गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

माताजी निर्मलादेवी का 'निर्मल' साया उठ गया

21 March, 1923 - 23 Feb, 2011
माताजी निर्मला देवी का उनके मानने वालों, चाहने वालों से दूर चले जाना वास्तव में काफी दुखद अहसास है वे हमारे जिले की महान शख्सियत थीं। जिले की मशहूर हस्तियों में निर्मला देवी का नाम अव्वल रहा है। हम सब उनको ह्दय से श्रृद्धांजलि र्पित करते हैं। हमारी कोशिश रहेगी कि हम उनकी यादों, उनके साथ बिताए लम्हों को एक-दूसरे के साथ शेयर करें अगर आप लोगों के पास ऐसी कोई यादें हो तो छिंदवाड़ा छवि से इसे शेयर कर सकते हैं।

नहीं रही छिंदवाड़ा की महान विभूति माताजी निर्मला देवी

सहजयोग ध्यानपद्धित की संस्थापक एवं मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा शहर में जन्मीं महान विभूति माताजी निर्मलादेवी का २३ फरवरी, बुधवार रात्रि जिनेवा में निधन हो गया। वह करीब ९० वर्ष की थीं। स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाली निर्मलादेवी जी ने सहयोग ध्यान पद्धित से विश्व के १४० देशों में भारतीय संस्कृति और धर्म का प्रचार प्रसार किया। निर्मला देवी ने मुंबई में अंतर्राष्ट्रीय अस्पताल स्थापित किया नागपुर में अंतर्राष्ट्रीय संगीत स्कूल की स्थापना करवाई। छिंदवाड़ा में अंतर्राष्ट्रीय ध्यान योग की नींव रखी थी। अभी उनका पार्थिव शरी वियना में उनके अनुयायियों के दर्शनार्थ रखा गया है। सहजयोग महोत्सव के प्रवक्ता ललित जैन ने बृहस्पतिवार को यह जानकारी दी है।
छिंदवाड़ा स्थित माता निर्मल देवी का निवास स्थान
माता निर्मला देवी से संबंधित अधिक जानकारी के लिए इन पर क्लिक करें

http://www.chhindwara.org/

सहजयोग
http://www.sahajayoga.org/shrimataji/

इनसाइक्लोपीडिया पर निर्मला देवी
http://en.wikipedia.org/wiki/Nirmala_Srivastava

श्रीमाताजी.नेट
http://www.shrimataji.net/

फेसबुक पर श्रीमाताजी
http://www.facebook.com/shrimataji

आदिशक्ति
http://www.adishakti.org/shri_mataji.htm

http://www.lifepositive.com/spirit/new-age-catalysts/nirmala-devi/nirmala.asp

http://www.indian-skeptic.org/html/is_v03/3-2-16.htm

http://www.kheper.net/topics/gurus/Mataji.htm

http://www.google.co.in/search?q=nirmala+devi&hl=en&client=firefox-a&hs=s7d&sa=G&rls=org.mozilla:en-US:official&channel=s&prmd=ivnso&source=univ&tbs=vid:1&tbo=u&ei=uHtmTaPZGdDIrQepkMzaCg&ved=0CGgQqwQ

सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

अनिल करमेले जी की कविता : कहाँ है छिन्दवाड़ा ?

मुंबई इलाहाबाद जयपुर हैदराबाद कलकत्ता में
कितनी बार पूछा लोगों ने - कहाँ है छिन्दवाड़ा ?

और फिर ख़ुद ही कहते-
अच्छा वही न जहाँ से पार्लियामेंट में....

और मैं हर बार डूबता शर्म से
लोग कहते नहीं अघाते क्या से क्या हो गया शहर

हाँ सचमुच क्या से क्या हो गया यह शहर !
गोंडवाना के सिपहसालारों

क्या पहचान बनी है इस छिन्दवाड़ा की।

छिन्दवाड़ा : अनिल करमेले जी की कविता, भाग- पांच

कोल फील्ड, रेमण्ड्स, हिन्दुस्तान लीवर जैसे बड़े ही नहीं
गोंडवाना के इस जनपद की फसलों पर पलते पचासों उपक्रम
इस जनपद के बाशिंदों को
खलासी और लोडर के अलावा कहाँ कुछ बना पाए ?

मसें भीगते ही लड़के
शामिल होते रहे बेरोज़गारों की भीड़ में
तंबाकू चबाते कभी इस ब्रिगेड
कभी उस ब्रिगेड के हाथों में खेलते
पहुँचाते रहे अपना इस्तेमाल करने वालों को सदनों में

छिन्दवाड़ा : अनिल करमेले जी की कविता, भाग- चार

जहाँ कभी घास बाज़ार था और
टोकनी में फल बैठती थीं फलवालियाँ
जिला अस्पताल, बैल बाजार, नागपुर नाका, चक्कर रोड,
फव्वारा चौक, सी०एम० काम्प्लेक्स
जहाँ मजे से सायकल लेकर टहला जा सकता था

अब सड़क दर सड़क पटी पड़ी हैं दूकानों से
और बुछे चेहरों से ग्राहकों का इंतज़ार करते दूकानदार
शहर के बुनियादी मुहल्ले बरारीपुरा, दीवानजीपुरा और छोटीबाजार
घिसट रहे हैं हाशिए पर

नवधनिक और पास के गाँवों से आए नए सामंत
घूमते हैं शहर में छाती फुलाए

उजाड़ में फैलते इस शहर को
90 के बाद जैसे लकवा मार गया

जिसकी भूमिका बन गई थी 90 के दशक में

छिन्दवाड़ा : अनिल करमेले जी की कविता, भाग- तीन

किसकी नज़र लग गई उसी छिन्दवाड़ा को कि
सैकड़ों कालोनियों में बसकर भी
उजड़ गई उसकी आत्मा

किसकी नज़र लगी इस शहर को
जिसका बाल भी बाँका नहीं कर पाया 84 का गिरा बरगद
न 6 दिसंबर बानवे को ढहा दी गई मस्जिद
वह पिछले बीस सालों में हो गया बिजूके की तरह

जिसमें हंडी की जगह पराए प्रतिनिधि की खोपड़ी रखी है
जिसने बख़्शा नहीं किसी शरीफ़ रहबर को
पंख आने से पहले ही मसल दिए गए सारे स्थानीय

और जो बचे फिसड्डी तीसरे दर्ज़े के कमदिमाग लंपट
वे सबके सब युवा-ब्रिगेड में हो गए शामिल
आज वे बन गए गाँवों और कस्बों के रहनुमा
नहरें सारी मुड़ गईं उनके खेतों की ओर

छिन्दवाड़ा : अनिल करमेले जी की कविता, भाग-दो

कहाँ गया वह शहर
जहाँ साल में वारदात-ए-हत्या बमुश्किल होती रही
जहाँ छोटी बाजार की रामलीला
पोला ग्राउंड का पोला दशहरा और
स्टेडियम का होली कवि सम्मेलन
बस होते मनोरंजन के साधन रहवासियों के

जहाँ आँखें पोंछते दिखाई देतीं पाटनी टाकीज से
फिल्म देखकर निकली महिलाएँ
टोकनी में फल और फुटाने रखकर
घर-घर आवाजें लगातीं फलवालियाँ
मज़े से गपियाती चूड़ी पहनाती चूड़ीवालियाँ
रिक्शेवाला पता नहीं, पूछता था किसके घर जाना है

जहाँ से जाने का नाम नहीं लेते थे
जाने कहाँ-कहाँ से ट्रांसफर पर आए
बाबू पटवारी और छोटे बड़े अध्यापक
वे कुछ दिनों के लिए आए और
उनकी पीढ़ियाँ यहीं की होकर रह गईं

छिन्दवाड़ा : अनिल करमेले जी की कविता, भाग-एक

जो पहुँचे कभी-कभार

और जिन्होंने मदमस्त फागुन या करवट बदलते
कार्तिक में गुज़ारीं ख़ूबसूरत शामें
और रूई से मुलायम रातों के नशीले
आगोश में अलमस्त रहे छिन्दवाड़ा में

कहते- बड़ा अच्छा शहर है
ऐश्वर्या की आँखों की तरह शांत

अहा! ताज़ी गोभी सीताफल सिंघाड़े और आलू का स्वाद
अभी तक याद है

और वहाँ के सरल सीधे लोग
जो बतियाने लग जाएँ तो
घंटों रहें साथ और छोड़ने आएँ बस स्टेंड तक

वही छिन्दवाड़ा जहाँ बरारीपुरा से निकलकर कवि श्रेष्ठ विष्णु खरे
पहुँचे सबकी आवाज़ के परदे में

जहाँ एक मुहल्ले में सिसकियाँ उठतीं तो
पता लग जाता सारे शहर को

जहाँ अभागे प्रेमी झुंझलाते पैर पटकते कहते
नहीं जगह कोई ऐसी
जहाँ मिल न जाएँ परिचित दो

-अनिल करमेले

कविता कोश से साभार