शनिवार, 26 नवंबर 2011

पहली बार लिखा छिंदवाड़ा का प्रामाणिक इतिहास

सागर के युवा शोद्यार्थी डॉ. तरुण कुमार बड़ोनिया ने छिंदवाड़ावासियों को पहली बार उनके सही इतिहास से वाकिफ कराने का दावा किया है। उनके शोध में यह तथ्‍य उजागर हुआ है कि छिंदवाड़ा जिला सागर सहित पूरे बुंदेलखंड के लिए किसी आरोग्य तीर्थ से कम नहीं था। मध्यकाल से लेकर अंग्रेजी शासन काल के अंतिम वर्षों तक बुंदेलखंड के लोग विभिन्न बीमारियों का इलाज कराने छिंदवाड़ा जाते रहे।

badonia सरकारी गजेटियर में भ्रामक जानकारी
इतिहास विद् प्रो. विवेकदत्त झा और प्रो. रहमान अली का मानना है कि मप्र शासन के गजेटियर में प्रकाशित की जा रही पुरातत्व संबंधी जानकारी पूरी तरह प्रमाणिक नहीं है। पत्रकारों से चर्चा के दौरान उन्होंने बताया कि गजेटियर में प्रकाशित है कि छिंदवाड़ा जिले में पाषाण युग के अवशेष नहीं है। जबकि हकीकत यह है कि छिंदवाड़ा में चार पाषाण कालों के अवशेष मिले हैं। तरुण बडोनिया ने भी अपने शोधकार्य के दौरान इन अवशेषों पर अध्ययन किया है। गजेटियर प्रकाशित होने से पहले भी विभिन्न शोध कार्यों के दौरान छिंदवाड़ा में पाषाण युग के अवशेष मिलने का उल्लेख है। उज्जैन में विक्रम विवि के इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. रहमान अली का मानना है कि शासकीय स्तर पर होने वाले शोधों में पर्याप्त सतर्कता नहीं बरती जा रही। इससे उन शोध कार्यों का स्तर लगातार कमजोर हो रहा है। उन्होंने कहा कि शोध कार्यों के संबंध में उल्लेखित तथ्यों के बारे में विशेषज्ञों के पास पूर्व से निर्धारित मानक होते हैं। जिनके आधार पर ही वे पूर्व के इतिहास से उन तथ्यों को जोड़ते हैं। उन्होंने कहा कि छिंदवाड़ा जिले के पाषाण पर तरुण बडोनिया के शोध कार्यों में कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आये हैं। जिन्हें पुराने मानकों के आधार पर इतिहास से जोड़ा जा रहा है। वहां सातवाहन वंश के ताम्र पत्र, मंदिर निर्माण व अभिलेख भी प्राप्त हुए हैं। छिंदवाड़ा के लिखरी, चौरई, नीलकंठी, राजे गांव, आदि क्षेत्रों में पुराने इतिहास से संबंधित महत्वपूर्ण साक्ष्‍य मौजूद हैं।

विवि के प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति विभाग के पूर्व विभागध्यक्ष डॉ. बीडी झा के मार्गदर्शन में डॉ. बड़ोनिया ने छिंदवाड़ा के 10 वीं शताब्दी से लेकर अंग्रेजी शासन काल तक यहां के सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनैतिक घटनाक्रमों का लेखा जोखा तैयार किया है। यह पहला अवसर है जब इस काम को वास्‍तवकि जांच पड़ताल के बाद तथ्‍यों के आधार पर किया गया।

डॉ बड़ोनिया के मुताबिक छिंदवाड़ा का राजनैतिक इतिहास मौर्य काल से शुरू हुआ। खास बात यह रही कि इस जिले के तत्कालीन सीमा पर बसे अन्य जिलों सिवनी, जबलपुर, नागपुर आदि का राजनैतिक उद्भव उतनी तेजी से नहीं हुआ, जितना छिंदवाड़ा का। शोध में यह निष्कर्ष निकला है कि छिंदवाड़ा का सांस्कृतिक और धार्मिक जुड़ाव दक्षिण भारतीय प्रदेशों व विदेशों से प्रदेश के बाकी जिलों की अपेक्षा बहुत पहले हो गया था। प्रमाणस्वरूप यहां दक्षिण के हिंदसासानी शासक, प्रवरसेन द्वितीय के जमाने के कई सिक्के, ताम्रपत्र, शिलालेख और हाथी दांत से बने आभूषण और सामग्री के खरीद फरोख्त संबंधी प्रमाण मिले हैं।

मध्यकाल व उससे पहले तक बुंदेलखंड के निवासियों के बीच छिंदवाड़ा आरोग्य स्थल के रूप में पहचाना जाता था। यहां आज भी मौजूद गरम पानी का झरना और उससे पहले यहां की विभिन्न जड़ी-बूटियां लोगों को यहां आने के लिए मजबूर करती थी। जो लोग औषधीय उपचार में विश्वास नहीं रखते थे वे यहां तंत्र-मंत्र से इलाज कराने आते थे। जिले के कई गांवों में इस आशय के शिलालेख मिले हैं। जिले में एक स्थान पर मानसिक रोगियों के लिए अस्पताल मिलने के प्रमाण मिलते हैं। अंग्रेजी शासन काल में तत्कालीन सीपी एंड बरार में क्षेत्र का सबसे पहला मेडिकल कॉलेज इसी परंपरा व विश्वास से जोड़ा जा सकता है।

डॉ बड़ोनिया के शोध में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह सामने आया है कि यहां के निवासी अपने परिवार के मुखिया से लेकर निकटतम शासक वर्ग के प्रति विशेष श्रद्घा व सम्मान का भाव रखते थे। वे उनकी मृत्यु के बाद आम नागरिकों की तरह जमीन में दफनाने या दाह संस्कार करने की बजाय उनके शव को उनकी प्रिय वस्तुओं के साथ किसी गुफा में रख देते थे। उल्लेखनीय है कि यह परंपरा पश्चिमी देश फ्रांस और उज्वेक उजबेकिस्तान (पूर्व सोवियत संघ का अंग) में भी देखी गई है।

छिंदवाड़ा में चारों तरफ फैली हरियाली के इतिहास को भी बड़ोनिया ने खंगालने का प्रयास किया है। उनके मुताबिक यहां वृक्षों जंगलों की बहुलता का एक बड़ा कारण स्थानीय निवासियों के पूर्वजों द्वारा उन्हें ईश्वर तुल्य मानना है। बड़ोनिया का कहना है कि क्षेत्र में कृषि के बाद लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन वृक्षों से मिलने वाले विभिन्न उत्पाद फल, फूल, वृक्षों की छाल आदि थे।

साभार - सागर (डेली हिंदी न्‍यूज़)

15 October 2011


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