मंगलवार, 23 मार्च 2010

छिंदवाडा में जनम लिया हमारी निर्मल मां ने ..........

सहजयोग का मुख्य लक्ष्य दुनिया के हर कोने में प्रेम पहुंचाना है इसके लिए साधकों को अपने ध्यान की गहराई प्राप्त करना होगी। जब तक हम स्वयं को नहीं बदलेंगे, दुनिया में परिवर्तन नहीं ला पाएंगे
- वी के कपूर, सेवानिवृत मेजर जनरल

  • छिंदवाडा के आसपास के गांवों में भी चल रहा है सहजयोग का प्रचार प्रसार
  • एलसीडी प्रोजेक्टर की सहायता से साधकों को दिया जा रहा आत्मसाक्षात्कार
  • इस कार्य के चलते अब माताजी निर्मलादेवी की जन्मस्थली पहुंच रहे हैं लोग
सहजयोग प्रणेता परम पूज्य श्रीमाता जी निर्मला देवी जन्मोत्सव कार्यक्रम के दूसरे दिन पूरे देश से आए सहज योगी भाई, बहनों ने सहज भजनों की प्रस्तुतियां दी । सहजी बच्चों ने कल्चरल प्रोग्राम प्रस्तुत किए । भजनों पर साधक झूम उठे । गायक दीपक वर्मा के भजन देर रात तक चलते रहे ।

रानी की कोठी पर चल रहे जन्मोत्सव कार्यक्रम अन्तर्गत सम्पन्न कार्यशाला को संबोधित करते हुए सेवानिवृत मेजर जनरल वी के कपूर ने तनाव प्रबंधन पर अपने अनुभव सुनाए । साथ ही आपने एडवांसमेंट आफ सहजयोग पर प्रकाश डाला । आपने बताया कि सहजयोग का मुख्य लक्ष्य दुनिया के हर कोने में प्रेम पहुंचाना है । इसके लिए साधकों को अपने ध्यान की गहराई प्राप्त करना होगी। जब तक हम स्वयं को नहीं बदलेंगे, दुनिया में परिवर्तन नहीं ला पाएंगे। श्री सुरेश कपूर ने भी विचार व्यक्त किए । बाहर से आए सहजी भाई, बहनों ने अपने संस्मरण सुनाए । उन्होने बताया कि वे सहज ध्यान पद्धति के द्वारा आज सभी क्षेत्रों में तरक्की कर रहे हैं।

सहजयोग का प्रचार प्रसार छिंदवाडा के आसपास के गांवों में भी चल रहा है । गुजरात के श्री राजेश गुप्ता ओर राजस्थान के श्री भगवतीसिंह द्वारा छिंदवाडा के सहजीसाधकों की सहायता से साधकों को एलसीडी प्रोजेक्टर ओर मानव सूक्ष्म तंत्र की सहायता से आत्मसाक्षात्कार दिया जा रहा है । इस कार्य के चलते लोग अब माताजी की जन्म स्थली पहुंच रहे हैं । श्री गुप्ता और श्री सिंह ने बताया कि छिदवाडा के तकरीबन सभी गांवों में प्रचार प्रसार ओर आत्मसाक्षात्कार का कार्य पूर्ण किया गया है, जोकि अपने आप में एक मिसाल है।

बुधवार, 17 मार्च 2010

अवधेश तिवारी, रेडियो एनाउंसर


परिचय
नाम- अवधेश तिवारी
पिता- श्री रामगोपाल तिवारी
माता- श्रीमती दुर्गा बाई
जन्मतिथि- ०३ जनवरी, १९५९
जन्मस्थान- पिपरियारत्ती (कपूर्धा)
जिला- छिन्दवाड़ा (म.प्र.)
शिक्षा- एमए (हिन्दी साहित्य)
सम्प्रति- आकाशवाणी छिन्दवाड़ा में वरिष्ठ उद्घोषक के पद पर कार्यरत


अवधेश तिवारी
वरिष्ठ उद्घोषक , आकाशवाणी छिन्दवाड़ा
प्लॉट नं. -१२०, शिक्षक नगर,
छिन्दवाड़ा (.प्र)
दूरभाष- ०७१६२-२३८२३८
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बुधवार, 10 मार्च 2010

सहजयोग आज का महायोग

विश्व को सहजयोग का ज्ञान देने वाली परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी का जन्म स्थल होने का गौरव छिंदवाडा को प्राप्त है।

नागपुर रोड पर कोतवाली के बाजू में श्री माताजी का घर है और यही पर जागतिक आश्रम है.
पहले सहज योग को छिंदवाडा के अलावा सारा विश्व जानता था पर अब छिंदवाडा के लोगो ने भी सहज का आनंद लेना शुरू कर दिया है।

प्रति शुक्रवार को शाम 7 बजे और प्रति रविवार को सुबह 10 बजे यहाँ पर सामूहिक ध्यान होता है.
यह पूरी तरह नि;शुल्क है।

छिंदवाडा में सहज योग सेण्टर के लीडर अड्वोकेट प्रसन्न बाकलीवाल है . किसी भी तरह की जानकारी के लिए उनसे मोबाइल न. 9827260896 पर बात कर सकते है .

K.C.Harjani
AJAY TELECOM,
Chhindwara. MP
9202701001

मंगलवार, 9 मार्च 2010

बाबा का जन्मदिन, सतपुड़ा के पुरखा संपतराव धरणीधर का जन्मदिन


  1. मेरे खास दोस्त 'रेडियो' के जरिए हुई थी बाबा से मुलाकात
  2. जब मिला तब बाबा धरणीधर पार कर चुके थे 75 बसंत
ऐसी ही किसी मुलाकात में बाबा ने मेरे सामने अपना पत्र लेखक बनने का प्रस्ताव रखा। मैंने सहर्ष इसे स्वीकार कर लिया। इसके बाद मैं लगभग रोजाना बाबा के पास जाने लगा। पहले सात नंबर और बाद में ग्यारह नंबर कमरे में।

बाबा का व्यक्तित्व ऐसा था, जो छोटे-बड़े सभी को अपनी ओर आकृर्षित करता था। बाबा सभी से बहुत दोस्ताना अंदाज में मिलते और बतियाते थे। बाबा की यादों को मैं कभी भी बिसरा नहीं सकता। मुझे इस बात का हमेशा अफसोस रहेगा कि मैं उनके अंतिम समय में उनके पास नहीं था।
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आज है 10 मार्च। बाबा का जन्मदिन। यानी सतपुड़ा के पुरखा बाबा संपतराव धरणीधर का। 'मुझे फांसी पर लटका दो ... कि मैं भी एक बागी हूं' वाले बाबा। 'किस्त-किस्त जिंदगी' के रचयिता। जब मैं बाबा से मिला वे ७५ बसंत पार कर चुके थे। बाबा से मेरी मुलाकात मेरे खास दोस्त 'रेडियो' के जरिए ही हुई। बाबा का कविता पाठ, इंटरव्यू मैंने आकाशवाणी छिंदवाड़ा से सुना था। जिसमें उनकी बातचीत और कविताओं ने मुझे आकृर्षित किया था। इसके साथ ही यह बात भी मुझे उनकी तरफ खींच रही थी कि वे मेरे गांव तन्सरामाल के नजदीकी कस्बे मोहखेड़ के रहने वाले थे।

उस समय मैं छिंदवाड़ा शहर में ही रहकर कॉलेज की पढ़ाई कर रहा था। आकाशवाणी जाने का सिलसिला मेरा लगातार जारी था। यही मेरी मुलाकात कार्यक्रम अधिकारी श्री अमर रामटेके जी से हुई। वे उन दिनों बस स्टेशन के पास यादव लॉज में रहते थे। उनसे वहां कई मुलाकातें हुई। एक मुलाकात के दौरान मैंने उनसे बाबा के बारे में पूछताछ की। उन्होंने जिला अस्पताल के कमरा नं। पांच में जाने को कहा। अस्पताल पहुंचने में मुझे पता चला कि वे अब दूसरे कमरे में है। काफी मशक्कत के बाद बाबा से मुलाकात हो गई। फिर मेरी उनसे लगातार मुलाकात होने लगी। ऐसी ही किसी मुलाकात में बाबा ने मेरे सामने अपना पत्र लेखक बनने का प्रस्ताव रखा। मैंने सहर्ष इसे स्वीकार कर लिया। इसके बाद मैं लगभग रोजाना बाबा के पास जाने लगा। पहले सात नंबर और बाद में ग्यारह नंबर कमरे में।

बाबा के पास जाने से मुझे छिन्दवाड़ा के साहित्यिक परिदृश्य को समझने में आसानी हुई। बाबा के कमरे में पाठक मंच (किताबों की समीक्षा के लिए प्रदेशभर के जिलों में गठित इकाई) की बैठक होती थी। उन दिनों से ही पाठक मंच के संयोजक श्री ओमप्रकाश 'नयन' जी थे। इसके अलावा कई कवि गोष्ठियां बाबा के कमरे में होती थी। बाहर से आने वाले उनकी पीढ़ी के कई वरिष्ठ कवि, साहित्यकार भी गोष्ठियों में शामिल होते थे। जिनमें इंदौर के स्वर्गीय नईम जी का नाम मुझे याद आ रहा है।

सन् 95 मैंने कविता लिखना शुरू कर दिया थ। कविता क्या थी तुकबंदी ज्यादा हुआ करती थी। इसके अलावा दो और चार लाइनें। जिन्हें हम शायरी कहकर मुगालते में रहते थे। पहली मुक्तछंद की कविता मैंने 2001-2002 में लिखी होगी। बाबा से मिलने के बाद मैंने एक कविता बाबा पर ही लिख डाली। जो डीडीसी कॉलेज की मैग्जीन में छपी थी। बाबा से मैंने अपनी आतंकवाद वाली कविता के लिए बातचीत की थी।

बाबा को जब कभी भी बाहर किसी कार्यक्रम में जाना होता था हम यानी राम (बाबा का सहायक) और मैं लेकर जाते थे। हम अक्सर बाबा को लेकर हिन्दी प्रचारिणी और टाउन हॉल जाया करते थे। बाबा से अक्सर मिलने वालों में हनुमंत मनगटे जी, सलीम जुन्नारदेवी जी, लक्ष्मीप्रसाद दुबे जी, राजेद्र राही जी, नयन जी, व्योम जी और कई नाम शामिल थे।

बाबा का व्यक्तित्व ऐसा था, जो छोटे-बड़े सभी को अपनी ओर आकृर्षित करता था। बाबा सभी से बहुत दोस्ताना अंदाज में मिलते और बतियाते थे। बाबा की यादों को मैं कभी भी बिसरा नहीं सकता। मुझे इस बात का हमेशा अफसोस रहेगा कि मैं उनके अंतिम समय में उनके पास नहीं था।

रामकृष्ण डोंगरे 'तृष्णा'