बुधवार, 24 नवंबर 2010

केंद्र ही भूल गया पातालकोट

छिंदवाड़ा ज़िले में स्थित पातालकोट क्षेत्र प्राकृतिक संरचना का एक अजूबा है. सतपुड़ा पर्वत श्रेणियों की गोद में बसा यह क्षेत्र भूमि से एक हज़ार से 1700 फुट तक गहराई में बसा हुआ है. इस क्षेत्र में 40 से ज़्यादा मार्ग लोगों की पहुंच से दुर्लभ हैं और वर्षा के मौसम में यह क्षेत्र दुनिया से कट जाता है.
पातालकोट 89 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है. यहां कुल 12 गांव और 27 छोटी-छोटी बस्तियां हैं, लेकिन आज़ादी के 40 वर्ष बाद 1985 में इस क्षेत्र के सबसे बड़े गांव गैलडुब्बा को पक्की सड़क से जोड़ा गया. अभी 12 गांव और 27 बस्तियां सड़क सुविधा से अछूती हैं.
पातालकोट में भारिया जनजाति सदियों से बसी हुई है, लेकिन आज़ादी के छह दशक बाद भी यह क्षेत्र विकास की मुख्यधारा से बुरी तरह कटा हुआ है. कहने को तो विकास और जनकल्याण की तमाम योजनाएं इस क्षेत्र में काग़ज़ों पर लागू है, लेकिन सरकारी तंत्र की लापरवाही और लालची प्रवृत्ति के कारण इस क्षेत्र के ज़्यादातर लोगों को सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों का लाभ नहीं मिल रहा है. सरकारी काग़ज़ी हिसाब बताता है कि इस इलाक़े के विकास के लिए सरकार ने 400 करोड़ रुपयों से ज़्यादा खर्च किया है. यह जानकारी तीन साल पुरानी है. तब कांतिलाल भूरिया कांग्रेस के लोकसभा सांसद थे और एक समिति के ज़रिए इस क्षेत्र के विकास और जनकल्याण कार्यक्रमों की जांच भी की गई थी. भूरिया ने इस जांच में गहरी रुचि दिखाई थी, लेकिन जांच के नतीजों और उसके बाद सरकार द्वारा की गई सुधारात्मक कार्यवाहियों के बारे में कोई जानकारी नहीं है. यह सुखद संयोग है कि कांतिलाल भूरिया ही आज देश के आदिम जाति कल्याण मंत्री हैं. उनके मंत्रालय में देश की जनजातियों और वनवासियों के विकास और कल्याण के लिए हर साल अरबों रुपये खर्च होता है. बेहतर होगा कि कांतिलाल भूरिया पातालकोट के प्रति संवेदनशील मानवीय दृष्टिकोण अपनाएं और विकास की दृष्टि से उपेक्षित गरीबों और अभावग्रस्त लोगों को जनकल्याण और विकास के कार्यक्रमों का लाभ दिलाने की पहल करें.

1985 में बनी पहली सड़क

पातालकोट 89 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है. यहां कुल 12 गांव और 27 छोटी-छोटी बस्तियां हैं, लेकिन आज़ादी के 40 वर्ष बाद 1985 में इस क्षेत्र के सबसे बड़े गांव गैलडुब्बा को पक्की सड़क से जोड़ा गया. अभी 12 गांव और 27 बस्तियां सड़क सुविधा से अछूती हैं.

50 साल बाद झंडा फहराया

भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ था, लेकिन पातालकोट में 50 साल बाद 1997 में पहली बार स्वतंत्रता दिवस के दिन स्कूल में तिरंगा झंडा फहराया गया.
सरकारी योजनाओं का हाल यह है कि 1998 में यहां 369 बच्चों में से एक ही बच्चे को विभिन्न प्रकार के टीके लगे थे. यहां शिशुमृत्यु दर और मातृमृत्यु दर सबसे ज़्यादा है.

आंगनवाड़ी केन्द्र बना अफसरों का विश्रामगृह

कहने को 2007 में यहां सरकार ने आंगनवाड़ी केंद्र खोला और बच्चों को स्वास्थ्य सेवाएं तथा पोषण आहार उपलब्ध कराने की व्यवस्था की, लेकिन समय पर चिकित्सा सामग्री और पोषण आहार सामग्री नहीं मिलने से यह केंद्र नियमित काम नहीं करता है.
मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने 3 फरवरी 2007 को पक्के आंगनवाड़ी केंद्र का लोकार्पण किया था, तब उनके साथ शासन के मंत्री, विधायक और ज़िले के कलेक्टर सहित आला अफसर भी पातालकोट में उतरे थे. मुख्यमंत्री ने आंगनवाड़ी केंद्र में रात बिताई और उसके बाद कलेक्टर ने उसमें ताला लगा दिया, अब यह केंद्र ज़िले के छोटे अफसरों के दौरे के समय उनके विश्रामगृह के रूप में काम में लाया जाता है. आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अपने घर से ही काम करती हैं, लेकिन सामग्री के अभाव में वह भी काम करना बंद कर देती हैं.

प्रसव और चिकित्सा के लिए 25 किलोमीटर का लंबा रास्ता

पातालकोट के ग्रामीणों को सरकारी चिकित्सा एवं प्रसव सुविधा का लाभ लेने के लिए अपने गांव से 25 किलोमीटर दूर तामिया जाना होता है। सरकार ने मातृ मृत्यु दर और शिशुमृत्यु दर कम करने के लिए घरों में परंपरागत दवाइयों द्वारा प्रसव कराने पर रोक लगा दी है और संस्थागत प्रसव अर्थात अस्पतालों में प्रसव कराने पर उचित प्रोत्साहन राशि देने का नियम बनाया है, इसके साथ ही कन्या जन्म पर लाडली लक्ष्मी योजना के तहत सरकार कन्या के फिक्स डिपॉजिट भी देती हैं जो कि कन्या के वयस्क हो जाने पर एक लाख रुपए की राशि के रूप में उसे मिलता है. इसलिए सरकारी अस्पताल में प्रसव कराने का लालच इस इलाक़े के अभावग्रस्त और ग़रीब लोगों में बढ़ता जा रहा है, लेकिन पूरे इलाक़े में आसपास कोई अस्पताल है ही नहीं. मजबूरी में यहां के निवासियों को अपनी गर्भवती महिला को पांच किलोमीटर पैदल डोंगरा गांव तक ले जाना होता है और फिर वहां घंटों इंतजार के बाद बस या ट्रक के जरिए 25 किलोमीटर दूर तामिया सरकारी अस्पताल पहुंचना पड़ता है. अस्पताल में गर्भवती महिला को यदि सरकारी डॉक्टर ने भर्ती कर लिया तो ठीक, वरना और भी कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. यही हाल गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों का हैं, इन्हें भी तामिया ही इलाज के लिए जाना होता है.
चौथी दुनिया से साभार

छिंदवाड़ा, जहाँ एसबर्न का बनवाया तालाब अशरफ का हो गया है


छिंदवाड़ा में आज भी सौ, डेढ़ सौ साल पुराने चार कुएँ मौजुद हैं जो सबको पानी देते हैं। इनमें बैरिस्टर प्यारेलाल के बगीचे का कुआँ, कलेक्टोरेट के सामने की मुंडी कचहरी का कुआँ जिसकी समतल छत कटनी पत्थर की है, एक झरने को बाँधकर कुण्ड की तरह बनाया गया कुण्डी कुआँ और 1955 में खोदा गया नगर पालिका का कुआँ। 1998 में जिले में 4800 कुंए और 8 तालाब थे और 1955 तक 7-8 हजार कुएँ बन गए थे। इन कुओं के अलावा कुलबेहरा नदी पर बाँध बनाकर भी छिंदवाड़ा को पानी दिया जाता है। यह कुलबेहरा नदी पेंच नदी में मिलती है, पेंच कन्हान में और कन्हान नदी वैनगंगा में मिल जाती है। कहते हैं कि कुलबेहरा नदी के तल में ज्वालामुखी है। ‘डोह’ का मतलब होता है मुख जैसे- प्रतापडोह आदि। ‘रीड एवं रट्लेज’ की भू-गर्भ शास्त्र की किताब के अनुसार कुलबेहरा नदी में 48 से 50 तक ज्वालामुखी हैं। शायद इसके कारण ही यह नदी बारामासी बनी रहती है।

Author:
राकेश दीवान

गोंडों के देवगढ़ राज्य और आज के छिंदवाड़ा इलाके में कुएँ, झिरियाँ और कहीं-कहीं बावड़ियाँ ही पानी के स्रोत हैं लेकिन जिले के सदर मुकाम में कई पुराने तालाब आज भी मौजूद हैं।

सन् 1818 ईस्वी में परकोटे वाले आज के छिंदवाड़ा शहर का वह हिस्सा बनना शुरू हुआ था जिसे चिटणीसगंज कहते हैं। मराठी में चिटणीस का अर्थ होता है। सचिव या लेखाकार। 1818 से 1830 के बीच भोंसलों के सचिव रहे ये चिटणीस। इनके पास भोंसलों का खजाना था और इसकी सुरक्षा के लिए परकोटे का निर्माण करवाया गया था। बाद में अंग्रेजों ने परकोटे में कमानिया गेट भी बनवाया था। जिले का एक व्यापारिक कस्बा पांढुर्णा छीतू पिंडारी की पहल पर पिंडारियों ने बसाया था। 1904 ईस्वी में ‘बंगाल-नागपुर रेलवे’ कम्पनी ने नागपुर से छिंदवाड़ा होते हुए जबलपुर जाने वाली छोटी लाइन की गाड़ी चलाई थी। उस समय इस रेल का ढीली-ढाली चाल और अव्यवस्था के कारण मजाक में ‘बी नेवर रेगुलर’ यानि समय पर कभी नहीं कहा जाता था।

सन् 1954 में छिंदवाड़ा जिला बना था और उसके पहले कलेक्टर शेक्सपियर बनाए गए थे। जिले में बीके बोल्टम, केप्टन गार्डन और बोल्टेस आदि के बाद 1864 से 1867 के बीच मेजर एसबर्न डीसी बना। उसे दुबारा 1869 में फिर छिंदवाड़ा का कलेक्टर बनाया गया। मेजर एसबर्न ने छिंदवाड़ा में पानी की आपूर्ति करने के लिहाज से बीच शहर में 1864 के आसपास एक तालाब बनवाया था जो आज भी ‘अशरफ’ या ‘एसबर्न’ तालाब के नाम से जाना जाता है। इसी दौर में अंग्रेजों का खजाना और सम्पन्न जैन सेठ-साहूकरों की सुरक्षा के लिए गोलगंज मोहल्ले और उसके आसपास के इलाके को घेरकर परकोटे तथा कमानिया गेट का पुनर्निर्माण भी करवाया गया था।

इन तालाबों के अलावा शहर में जल आपूर्ति का प्रमुख साधन कुएँ ही थे। छिंदवाड़ा पहाड़ी, पठारी और मैदानी तीन तरह के क्षेत्रों में बाँटा जा सकता है। पहाड़ी क्षेत्रों में जुन्नारदेव, हर्रई, तामिया आदि इलाके हैं, पठारी क्षेत्रों में चौरई. छिंदवाड़ा, अमरवाड़ा, परासिया तथा मैदानी क्षेत्रों में नागपुर, सौंसर और महाराष्ट्र से लगे हुए इलाके शामिल हैं। इस भौगोलिक बनावट के कारण वर्षा के स्तर में भी फर्क पड़ता है। और नतीजे में कुएँ, झिरियाँ आदि के जलस्तर बदलते रहते हैं।

छिंदवाड़ा में आज भी सौ, डेढ़ सौ साल पुराने चार कुएँ मौजुद हैं जो सबको पानी देते हैं। इनमें बैरिस्टर प्यारेलाल के बगीचे का कुआँ, कलेक्टोरेट के सामने की मुंडी कचहरी का कुआँ जिसकी समतल छत कटनी पत्थर की है, एक झरने को बाँधकर कुण्ड की तरह बनाया गया कुण्डी कुआँ और 1955 में खोदा गया नगर पालिका का कुआँ। 1998 में जिले में 4800 कुंए और 8 तालाब थे और 1955 तक 7-8 हजार कुएँ बन गए थे। इन कुओं के अलावा कुलबेहरा नदी पर बाँध बनाकर भी छिंदवाड़ा को पानी दिया जाता है। यह कुलबेहरा नदी पेंच नदी में मिलती है, पेंच कन्हान में और कन्हान नदी वैनगंगा में मिल जाती है। कहते हैं कि कुलबेहरा नदी के तल में ज्वालामुखी है। ‘डोह’ का मतलब होता है मुख जैसे- प्रतापडोह आदि। ‘रीड एवं रट्लेज’ की भू-गर्भ शास्त्र की किताब के अनुसार कुलबेहरा नदी में 48 से 50 तक ज्वालामुखी हैं। शायद इसके कारण ही यह नदी बारामासी बनी रहती है।

पहले इन क्षेत्रों में झिरियाँ और कुएँ पानी के प्रमुख स्रोत थे। पहाड़ी इलाकों में हर जगह झिरियाँ आझ भी मिलती हैं जिनका उपयोग पेयजल और सिंचाई तक के लिए किया जाता है। बड़कुई गाँव में ही पाँच झिरियाँ हैं जिनमें से एक ‘चोरगुण्डी’ बहुत प्रसिद्ध है। इसमें पहाड़ों से पानी झिरकर आता है। और अब लोगों ने अपनी पेयजल तथा थोड़ी बहुत सिंचाई की जरूरत के लिए पास ही एक तालाब बनाकर पाइप भी लगा लिया है। गर्मी में पानी सूख जाने पर भी इस ‘चोरगुण्डी’ झिरिया से पानी मिल जाता है। और जानवर झिरिया से बने तालाब में पानी पीते हैं। 12000 जनसंख्या वाली जिले की सबसे बड़ी पंचायत मानी जाने वाले बड़कुई गाँव में पहले कुएँ भी थे लेकिन पहले बनी खदानों के कारण 25-30 साल से इनमें पानी कम होता रहा है और अंत में 75 प्रतिशत कुएँ सूख गए। बड़कुई गाँव के एक बड़े मोहल्ले भोपाल बस्ती और मुर्गी टोला में चर्रई बाँध से पाइप लगाकर भी पानी दिया जाता है। लेकिन लोग झिरियों का पानी ही ठीक मानते हैं और वापरते हैं। इसी तरह की एक झिरियाँ चाँदामेटा की चाँदशाह वली की पहाड़ी पर भी है जहाँ एक मंदिर और मजार बने हैं। चांदशाह इलाके के एक प्रसिद्ध फकीर थे। पहाड़ी की तराई की इस झिरियाँ पर एक कुण्ड भी बना है।

इंडिया वाटर पोर्टल (हिन्दी) से साभार