनी मुहर लगा दी है। बताया जाता है कि छिंदवाड़ा संभाग के गठन संबंधी प्रारंभिक अधिसूचना दो चार दिन में जारी होने की संभावना है। इसके बाद सबकुछ सामान्य रहा तो चुनावी वर्ष में छिंदवाड़ा संभाग अस्तित्व में आ जाएगा।


गणोश साकल्ले

Tuesday, May 27, 2008 01:35 [IST]


भोपाल. भाजपा नेताओं के आंतरिक विरोधों के बावजूद सरकार छिंदवाड़ा संभाग के गठन की अधिसूचना शीघ्र जारी करने जा रही है। सत्ता पक्ष से जुड़े महाकौशल के कुछ नेताओं ने छिंदवाड़ा को संभाग बनाने के बजाय सिवनी को संभागीय मुख्यालय बनाने की बात पार्टी फोरम पर उठाई है। इससे इस मुद्दे पर पार्टी में विवाद की स्थिति बनी हुई है। दूसरी तरफ शहडोल संभाग के गठन की सभी औपचारिकताएं पूरी कर ली गई है। किसी भी दिन शहडोल संभाग का शुभारंभ हो जाएगा। इन दोनों संभागों में कमिश्नर बनने के लिए आईएएस अफसरों ने गोटियां बैठानी शुरू कर दी हैं। छिंदवाड़ा के लिए हाल ही में आबकारी आयुक्त बने अरुण पांडे का नाम चला था।


सूत्रों के मुताबिक सिवनी और बालाघाट के कतिपय भाजपा नेता पार्टी फोरम पर छिंदवाड़ा को संभाग बनाने के खिलाफ अपनी नाराजगी जता चुके है। इनमें मुख्यरूप से सिवनी की सांसद नीता पटैरिया और बालाघाट के सांसद गौरीशंकर बिसेन समेत इन जिलों के कई विधायक शामिल है। इतना ही नहीं कुछ भाजपा नेताओं ने तो मुख्यमंत्री को अपनी भावनाओं से भी अवगत करा दिया है।


किन्तु दैनिक भास्कर से चर्चा में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर ने मंजूर किया कि विरोध है और कुछ भाजपा नेताओं ने उनसे मलाकात कर अपनी पीड़ा उन्हें बताई है। इस समस्या का उन्होंने मुख्यमंत्री से चर्चा कर समाधान करने का उन्हें भरोसा दिलाया है।


दूसरी तरफ पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल का कहना है कि प्रशासनिक और भौगोलिक दृष्टि से छिंदवाड़ा को संभाग बनाने का औचित्य नहीं है। अगर संभाग बनाना है तो सिवनी को बनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि एक केंद्रीय मंत्री को खुश करने के लिए ही छिंदवाड़ा को संभाग बनाया जा रहा है। सत्तापक्ष और विपक्ष के विरोध के बावजूद सीएम अपनी 8 मार्च 08 की घोषणा पर अमल कराना चाहते है। उन्होंने इस बारे में तैयार प्रस्ताव पर अपनी मुहर लगा दी है। बताया जाता है कि छिंदवाड़ा संभाग के गठन संबंधी प्रारंभिक अधिसूचना दो चार दिन में जारी होने की संभावना है। इसके बाद सबकुछ सामान्य रहा तो चुनावी वर्ष में छिंदवाड़ा संभाग अस्तित्व में आ जाएगा।


शहडोल संभाग के गठन की सभी आवश्यक तैयारियां पूर्ण कर ली गई है। सीएम जिस दिन शहडोल जिले के प्रवास पर जाएंगे,संभवत: उसी दिन इस संभाग का शुभारंभ हो जाए। अंतिम अधिसूचना का प्रारुप भी तैयार कर लिया गया है,उसमें तारीख डालकर जारी करने का इंतजार है।


होशंगाबाद संभाग में बैतूल शामिल किया जाएगा-तवा बांध और उसकी नहरें तैयार करने की दृष्टि से होशंगाबाद संभाग बनाया गया था,लेकिन इसमें इकलौता होशंगाबाद जिला ही शामिल था, लेकिन कांग्रेस शासनकाल में होशंगाबाद से हरदा जिला अलग बनाने के बाद मात्र दो जिलों का यह संभाग बना रहा। अब इसमें बैतूल जिले को भी शामिल किया जा रहा है। इसके बाद इस संभाग का नाम बदलकर नर्मदा पुरम किया जाएगा।


इस बारे में भी प्रारंभिक अधिसूचना दो चार दिन में जारी होने की संभावना है। सीएम ने पिछले दिनों होशंगाबाद भ्रमण के दौरान होशंगाबाद संभाग में बैतूल जिले को शामिल कर इसका नाम नर्मदा पुरम करने की घोषणा की थी। संभाग भले ही होशंगाबाद हो,लेकिन इसका दफ्तर भोपाल में ही है और भोपाल कमिश्नर ही होशंगाबाद कमिश्नर रहते आए है। नए सिरे से संभाग के अस्तित्व में आने के बाद इसका कार्यालय भी होशंगाबाद में ही लगने और वहां अलग से कमिश्नर पदस्थ होने के आसार है।


http://www.bhaskar.com/2008/05/27/0805270138_bhopal.html

छिंदवाड़ा में देश का पहला मसाला पार्क

देश का पहला मसाला पार्क छिंदवाड़ा में बनकर तैयार

शशिकांत त्रिवेदी / भोपाल May 25, 2008

देश का पहला मसाला पार्क अगले माह से मध्य प्रदेश के छिंदवाडा में शुरु हो जाएगा। इस पार्क में लहसुन के प्रसंस्करण, मिर्च के सत और आपूर्ति के अलावा सब्जियों में भाप के द्वारा जीवाणुनाशन भी किया जाएगा।


इस मसाला पार्क के बोर्ड के एक अधिकारी ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि 'लहसुन प्रसंस्करण के लिए आवश्यक सिविल वर्क पूरा कर लिया गया है। इसके अलावा लहसुन के निर्जलीकरण और पाउडर बनाने का काम अगले माह से शुरु किया जाएगा।'


उन्होंने बताया कि 'हमनें इसके लिए हरी मिर्च के सैंपल बोर्ड के मुख्यालय में परीक्षण के लिए भेजे है।' परीक्षण के बाद बोर्ड द्वारा प्लांट के आकार और मशीनरी का आकलन किया जाएगा। इस प्लांट में प्रति दिन 6 टन लहसुन का निर्जलीकरण और 0.75 टन मिर्च का सत तैयार किया जाएगा। वैसे न तो छिंदवाड़ा में लहसुन निर्जलीकरण भारी मात्रा में होता है और न ही मिर्च की खेती की जाती है। जनजातीय बहुल यह क्षेत्र सब्जी की खेती के अतिरिक्त अन्य विकल्पों को तलाश रहा है।


इस पार्क के अधिकारियों का कहना है कि पार्क के स्थापित होने से किसानों को काफी फायदा पहुंचेगा। इस पार्क से मसालों के निर्यात के साथ घरेलू बाजार की मांगों की पूर्ति भी की जाएगी। मध्य प्रदेश के उज्जैन, देवास, धार, मंदसौर, गुना, राजगढ़, रतलाम और खंडवा जिलों में लहसुन की खेती की जाती है। इस कारण कुछ साल पहले इन क्षेत्रों में एक कृषि निर्यात क्षेत्र की स्थापना की बात कही गई थी।


http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=3792

रविवार, 1 जून 2008

पहाड़ के उस पार 30 कि.मी. दूर छिन्दवाड़ा

तारीख 27-कमलेश्वर और छिंदवाड़ा

हनुमंत मनगटे

अदीब जानता था, मोंतेजुमा ने उससे जो कहा था-प्रमथ्यु! तुमने तुलसी के पौधे की दाहिनी दिशा में पाताल के अंतिम तल तक पहुंचने का जो जलमार्ग बताया था, गिलगमेश उस पर बहुत आगे बढ़ गया है। वह किसी भी समय स्वप् नगरी पहुंच सकता है। वहां पहुंचते ही वह धन्वन्तरि शुरुप्पक के जिउसुद्दु को जरुर तलाश लेगा। अदीब घर-5116 इरोस गार्डन, सूरजकुंड रोड, नई दिल्ली के करीब पहुंच रहा था।

कार में बगल में गायत्री अर्धांगिनी, कार ड्राइव करता ड्रायवर और तभी एकाएक सांस की गति में अवरोध। दाहिना हाथ एक एक गायत्री के कांधों पर और सिर कांधे से होता हुआ सीने के पास गायत्री के दिल पर। गायत्री के दिल की धड़कनों की गति से निर्मित असामान्य स्थिति। उत्तेजना में ईना की चीख और गिलगमेश की मनुष्य की पीड़ा, दुख, यातना, भय और मृत्यु से उसे उन्मुक्त करने की आवाज गूंजने लगी- मैं पीड़ा से लड़ूंगा यातना सहूंगा-कुछ भी हो मैं अपने मित्र और मनुष्य मात्र के लिये मृत्यु को पराजित करुंगा। मैं मृत्यु से मुक्ति की औषधि खोज कर लाऊंगा।

27 जनवरी 2007 की रात 830 बजे कमलेश्वर ने गिलगमेश को शायद किसी मुसीबत में देख मृत्यु से साक्षात्कार कर 'जलती हुई नदी' में छलांग लगा दी थी और तैरते हुए वह उस समन्दर में पहुंच गये थे गिलगमेश को खोजने, उसकी महायत्रा में हमसफर की भूमिका में। देह से मुक्त हो कमलेश्वर ने पंचतत्व में से जल को स्वीकारा, क्योंकि मृत्यु का रहस्य खोजने गिलगमेश अथाह, अतल समन्दर की गहराई में सदियों से श्रमरत था। वह थके नहीं, वह शिकस्ता हो हाथ पैर चलाने में लस्त पस्त हो जाये, अदीब उसी महायात्रा पर निकल पड़े। लेकिन वह हैं, रहेंगे, ािस्म भले ही हो, किताबों में, यादों में, 'यादों के चिरांग' की रोशनी में।

यादों में कोई नहीं मरता। मरा हुआ जिन्दा हो जाता है, क्योंकि यादों के चिरांग की बतियां एक नहीं अनेक होती हैं, रंगों की अनगिनत बातियां, और उनमें तेल की जगह दौड़ता सतत लाल सुर्ख रक्त, स्वचलित, और इसीलिये उसमें से उभरती प्रकाश की अनवरत जलती रक्ताभ लौ। उस लौ में बार-बार उभर कर सामने आता है एक सांवला, आकर्षक, हर दिल अजीज, सामान्य कद का, विशिष्ट आवाज का बादशाह, जिन्दादिल, उम्र को धोंखा देता, लोगों को कृष्ण की सतत कर्मरत रहने की नसीहत देता-कमलेश्वर।

मेरी यादों में कमलेश्वर, और कमलेश्वर की यादों में छिन्दवाड़ा। यह इत्तेफाक नहीं, कोई अदृश्य तिलस्म है या कमलेश्वर की किमियागीरी...यादों के चिरांग को जलाना बुझाना नहीं पड़ता। बुझाने पर भी नहीं बुझते, ताउम्र। निरन्तर सतत ताजिन्दगी जलते रहते हैं, और उनमें मााी के वीसीडी और डीवीडी के माध्यम से दृश्य आंखों के समक्ष आते रहते हैं तथा आवाजें कानों के जरिये दिल और दिमाग को अहसास दिलाते रहती हैं कि अदीब अपने कांधों को जीयस के गिध्द से लगातार नुचवाते हुए भी गिलगमेश की प्रतीक्षा में, मृत्यु के हाथों सिर्फ नश्वर देह सौंपते हुए, वह आपके रुबरु उपस्थित रहता है, जब भी आपकी आंखें और दिल शिद्दत से चाहते हैं कमलेश्वर को अपने से बतियाते, मुजस्सम।

यादों के चिरांग की रोशनी में एक ही फ्रेम में कमलेश्वर, छिन्दवाड़ा और 27 तारींख...संगायन का उद्धाटन, कहानियों की रात, 7वां समांतर लेखक सम्मेलन, बाबा धरणीधर व्याख्यान माला... यादों में कहीं दृश्य एक दूसरे पर सुपर इम्पोज हो जाये इसलिये क्रमबध्द तरीके से...यानी कमलेश्वर का म।प्र. के छिन्दवाड़ा में पहली बार आगमन। 15 मार्च 1970 कथाकार दामोदर सदन, कवि सं. रा. धरणीधर, समीक्षक प्रवीण नायक, कैलाश सक्सेना और मेरे द्वारा गठित साहित्य, संस्कृति, संगीत केंद्रित संस्था 'संगायन' का उद्धाटन कमलेश्वरजी के हस्ते होने वाला था। साथ ही त्रिदिवसीय आयोजन में विभिन्न कार्यक्रमों के अतिरिक्त कहानी पर केन्द्रित परिचर्चाएं भी थीं।

उन दिनों छिन्दवाड़ा आदिवासी बाहुल्य पिछड़ा जिला था, जिसमें ठहरने के लिये ढंग के सर्वसुविधा युक्त लॉज थे, यातायात के लिये टैक्सियां।कमलेश्वरजी बम्बई से नागपुर आने वाले थे। सुबह 10 बजे के करीब टे्रन नागपुर पहुंचती थी। सवारियों को ढोने वाली एक खटारा सी टैक्सी उपलब्ध हो पाई थी, जिसे लेकर मैं और प्रवीण नायक सीधे नागपुर रेलवे स्टेशन पहुंचे थे। कुछ समय पहले ही टे्रन आकर प्लेटफार्म नं. 1 पर रुकी हुई थी। विलम्ब हो जाने के कारण आत्मग्लानि से भरे हम उन्हें खोजने लगे।

देखा-पास ही एक पोल से टिककर सिगरेट के कश लेता हुआ नीले हाफ बुशशर्ट और फुलपेंट पहने हुए जो खड़ा है, वह कमलेश्वर थे। उन दिनों वे 'सारिका' के सम्पादक थे। करीब पहुंच देरी के लिये क्षमा मांगी तो उन्होंने चिरपरिचित मुस्कराहट के साथ मेरे कंधे पर हाथ रखते हुये कहा, 'कोई बात नहीं हनुमंत। ट्रेन कुछ मिनिट पहले ही आई है, चलो।' इस बीच प्रवीण नायक ने सूटकेस उठा लिया था।

उन्होंने मुझे पहचान लिया था। शायद दस बारह वर्ष के अन्तराल के बावजूद।पहली मुलाकात इसके पूर्व नागपुर में ही प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन में हुई थी, जब उनके साथ राजेंद्र यादव थे। नागपुर से छिन्दवाड़ा का 125 कि.मी. का सफर। ऊबड़ खाबड़ डामररोड और उस पर उछलती टूटरंगी टैक्सी। ड्रायवर की बगल की सीट पर कमलेश्वरजी और हम दोनों पिछली सीट पर। उसके पीछे भी चार लोगों के बैठने लायक सीटें थी।

राह में वे छिन्दवाड़ा और साहित्यिक गतिविधियों की जानकारी लेते रहे। सौंसर में चाय पानी के लिये कुछ देर रुके। सिल्लेवानी घाटी शुरु होने के पहले आमला गांव के पास सड़क के किनारे एक बुजुर्ग आदिवासी टैक्सी रुकवाने के लिये हाथ हिलाता दिखा। उसके साथ दो औरतें थीं। एक प्रौढ़ा और दूसरी विवाहिता नवयुवती, नंगे पैर मैली कुचैली साड़ी पहने। बुजुर्ग-सिर पर छितराये सफेद बाल, रुखे सूखे चेहरे पर बेतरतीब दाढ़ी, शरीर पर मैली सी फतोई और घुटने तक लंगोट की तरह कसी धोती, पैरों में जूते, चप्पलें। ड्रायवर ने उनके करीब पहुंच टैक्सी रोक दी। यह देख प्रवीण नायक ड्रायवर पर उखड़ गया- ड्रायवर, तुमसे बात हुई थी कि कोई भी सवारी नहीं लोगे। जानते हो, हमारे साथ कौन मेहमान हैं? हम वैसे ही लेट हो रहे हैं। हमने पूरी टैक्सी का किराया दिया है। चलो...बढ़ो।

तभी कमलेश्वरजी ने आदिवासियों को गौर से देखते हुए ड्रायवर से कहा-ड्रायवर, उन्हें बैठा लो। उनसे किराया मत सेना। यह थे कमलेश्वर। कुछ देर बाद ही हम थे सतपुड़ा पर्वत की सिल्लेवानी घाटी में रास्ते के एक ओर जितनी गहरी घाटी, दूसरी ओर उतने ही ऊंचे सीध में खड़े पर्वत। पहाड़ के उस पार 30 कि.मी. दूर छिन्दवाड़ा। घुमावदार सर्पीली डामर रोड के चढ़ाव पर रेंगती घर्र-घर्र करती, हाँफती, धुंआ छोड़ती टैक्सी। घाटियां कुहासे से ढंकी। ऊंचे ऊंचे सरपट सीध में खड़े सागौन के पतझड़ के कारण नंगे, नुचे से दरख्त।

मार्च का महिना। लाल सुर्ख टेसू के फूलों से लदे पलाश के दरख्तों से दहकता जंगल। कमलेश्वरजी अभिभूत थे।बम्बई (मुम्बई) लौट कर उन्होंने सारिका में जिक्र किया था छिन्दवाड़ा का, सतपुड़ा का, हरी भरी वादियों का। उनकी यादों में आखिर तक छिन्दवाड़ा और म।प्र. अमिट रहा। उन्होंने छिन्दवाड़ा साहित्य के पुरखे बाबा धरणीधर को जो जिला चिकित्सालय में पिछले छह वर्षों से मौत से लड़ रहे थे, जो पत्र भेजा था, वह... 4-4-99 भाई धरणीधर जी तो मैं सतपुड़ा की पहाड़ियों और जंगलों को भूल सकता हूँ, आपको, मनगटे तथा अन्य मित्रों को। मनीष राय भी यादों में उलझे हुए हैं।

छिन्दवाड़ा, धार, कुक्षी और मांडू भी याद है। दामोदर सदन भी और कुक्षी के रास्ते की वे उत्कीर्ण गुफायें भी और वहां के आदिवासी भी। इस सबको आप जैसे साथियों ने ही तो, मेरी यादों का हिस्सा बनाया है...आप याद हैं तो सब याद है...आपके जीवट का तो कायल था ही, गहरी जिजीविषा का भी अब कायल हूँ। सारी सूचनाएं मनगटे से ही मिली थीं। अभी उनका पत्र भी आया है, किसी एक्सीडेंट के कारण पड़े हैं। आशा है वे भी शीघ्र स्वस्थ्य हो जायेंगे। और जब हम लोग आपसे मिलने पहुंचेंगे तो आपको भी चिकित्सालय से बाहर लायेंगे...और जशन मनायेंगे।

धरणीधर जी...दार्शनिकों ने कहा है वक्त नहीं बीतता, हम बीतते हैं, पर मुझे तो लगता है वक्त बीत रहा है, हम नहीं...हम तो जी रहे हैं और वक्त हमारे साथ जी रहा है! तो मुलाकात के इंतजार के साथ-आपका-कमलेश्वर 7 वां अखिल भारतीय समांतर लेखक सम्मेलन का जिक्र करुं, जो छिन्दवाड़ा में हुआ था, उसके पहले उस पत्र का हवाला यहां देना जरुरी समझता हूँ, क्योंकि कमलेश्वर क्या थे, कैसे थे, पत्र से काफी कुछ स्पष्ट हो जायेगा। साथियों को किस तरह अनुप्रेरित, प्रोत्साहित किया जाता है, उनमें जिजीविषा किस तरह रोपी जाती है, उनके थके, लड़खड़ाते कदमों में किस तरह उर्जा प्रवाहित की जाती है, यह भला कमलेश्वरजी से ज्यादा कौन जानता था। यह उनकी फितरत का विशिष्ट गुण था, जिसे उन्होंने लंबे संघर्ष से अर्जित किया था।

9-5-96 प्रिय मनगटे उस दिन भोपाल में तुमसे आकस्मिक मुलाकात हो गई-जबकि मैं तुम्हारे 3-1-94 के पत्र का जवाब नहीं दे पाया था, पर तुमने क्या लिखा था, यह मुझे याद था। प्रेस बेचकर तुम बुढ़ापे का इंतजाम करना चाहते हो, यह सुनकर तकलीफ हुई। जब मैं बुङ्ढा नहीं हुआ हूँ तो तुम लोग बुढ़ापे की बात कैसे कर सकते हो? यह अधिकार तुम्हें नहीं है एक सच्चाई जरुर है कि अब कोई केंद्रीय पत्र या पत्रिका हमारे पास नहीं है ताकि विचारों का प्रक्षेपण हो सके-तो समांतर की विचारशीलता के लिये अब हमें विकेंद्रित व्यक्ति-केंद्रों की जरुरत होगी। जैसे कि तुम और तुम्हारे साथ 3-4 रचनाकार और॥इस बदलती बाजारु आर्थिक व्यवस्था के विरुध्द हमें वैचारिक प्रतिरोध केंद्र बनाने ही पड़ेंगे, नहीं तो आगे आने वाले समय में हमारा मनुष्य हिरोशिमा की मौत से ज्यादा दारुण गरीबी-निपट गरीबी की मौत मरने के लिये बाध्य होगा! तो सोचो और मुझे अपना बुढ़ापा त्याग कर उत्तर हो! सस्नेह-कमलेश्वर

निष्क्रियता की केंचुल से निकल मेरे बाहर आने में और शिद्दत से सक्रिय होने में इस पत्र की उष्मा ने महती भूमिका अदा की।तो... संक्रमण काल था वह। परीक्षा की घड़ी भी थी। उनके लिये जो समांतर से जुड़े थे और कमलेश्वरजी के लिये भी, क्योंकि टाइम्स ऑफ इंडिया के मालिक तत्कालीन मोरारजी देसाई की सरकार के दबाव में कमलेश्वरजी को 'सारिका' से अलग कर टाइम्स से बाहर करना चाह रहे थे। और कमलेश्वरजी लड़ रहे थे सिध्दांतों की लड़ाई। वह व्यक्ति जिसने अपनी शर्तों पर ऊंचे से ऊंचा पद स्वीकारा और एक झटके में छोड़ा भी किसी भी बड़े से बड़े दबाव में नहीं आने वाला था। 7 वां समांतर कहां हो तय नहीं हो पा रहा था। शायद सितंबर-अक्टूबर 77 में दामोदर सदन भोपाल में थे, सूचना प्रसारण विभाग में, फोन पर चर्चा के दौरान मैंने कहा था कि संभव हो तो छिन्दवाड़ा में सम्मेलन करने का भार मैं उठाने को तैयार हूँ। वे भाई साहब से चर्चा कर देखें।

कुछ दिन बाद ही कमलेश्वरजी का फोन गया था। उन्होंने स्वीकृति और तिथि भी दे दी थी।बाद-जितेंद्र भाटिया जो महासचिव थे, से संपर्क और पत्र व्यवहार होता रहा था सम्मेलन की रुपरेखा के संबंध में तैयारी के बारे में। हर क्षण बदलने वाली स्थिति। कुछ भी अप्रत्याशित घट जाने की हर पल संभावना। किस क्षण अपने ही दोस्त पाला बदल दुश्मन की गोद में बैठ हथियार ले वार करने पीठ पीछे खड़ा हो जाये। ऐसे नाजुक वक्त में बम्बई (मुंबई) एक पल के लिए भी छोड़ना समझदारी भरा कदम नहीं होता, लेकिन कमलेश्वरजी अपनी प्राथमिकताओं के बरक्स बड़े से बड़े हादसों से रुबरु होने में नहीं झिझकते थे।

वह 27 और 28 जनवरी 78 को छिन्दवाड़ा में थे, करीब दो ढाई सौ साहित्यकारों के बीच जिनमें 150 के करीब देश के हर कोने से वरिष्ठ और युवा कथाकार, उपन्यासकार, समीक्षक सम्मेलन में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज करा चुके थे। वह छिन्दवाड़ा में थे यानी छिन्दवाड़ा से नागपुर 4 घंटे और नागपुर से बम्बई टे्रन से 14 घंटे अर्थात 18 घंटे के अन्तराल पर जबकि हर लम्हा सिर पर लटकी तलवार सा पैना, जानलेवा। लेकिन चेहरे पर कोई शिकन नहीं। लगता ही नहीं था कि वह एक बड़ी लड़ाई के मोर्चे पर हैं, जिसका सम्बन्ध व्यक्ति विशेष से नहीं पूरी साहित्यिक बिरादरी से है। यह लड़ाई विचारों की, सिध्दान्तों की, प्रतिबध्दता की थी, जिसमें राजनैतिक सत्ताधारी दक्षिणपंथी पक्ष पूंजीपतियों के पीठ पर हाथ रखे हुए थे।उस सम्मेलन में जो प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया गया था, उस दो पृष्ठों के प्रस्ताव का मजमून प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई और गृहमंत्री चरणसिंह को तार से भेजा गया था, क्योंकि उन दिनों टेलीप्रिन्टर या फैक्स की सुविधा छिन्दवाड़ा में उपलब्ध नहीं थी। स्मृति में जो नाम हैं, जिनके हस्ताक्षर पारित प्रस्ताव में थे वे सर्वश्री कमलेश्वर, जितेंद्र भाटिया, कमला प्रसाद, असगर अली इंजीनियर, दयापवार, मधुकर सिंह, सूर्य नारायण रणसुंभे, आलम शाह खान, देवेश ठाकुर, प्रीतम पंछी, धूमकेतु, बलराम, ज्ञानरंजन, धीरेंद्र अस्थाना, शंकर पुण्ताम्बेकर, सतीश कालसेकर, झा, दामोदर सदन, मनीष राय, नरेंद्र मौर्य, संजीव, तेजिन्दर, शौरिराजन, विभु खरे, राजेंद्र पटोरिया, हंसपाल, राजेंद्र शर्मा, विभुखरे, ललित लाजरस, मदन मालवीय, सं। रा. धरणीधर, हनुमंत मनगटे आदि।

इत्तेफाक है कि 27 जनवरी 07 को अदीब महायात्रा पर निकल गया। ठीक 29 वर्ष पूर्व 27 जनवरी 78 को वह छिन्दवाड़ा में था। 27 तारीख कमलेश्वर और छिन्दवाड़ा। हमेशा विषम स्थितियां ही जन्मी।एक और वाकिया। मेरे आग्रह पर बाबा धरणीधर व्याख्यान माला (म।प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन छिन्दवाड़ा का आयोजन) में वर्ष 2004 में 'विमर्शों की भीड़ में गुमशुदा आम आदमी' विषय पर भाषण देने कमलेश्वर आने वाले थे। 27 नवंबर 04 को संध्या 5.45 बजे .पी. सुपरफास्ट टे्रन से नागपुर के लिये दिल्ली से वह रवाना होने वाले थे। 26 की रात फोन पर चर्चा भी हो गई थी।

मैंने कहा था कि नागपुर में कथाकार डॉ. गोविंद उपाध्याय और दैनिक भास्कर नागपुर के सम्पादक प्रकाश दुबे 28 की सुबह उन्हें कार से उन्हें छिन्दवाड़ा ले आयेंगे। तब उन्होंने कहा था-हनुमंत, इन दिनों भागदौड़ नहीं होती है, उम्र के इस पड़ाव पर। ऐसा करो, तुम जाओ नागपुर या किसी को भेज दो। नागपुर से सीधे छिन्दवाड़ा के लिये रवाना हो जायेंगे। रास्ते में कहीं पर भी चाय बिस्कुट ले लेंगे। मैंने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा था कि जैसा वह चाहते हैं, वैसा ही करुंगा।

दूसरे दिन उनके रवाना होने के पहले एक बार फिर रिंग करुंगा, यह भी कहा था। 27 को बात नहीं हो पाई। उसके पूर्व ही सुबह 11 बजे उनके ड्रायवर नरेंद्र का फोन गया कि भाई साहब को सांस लेने में तकलीफ होने के कारण डॉ. बत्रा के अस्पताल में भरती कर दिया गया है और इस वक्त आई.सी.यू. में हैं। अस्पताल जाने के पूर्व ही उन्होंने फोन पर सूचित करने को कह दिया था।दस-पंद्रह दिन बाद अस्पताल से लौटकर महिना भर अस्पतालों के चक्कर आपरेशन, फिर आराम कर फिर से लेखन और अन्य गतिविधियों में सक्रिय हो गये, यह उनसे जुड़े सभी की जानकारी में है।

दिल्ली के बाहर जाने के नाम पर सिर्फ बेटी मानू और दामाद आलोक के यहां भोपाल तक का सफर वे सपत्नीक करते थे, उस हादसे के बाद। मेरे कहानी संग्रह 'गवाह चश्मदीद' पर समीक्षात्मक आलेख (ही कहूंगा) उन्होंने लिखा था। पिछली दीवाली मनाने वह गायत्रीजी के साथ बेटी मानू के यहां भोपाल गये थे। फोन पर उन्होंने बताया था कि तीन चार दिन बाद वह दिल्ली लौट रहे हैं। मैंने जिक्र भी किया था कि 'गवाह चश्मदीद' छप गई है। 'शिल्पायन' के ललित शर्मा ने ही छापा है, जिन्होंने इसके पूर्व 'पूछो कमलेश्वर से' कहानी संग्रह छापा था। सिर्फ कवर छपने का रह गया है, जिसे 26, 27 अक्टूबर 06 (तीन चार दिन बाद) तक छापकर कुछ प्रतियां देने का वादा उन्होंने किया है।मैं प्रथम प्रति उन्हें भेंट करने हेतु रहा हूँ।

उन दिनों मैं भी अपनी बेटी वंदना गाटेकर के यहां सपत्नीक खेतड़ी नगर (राजस्थान) गया था, जहां से दिल्ली करीब 180 कि।मी. पर है। उनसे आखिरी बार मुलाकात का मौका इसलिये चूक गया कि दीवाली की छुट्टियों के कारण प्रेस के कर्मचारी काम पर नहीं लौटे और इसलिये कवर छपने से रह गया। किताब मिलने और ललित के घर पर ही शाम हो जाने, शाहदरा से सूरजकुंड की दूरी अधिक होने के कारण मैं उनके घर नहीं जा पाया, क्योंकि हमें बेटी को गुड़गांव से लेते हुए खेतड़ी भी लौटना था। उस दिन भी 26 या 27 तारीख थी। कमलेश्वर से जो अंतिम पत्र मिला था उसमें 'आराम' पर जोर दिया गया था। क्या वह थक रह थे? क्या जिस्म कभी भी साथ छोड़ सकता है, का अहसास उन्हें होने लगा था?

10-1-05 प्रिय मनगटे, तुम्हारा पत्र और छिन्दवाड़ा के प्रेम का प्रतीक लम्बा अनुशंसा पत्र भी मिला था। अभिभूत हूँ...क्या कहूँ... वैसे अच्छा ही हुआ कि 27 की सुबह ने तबियत से आगाह किया, नहीं तो मामला बिगड़ सकता था।27-11-04 से आज तक तीन बार एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टीटयूट और बत्रा हॉस्पीटल के आईसीसीयू में रहना पड़ा। एस्कॉर्ट्स में एक बड़ा आपरेशन भी हो गया। धमनियां साफ करने का। खैर.... अब तबियत सुधार पर है।

मेरा नया वर्ष 15-20 दिनों बाद शुरु हो सकेगा। प्यार और स्नेह सहित- कमलेश्वर बस आराम, आराम, आराम...बोलना चालना भी मना है। थकान होती है। ....... उनके संपर्क में आने के बाद 'जो मैंने जिया' और अब तक जो पाया, वह 'जलती हुई नदी' में तैरकर किनारे पर पहुंच 'यादों के चिरांग' रोशन कर, आगे का सफर तय करते हुए, अदीब से रुबरु होने के इंतजार की कहानी लिखने में व्यस्त होना श्रेयस्कर होगा। कहानियां ऐसे ही लिखी जाती है ? कमलेश्वर की आत्मसंस्मराणत्मक किताबें - जो मैंने जिया, जलती हुई नदी और यादों के चिराग।

38 विवेकानंद नगर

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