बुधवार, 13 नवंबर 2013

डोंडिया खेड़ा को परासिया ने दी चुनौती

 जमीन ने उगले चांदी के सिक्के


डोंडिया खेड़ा को परासिया ने दी चुनौती, जमीन ने उगले चांदी के सिक्के
छिंदवाड़ाउन्नाव के डोंडिया खेड़ा की खुदाई में सोना मिलेगा या नहीं, यह तो भविष्य ही बताएगा, लेकिन रविवार को परासिया विकासखंड के उमरेठ में जो कुछ हुआ, उसने पूरे शहर में सनसनी फैला दी। यहां एक मकान की खुदाई में 75 चांदी के सिक्कों से भरा घड़ा निकला, जिसमें मुगलकाल के सिक्के भरे हुए थे। सिक्कों को देखते ही यहां काम कर रहे मजूदरों की आंख चौंधियां गईं। तुरंत ही इसकी सूचना प्रशासनिक अधिकारियों को दी गई। अधिकारियों ने सिक्कों को अपने कब्जे में कर लिया है। उमरेठ के वार्ड क्रं. 5 हवेली मोहल्ला में चुन्नीलाल सोनी के मकान में रविवार को जर्जर भवन गिराने का काम चल रहा था।
उर्दू में लिखा मुगलकाल
1880 अंकित  जमीन से निकले चांदी के सिक्कों में उर्दू भाषा में मुगलकालीन काल 1880 लिखा हुआ है। जिससे अनुमान लगाया जा रहा है कि उक्त सिक्के 130 साल पुराने हैं। सभी सिक्कों में एक रुपये अंकित है। बरामद किए गए सभी सिक्कों का वजन 8 से 10 ग्राम है।

bhaskar news | Oct 29, 2013, 07:09AM IST 

छिंदवाड़ा में अजब है इन हजारों सीढ़ियों का तिलिस्म

जो भी उतरा कभी वापस नहीं लौटा


छिंदवाड़ा। ‘प्रदेश के रोचक स्थान नॉलेज पैकेज’ के अंतर्गत आज हम आपको प्रकृति की गोद में बसे एक ऐसे अद्भुत गांव के बारे में बता रहे हैं, जिसके बारे में शायद ही आप जानते हों। किस्सों में आप अक्सर पाताल के बारे में सुनते आए हैं। लेकिन क्या आपने कभी वास्तविक जीवन में पाताल देखा है? नहीं, तो यह जानकर आपको खुशी होगी कि हमारे ही देश में एक ऐसा स्थान है, जो पाताल का दूसरा रूप है। उस अद्भुत स्थान का नाम है - पातालकोट।

नाम से ही स्पष्ट है कि यह पाताल में बसा हुआ है। मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा से 78 किमी. दूर स्थित यह स्थान 12 गांवों का समूह है। प्रकृति की गोद में बसा यह पाताललोक सतपुड़ा की पहाड़ियों के बीच 3000 फुट ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं से तीन ओर से घिरा हुआ है। इस अतुलनीय स्थान पर दो-तीन गांव तो ऐसे हैं जहां आज भी जाना नामुमकिन है। ऐसा माना जाता है कि इन गांवों में कभी सवेरा नहीं होता।
पैराणिक कथाओं के अनुसार यह वही स्थान है, जहां से मेघनाथ, भगवान शिव की आराधना कर पाताल लोक में गया था। यही नहीं, यहां के स्थानीय लोग आज भी शहर की चकाचौंध से दूर हैं। उन्हें तो पूरी तरह से यह भी नहीं मालूम की शहर जैसी कोई भी चीज भी है। पातालकोट में ऐसी बेहतरीन जड़ी-बूटियां हैं, जिससे कई जानलेवा बीमारियों का आसानी से इलाज होता है। यहां के स्थानीय लोग इन्हीं जड़ी-बूटियों का प्रयोग करते हैं। पाताल लोक में जाने की इजाजत किसी को नहीं। पाताल लोक के दर्शन करने हैं तो सरकार से अनुमति लेनी पड़ती है।

http://www.bhaskar.com/article/mp-bpl-patalkot-patallok-madhya-pradesh-bhopal-4400300-pho.html?hf-22=

सोमवार, 26 अगस्त 2013

मैं रविशंकर डोंगरे बोल रहा हूं...


Ravishankar Dongre (13 march, 1982-15 Aug, 2013)
सुनिए , मैं रविशंकर डोंगरे बोल रहा हूं , जी हां! वही रविशंकर जिसने तीन
साल में सर्पमित्र के रूप में अपनी अनूठी पहचान बना ली थी। परिवार के लोग और यार-दोस्त मुझे पप्पू भैया के नाम से भी जानते थे। आप सोच रहे होंगे की मरने के बाद मैं यहां क्या कर रहा हूं?। बस यों ही, सोचा की आज आप लोगों से बात की जाए।

मेरा बचपन-
मेरा जन्म मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के छोटे से कस्बे उमरानाला में हुआ। तारीख थी 13 मार्च, 1982। मेरा पिता का नाम नारायण डोंगरे। उनकी यहां किसी जमाने में बड़ी किराना दुकान हुआ करती ‌थी। नारायण सेठ की दुकान के नाम से लोग जानते थे। बचपन से खेत-खलियान, नदी-नालों के किनारे खेलने मस्ती करना मुझे बहुत ज्यादा पसंद था। मेरा बालपन भी आम बच्चों की तरह ही बिता। आप सोचते होंगे कि मुझे सांपों से इतना ज्यादा प्रेम कैसे हो गया? मैंने बचपन में देखा कि लोग अपने घरों और खेतों में निकलने वाले सांपों को मार देते हैं। मुझे उस वक्त बहुत दुख होता था। मैं सोचता- आखिर इन्हें कैसे बचाऊं। फिर जैसे-2 मैं बड़ा होता गया, मैंने कचुए, केकड़े और छोटे सांप पकड़ना शुरू किया। धीरे-धीरे यह सब मेरे लिए जुनून बन गया और आप सबका प्‍यारा पप्पू सर्पमित्र बन गया।

मुझे और मेरे जैसे स्नेक फ्रेंड को सभी लोग यह कहकर रोकते हैं कि जो सांप पकड़ता है उसकी मौत भी उससे ही होती है। उनके घरवाले और सब उन्हें डराते हैं। पर वहीं लोग उन दोस्तों को बाइक या कार लेकर देते हैं। तो मैं उन लोगों को कहना चाहता हूं कि- जो स्नेक फ्रेंड है। अभी तक शायद सिर्फ कुछ 100 लोग ही मरे होंगे। पर बाइक या कार के एक्सीडेंट से हर साल लाखों लोग मरते हैं। तो वो ये सब चलाना बंद क्यों नहीं कर देते हैं और शराब , गुटखा और अन्य चीजों से भी हर साल लाखों लोग मरते हैं। तो लोग हमें क्यों ताने मारते हैं कि तू भी स्नेक्स बाइट से मरेगा...। इस बारे में कहना तो मैं बहुत चाहता हूं मगर अभी नहीं।

आप यह भी पूछ सकते हैं कि इतने खतरनाक सांपों को पकड़ने के लिए कोई भी ट्रेनिंग ली होगी? तो मेरा जवाब- 'हां है। मैंने भोपाल में रहने वाले पेशेवर सर्पमित्र सलीम खान से कुछ महीने ट्रेनिंग ली थी। साथ में विलास भी था। सलीम साहब को शायद आप लोग कम जानते होंगे। वे पिछले 28 सालों से खतरनाक सांपों को पकड़ने का काम कर रहे हैं। उन्होंने अब तक करीब पौने तीन लाख सांपों को बचाया है। वे राजधानी भोपाल में नगर निगम में कार्यरत है। वन विहार से भी सलीम भाई लगातार जुड़े हुए है। वे यहां निकलने वाले सभी स्नेक को पचमढ़ी की पहाड़ियों में छोड़ आते है। आपके लिए यह जानना रोचक होगा कि मेरे साथ जो हादसा हुआ। यानी कोबरा के काटने का। यह उनके साथ भी चार-चार बार हो चुका है। मगर बेहतर इलाज की वजह से वे हरबार मौत के मुंह से निकलकर बाहर आ गया। मगर मैं...। खैंर।

सांपों को बचाने की मुहिम
मैंने पिछले तीन सालों में लगातार सांपों को बचाने की मुहिम जारी रखी। मेरे साथ कुछ मित्र भी आ गए। विलास डोंगरे (29), दीपक , सुनील गौतम (30), निखिल राऊत। विलास ऑटोमोबाइल कंपनी में काम करता है। दीपक की कपड़े की दुकान है। निखिल अभी पढ़ाई कर रहा है। विलास ने मुझे बताया था‌ कि उसके एक मित्र की मौत सांप के काटने से हुई थी। तब से वह परेशान रहता था। मगर एक दिन ऐसा कुछ हुआ कि मेरा जीवन ही बदल गया और भी सर्पमित्र बनकर सांपों को बचाने लगा। विलास को इस बात का पता चल गया था कि सांप वैसे किसी को काटता नहीं है, वह अपनी रक्षा करने के लिए हम पर हमला करते हैं। हमारी टीम ने हजार के करीब सांपों को अब तक बचाया।

हमारी टीम को छिंदवाड़ा के वन विभाग का भी पूरा सपोर्ट मिलता था। जब हम सिल्लेवानी के जंगल में सांपों को छोड़ने जाते थे तब भी कुछ फारेस्ट गार्ड हमारे साथ होते थे।  पिछले साल यानी दिसंबर, 2012 में ही हमारी टीम के बारे में वन‌ विभाग को पता चला था। वनविभाग पहले पैसा लेकर सांप पकड़ने वालों यानी सपेरों की सेवाएं लेते थे। मगर चूंकि हम फ्री में यह काम करते थे। इसलिए हम उन्हें ज्यादा अच्छे लगे। मेरी टीम ने एक साल पूरी तरह प्रोफेशनल होकर काम किया। सोशल साइट फेसबुक के जरिए मेरे कई दोस्त बने। महाराष्ट्र के आकाश जाधव, समीर। कनाडा, अमेरिका के कई शहरों जैसे- लास एंजलिस में भी मेरे कई फ्रेंड है। उनसे मेरी लगातार बात होती थी। मुझे पता है कि मेरी मौत का उन्हें गहरा सदमा लगा है। आकाश और समीर ने कई दिन उदासी में गुजारें।

ऐसे हुई मेरी मौत
अब आप यह भी जानना चाहेंगे मेरी मौत कैसे हुई ? तो उस दिन (15 अगस्त, 2013) का किस्सा यूं है। मैं अपने पास रखें 20-25 सांपों को लेकर सिल्लेवानी के जंगल के लिए निकला। मेरे साथ फारेस्ट के गार्ड और मेरा दोस्त, हमारी टीम का मेंबर विलास डोंगरे भी था। हम लोगों ने पहले सिल्लेवानी के स्कूल में बच्चों को अवेरनेस के लिए सांपों को दिखाया। फिर हम लोग सांपों को छोड़ने जंगल में चले गए। हमारे पास 10-12 कोबरा भी थे। कुछ गांव के लिए और बच्चे भी तमाशा देखने के लिए हमारे साथ आ गए। हमने एक-एक करके जार से सांपों को बाहर निकलना शुरू कर दिया। सभी सांप जंगल की तरफ चले गए। मगर एक कोबरा वहीं रुक गया। लोगों ने कई तरह की बातें की। आखिर मुझे उसे उठाकर जंगल की तरफ ले जाना पड़ा।



इसी बीच उसने मेरी अंगुली पकड़ ली। मैंने तुरंत लोगों को बताया। सिल्लेवानी से हम जल्दी ही उमरानाला पहुंचे। वहां कुछ फौरी इलाज करने के बाद भी मुझे राहत नहीं मिली। उल्टियां शुरू हुई तो दोस्तों ने गाड़ी का इंतजाम करके मुझे छिंदवाड़ा के जिला अस्पताल में भर्ती कराया। वहां डॉक्टरों ने मुझे बचाने की भरसक कोशिश की मगर वे बचा न सकें और इस तरह मैं हमेशा- हमेशा के लिए आप सब से दूर चला गया। मुझे मेरी मौत का कोई अफसोस नहीं है।

हां! आप लोगों के लिए एक खुशखबरी है कि अब कोई और रव‌ि आपसे दूर नहीं जाएगा। क्योंकि मेरी टीम के मेंबरों ने अस्पताल में ही अबसे कोई भी सांप न पकड़ने का संकल्प ले लिया है। विलास, सुनील, दीपक, निखिल मेरे भाईयों तुम मुझे भुला नहीं पाओगे और मैं तुम्हें। पर मैं हमेशा सांपों के बारे में ही सोचता रहूंगा। मुझे खुशी है कि मैं सर्पमित्र बना। कुछ और बनता तो उतनी खुशी कभी न होती।

दोस्तों, कहने को तो बहुत कुछ है, मगर आज यहीं विराम लेता हूं, आप सभी को एक बार फिर से प्रणाम!

विशेष नोट-
(मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के सर्पमित्र रविशंकर डोंगरे की आपबीती। इससे मैंने उनकी मौत से पहले की गई बातचीत, उनके दोस्तों और फेसबुक वॉल की मदद से तैयार किया है। भाई रविशंकर यानी पप्पू भैया को 15 अगस्त, 2013 को कोबरा के काटने से मौत हो गई। वे सांपों से बहुत प्यार करते थे उनका प्यार यहां तक था कि उन्हें सांप के काटने से अपनी जान जाने का भी डर नहीं लगता था। )

RAVISHANKAR DONGRE FACEBOOK LINK :

https://m.facebook.com/ravishankar.dongre?refid=46

बुधवार, 21 अगस्त 2013

छिंदवाड़ा शहर में चारफाटक पर मनेगा भुजलिया पर्व

छिंदवाड़ा। सार्वजनिक भुजलिया उत्सव समिति चारफाटक सुकलूढाना क्षेत्र की भुजलिया 23 अगस्त शुक्रवार को दोपहर 2 बजे श्री संतोषी माता मंदिर चार फाटक से मंदिर में पूजन-अर्चना के पश्‍चात् दोपहर 2 बजे चल समारोह प्रारंभ होगा. भुजलिया उत्सव समिति के कार्यक्रम के मुख्य अतिथि नानाभाऊ मोहोड, स्कूल शिक्षा राज्य मंत्री एवं कार्यक्रम के अध्यक्ष पूर्व केबिनेट मंत्री चौ. चन्द्रभान सिंह एवं विशेष आमंत्रित अतिथि भाजपा जिलाध्यक्ष रमेश पोफली, छिंदवाड़ा के विधायक दीपक सक्सेना, नपा. अध्यक्ष कन्हईराम रघुवंशी, पूर्व विधायक पंडित रमेश दुबे, पूर्व विधायक चौ. गंभीर सिंह, कृषि उपज मंडी अध्यक्ष शेषराव यादव, गंगाप्रसाद तिवारी सहित शहर के गणमान्य नागरिकों की उपस्थिति में सम्पन्न होगा. चल-समारोह में आल्हा-गायन, वीर पृथ्वीराज की सेना, आल्हा-उदल, रानी चन्द्रवती का डोला सहित हाथी-घोड़े चलेंगे.

23 को आल्हा गायन एवं शैला नृत्य
सुकलूढाना क्षेत्र में स्व. दहलान सिंह की स्मृति में 23 अगस्त शुक्रवार को दोपहर 12 बजे पदम कॉम्पलेक्स में श्री सार्वजनिक भुजलिया उत्सव समिति चौहारीनाला द्वारा आल्हा गायन एवं शैला नृत्य प्रतियोगिता का आयोजन किया गया है. इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में विधायक दीपक सक्सेना उपस्थित रहेंगे. कार्यक्रम की अध्यक्षता कन्हईराम रघुवंशी करेंगे. आयोजन समिति के अध्यक्ष सोनू मागो और संयोजक संजय मैद ने बताया कि प्रथम विजेता को 1100 शील्ड एवं प्रमाण पत्र, द्वितीय पुरस्कार के रूप में 750 रूपए शील्ड एवं प्रमाण पत्र, तीसरा पुरस्कार के रूप में 500 रूपए दिए जाएंगे. मंडलों के लिए प्रवेश निशुल्क रखा गया है.


साभार- लोकमत समाचार, 20 अगस्त, 2013

शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

एक हमारे जिले के सर्पमित्र और दूसरे ये सांपों के दुश्मन....

(पढ़िए नवंबर, 2012 को मीडिया में आई सर्पमित्रों के काले कारनामों की कुछ खबरें)

।। ज़हर का व्यापार करने के लिए सांपों को दी जाती है प्रताड़ना।।

नागपुर। एक तरफ तो हम सांप का आदर-सत्कार और पूजा करते हैं वहीं दूसरी तरफ सांप को देखते ही मार भी दिया जाता है. वैसे तो सांप जंगलों में रहते हैं या फिर खेत-खलिहानों में पाए जाते हैं. लेकिन बढ़ते शहरीकरण की वजह से सांप अक्सर लोगों के घर में भी निकल आते हैं. अब हालत ये है कि जब भी कोई इंसान सांप को देखता है तो वह डर के मारे थर-थर कांपने लगता है. ऐसे में याद आता है एक ही नाम, सर्प मित्र. तुरंत ही आनन-फानन में सर्प मित्र को बुलवाया जाता है और सांप को सुरक्षित पकड़ कर जंगलों की ओर रवाना करने की व्यवस्था की जाती है. सर्प मित्र सांप को बिना कोई नुकसान पहुंचाए पकड़ते हैं और ऐसा कुछ नहीं करते जिससे सांप को कोई नुकसान हो.

अब कल्पना कीजिए कि अगर सर्प मित्र ही सांप का दुश्मन बन जाए तो. महाराष्ट्र के नागपुर में ऐसा ही कुछ हुआ. यहां सर्प मित्र के चोले में सांपों का कारोबार करने वाला गिरोह सक्रिय था. नागपुर वन सुरक्षा कर्मियों ने इस मामले को सुलझाने का दावा किया है. इन लोगों ने दस आरोपियों को गिरफ्तार किया है.यह गिरोह ज़हरीले सांपों को पकड़ कर उन्हें तकलीफ देकर, उनका जहर निकाल लेता था. इस ज़हर को काले बाज़ार में देश-विदेश में भारी रकम में बेच दिया जाता था.

इस काम लगे पांच लोगों ने तो बाकायदा सर्प मित्र का विज़िटिंग कार्ड तक छपवा रखा था. इसे देखकर लोग इन्हें सांप दिखने की सूरत में सूचित करते थे और इन लोगों को आसानी से सांप सुलभ हो जाते थे. इतना ही नहीं किसी को इन पर कोई शक भी नहीं होता था. वन विभाग को इस गिरोह की भनक लगी तो उसने गिरोह को भंडाफोड़ करने के लिए एक मज़बूत जाल बिछाया और दस लोगों को गिरफ्तार करने में सफलता पाई.

गिरोह के पास से 8 मिली ग्राम ज़हर मिला है. अधिकारियों ने इनके पास से 8 कोबरा सांपों को भी छुड़ाया है. नागपुर बाजार में गुरुवार 13 सितंबर को पकड़े गए ज़हर का मूल्य सात से आठ लाख आंका जा रहा है. कुछ सर्प विशेषज्ञों का कहना है की इस ज़हर का प्रयोग नशे के लिए भी किया जाता है. सामूहिक रेव पार्टी जैसी जगहों पर उन्माद के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है.

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।। सांपों की तस्करी के अड्डे बने नागपुर और वर्धा ।।

महराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के अमरावती जिले की चार बरस पहले की घटना। एक प्रसिद्ध सर्पमित्र के घर वनविभाग ने जब दबिश दी तो करीब 7 सौ प्रजातियों का पता चला। इनमें सांप, नेवले और छिपकलियां भी थीं। इन सब का वह क्या वह करना चाहता था, यह आज भी राज ही है। वह मुकदमा आज भी चल रहा है।

ठाणे में हाल ही में एक सर्पमित्र के यहां से 50 लाख के विष की बरामदगी के साथ उसको गिरफृतार किया गया। ऐसी ही कार्रवाई पिछले महीनों मुंबई, कोल्हापुर और नागपुर में भी की गई। अमरावती में छत्री तालाब के पास एक सर्पमित्र की पान की टपरी है। इसके काउंटर पर सांप रखे गए हैं। लोग कौतूहलवश आते हैं और उसकी ग्राहकी भी बढती है। 15 साल पहले जिले में मात्र 4 सर्पमित्र थे। आज उनकी संख्या बढकर सात हजार के उपर पहुंच गई है। वन विभाग के पास केवल 40 सर्पमित्र ही पंजीबंद्ध हैं। राज्य के सभी जिलों में कमोबेश ऐसी ही स्थिति है, लेकिन पूरे राज्य में नागपुर और वर्धा ये दोनों जिले सांपों की तस्करी के बडे अड्डे बन गए हैं।

।। विष के नाम पर अलग ही बाजार ।।
सांपों का विष बताकर अलग ही कुछ बेचने का गोरखधंधा जारी है। नशे के लिए, औषधि के लिए अंधश्रद्धा के चलते यह विष लिया जाता है। सांपों का विष निकालने के बाद उसे एक खास पद्धति से ड्राय करना पडता है। इसके लिए 30 से 40 लाख रुपए की मशीन लगती है। राज्य में किसी तो भी सर्पमित्र के पास यह मशीन होगी? इस कारण विष के नाम पर कुछ तो भी गोरखधंधा चलने की बात गले उतरती है।

।। सांपों के अंग और व्यापार— जिंदा सांप की कीमत 5 हजार से लेकर एक लाख रुपए ।।
अजगर की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में 10हजार डॉलर यानी 5 लाख रुपए के करीब है। रेड सेंड बोआ यानी दोमुंह प्रजाति का सांप 30 से 50 लाख तक बिकता है। दक्षिण—पूर्व एशिया में इस सांप की बहुत मांग है। केंसर के इलाज के लिए भी उसका इस्तेमाल किया जाता है। कुछ लोग सांपों को खाते भी हैं। खासतौर पर दक्षिण एशियाई देशों की अधिकांश होटल्स में सांपों के मांस से बनाए गए पदार्थों के व्यंजन बडे चाव से खाए जाते हैं। कुछ लोग शौकिया तौर पर सांप पालते हैं। अपने इस शौक की खातिर वे अलग—अलग प्रजातियों के सांपों की खोज में रहते हैं।

।। सांप की खाल की कीमत एक लाख रुपए ।।
सांप की खाल से बने कोट, हेंडबेग, पर्स, जूते आदि वस्तुओं की अमेरिका, यूरोप केनेडा, और चीन के मार्केट में जबरदस्त मांग है। अजगर, धामण, घुघ्घुस और कोबरा आदि की खाल विशेष तौर पर पसंद की जाती है। विश्व प्रसिद्ध डिजाइनर्स द्वारा निर्मित अजगर की खाल के बेग सेलिब्रिटी की शान समझी जाती है। इसके अलावा अजगर की खाल के जॅकेट, बेल्ट और स्कर्टस का फैशन जोरों पर है और इसके लिए लगने वाले लाखों अजगरों और सांपों की आपूर्ति भारत, श्रीलंका, इंडोनेशिया, थायलेंड, न्यूजीलेंड और फिलीपींस से होती है। अकेले यूरोप में ही साल भर में लाख से ज्यादा अजगरों की खाल आयात की जाती है।

सांपों के विष की कीमत प्रति ग्राम 75 हजार से लेकर एक लाख रूपए
सांपों के अवयवों में उसका विष सर्वाधिक मूल्यवान होता है। विभिन्न प्रकार की औषधियों में उसका इस्तेमाल किया जाता है। केंसर, एचआयवी यानी एड्स और मधुमेह जैसी बीमारियों की रोकथाम के लिए ये दवाएं उपयोगी साबित होती हैं। सांपों के विष का एक विशेष प्रकार का घटक केंसर का मूल माने वाले ट्यूमर को रोक सकता है, ऐसी विशेषज्ञों की राय है। इस कारण दुनिया भर की प्रयोगशालाओं में सांपों की विभिन्न प्रजातियों के विष पर बडी तादाद में प्रयोग शुरु हैं। खास तौर पर चीन में अनेक पारंपरिक औषधियों में विष का इस्तेमाल होता है। इसके लिए उन्हें विष की जरुरत पडती है। मादक पदार्थों की तस्करी करने वाले माफिया भी सांपों की भारी तस्करी करते हैं। केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार में ही नहीं तो देश में मादक पदार्थों के निर्माण में सर्प के विष का धडल्ले से इस्तेमाल होता है।

।। निष्ठुरता के साथ मारे जाते हैं सांप ।।
सांपों का विष निकालते समय उन पर बडी निर्दयता से अत्याचार किए जाते हैं। उनके दांत गंभीर रुप से जख्मी होने से कई बार वे मौत के मुंह में समां जाते हैं। विष ग्रंथि सांपों को मिली एक बडी देन है। सांपों का विष एक प्रकार से लाल होता है। सांपों का शिकार करने के लिए या आत्मरक्षा करने के लिए उसका इस्तेमाल किया जाता है। उसी प्रकार उसकी खाल निकालने का तरीका भी बहुत ही निष्ठुर है। सबसे पहले जिंदा सांप को झाड से लटकाकर ताना जाता है और कीलें ठोकी जाती हैं। एक बाजू से चीरा लगाकर खाल को साइड किया जाता है। उसे नमक लगाकर सुखाया जाता है। कई बार इसके लिए रसायन का इस्तेमाल भी किया जाता है। इस प्रकार से चमडी तैयार की जाती है। खाल निकालने के बाद वह सांप दो से तीन दिन जिंदा रहता है। इस कारण उसे भारी पीडा होती है।

।। सांप पालने की भी अनुमति लेना होती है ।।
किसी भी वन प्राणी के प्रदर्शन करने के लिए केंद्रीय प्राणि संग्रहालय प्राधिकरण, भारत सरकार की पूर्व अनुमति लेना आवश्यक है। सीझेडए के नियम बहुत सख्त हैं, इसके लिए उनकी खानापूर्ति के बाद ही अनुमति मिल सकती है। सांप केवल प्राणि संग्रहालय में ही प्रदर्शित किए जाते हैं।

।। सर्पमित्रों के अधिकार ।।
खेती और वन भूमि ये सांपों के नैसर्गिक आश्रय स्थल हैं किंतु शहरीकरण बढने से, कृषि भूमि का आबादी में बदलने के कारण उनका आश्रयस्थल खतरे में है। बढती बस्तियों के कारण सांप ज्यादा संख्या में दिखने लगे और इसके साथ ही सर्पमित्रों का उदय हुआ। 10 से 15 साल पहले सर्पमित्रों का सिलसिला शुरु हुआ, तब गिने—चुने ही सर्प मित्र थे। कालांतर में उनकी संख्या बढ गई। शहरी और ग्रामीण भाग के अनेक सर्पमित्र अपनी जान की परवाह न करते हुए सांपों की जान बचाने बचाकर उन्हें जंगल में छोडने का महती कार्य कर रहे हैं।

राज्य में साधारणत: एक से डेढ लाख सर्पमित्र हैं। उनके पास कितने कोबरा हैं, कितने अजगर हैं, इस पर से उनका वजन तय होता है। ऐसे शौकिया सर्पमित्रों की संख्या देखने पर साधारणत: हरेक के बंद दरवाजों में एक समय करीब दस सांप मिलेंगे। अर्थात राज्य भर में इन सर्पमित्रों के घरों में सामन्यत: दस लाख सांप होने का अंदाज है। इन सांपों का आगे का क्योता है, यह भी एक रहस्य है। पकडे गए सांपों को तुरंत जंगल में छोडना होता है।

कई सर्पमित्र ऐसा करते भी हैं, लेकिन सर्पों का संग्रह करने वाले सर्पमित्रों की संख्या भी कम नहीं है। इस पर वनविभाग का कोई नियंत्रण नहीं है। सांपों के संदर्भ में बढते खतरे को ध्यान में रखकर सर्पमित्रों को पहचान पत्र देने का नया प्रस्ताव सामने आया है। एक वार्ड में दो सर्पमित्र होना चाहिए और वे भी प्रशिक्षित होना चाहिए, यह सूचना इस नए प्रस्ताव में दी गई है।

गुरुवार, 15 अगस्त 2013

सर्पमित्र रविशंकर डोंगरे : मौत का डर भी उसे नहीं डराता था

  • सांपों को बचाने की मुहिम में जुटे छिंदवाड़ा के  उमरानाला निवासी रविशंकर
  • कोबरा के काटने से 15 अगस्त, 2013 को हो गई आकस्मिक मौत
  • फेसबुक वॉल पर किया था सांपों के प्रति अपने प्रेम का खुलासा
RAVISHANKAR DONGRE KE FACEBOOK WALL SE....
जो स्नेकस फ्रेंड्स है। अभी तक शायद सिर्फ कुछ 100 लोग ही मरे होंगे। पर बाइक या कार के एक्सीडेंट से हर साल लाखों लोग मरते हैं। तो वो गाड़ी चलाना बंद क्यों नहीं कर देते। और शराब, गुटका और अन्य चीजों से भी लाखों लोग मरते हैं। तो लोग हमें क्यूं ताने मारते हैं कि तू भी स्नेकस बाइट (सांप के काटने) से मरेगा--- - सर्पमित्र रविशंकर डोंगरे






21 JULY, 2013
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hello friends,
aap se ak mera sawal hai, jo log snakes friends banana chahte hai. to log unhe rokte hai, ki jo snakes pakadta hai. us ki muot us se hi hoti hai. unke gar wale or sab unhe datte hai. par wahi log us ko bike ya kar lakar dete hai.

to ab me un logo ko kahana chata hu--- ki jo snakes friends hai abhi tak shayd sirf kuch 100 logo hi mare hoge. par bike ya kar ke aekshident se har sal lakho log marte hai. to wo ye sab chanala band kyo nahi kar dete hai. or sarab .gutkha or adar chijo se bhi har sal lakho log marte hai. to log hame kyo tane marte hai. ki tu bhi snakes bait se marega ...........

COMMENT---
ok sir india me har sal snakes bite se 30 hajar log marte hai or iekshident se 10 lakh log . tv se 2.50 lakh log cenchar se 4 lakh log .......or adar bimariyo se 5 lakh log to fir bhi snakes bite se kam log hi marte hai or usme se bhi 60% log chhar phuk se let haspital me lejanese or 30% log haspital me anti venoem nahi hone se ye jo data hai is me kuch kam ya jayada ho sakta hai par ye sach hai.................or snakes friends pichle 10 shalo me sirf 30 hi snakes bite se jan gai hai us mese bhi 15 ne vain pi the............. ---ravishankar dongre,
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friends aap ko pata hai. jaha bhi ham sankes pakadne jate hai, to waha ke logo ka pahala sawal ye hota hai.

ki snakes tum ko katta kyo nahi. tumhare pass jaudu hai. ya mantr hai ya tum snakes ko bandh dete ho.
to aap ko ham bata de. ki a hamre pass koi jadu hota hai. nahi hame koi mantr ata hai. sab andhawisvas hai. ham bhi aap jese hai. alag kuch bhi nahi hai. hamme or log muche bhi sab kahte hai, ki snakes tumhe katta kyo nahi, to aap chahte ho ki wo hame katte .........
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Snake Awareness Program batkakhapa chhindwara 2000 pupils watching .program by sir. rajkumar viswkarma and rescue squad m. ravisahnkar dongre .vilash dongre.dipak and nikhil raut..

बुधवार, 14 अगस्त 2013

14 अगस्त, 1947 : छिंदवाड़ा में आजादी की वो रात

छिंदवाड़ा में देश की आजादी का पर्व 14 अगस्त, 1947 को रात्रि 12 बजे से शुरू हुआ था। नगर के बीचों बीच स्थित मोती बाजार (छोटी बाजार) से महिलाओं का एक विशाल जूलूस श्रीमती दुर्गा बाई मांजरेकर के नेतृत्व में निकला था। जिसमें एक विशाल तिरंगा ध्वज लहराते हुए लोगों का अभिनंदन किया जा रहा था।

यह कोई आयोजित जुलूस नहीं था। बल्कि जनता जनार्दन और वो भी महिलाओं के द्वारा आजादी के ऐतिहासिक पल को अपनी भावनाओं से भर कर जनता को एहसास कराने के लिए निकाला गया था। तब शहर भी बहुत छोटा सा था।

छोटी बाजार से बुधवारी बाजार और वहां से वापस हुआ था जूलूस। क्या नजारा रहा होगा! हर घर में तिरंगा लहरा रहा था। और उस रात को जो शहर जागा तो दूसरे दिन 15 अगस्त को हर स्कूल सरकारी कार्यालय में तिरंगा फहराया गया था।

साभार- वरिष्ठ पत्रकार गुणेंद्र दुबे जी के फेसबुक वॉल से, 14 अगस्त, 2013

सोमवार, 12 अगस्त 2013

सांपों को बचाने की मुहिम में जुटे छिंदवाड़ा के युवा

टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के मुताबिक छिंदवाड़ा जिले के चार युवकों ने सांपों को बचाने का बीड़ा उठाया है। इसके साथ ही ये सभी सांपों के संबंध में लोगों को शिक्षित करने का भी कार्य कर रहे हैं। उमरानाला निवासी रविशंकर डोंगरे की टीम में सुनील गौतम, दीपक, निखिल राऊत और विलास डोंगरे शामिल है। रवि मोबाइल शॉप चलाते हैं। वहीं विलास एक ऑटोमोबाइल कंपनी से जुड़े हुए है। इसके अलावा दीपक की कपड़े की दुकान है। निखिल अभी पढ़ाई कर रहे है।

इन साहसी युवाओं को वन विभाग का भी भरपूर सहयोग मिल रहा है।

पढ़िए अमरजीत सिंह की पूरी रिपोर्ट...

Band of youths on a mission to save serpents

Amarjeet Singh, TNN | Aug 12, 2013

BHOPAL: They are no wildlife experts nor do they have an expertise in magical language of snakes-parseltongue-like spoken by Harry Potter, but handling snakes, including venomous is no big deal for them.

Owing to their concern for snakes-a group of four youths in Chhindwara district joined hands to rescue snakes and educate residents on their utility. They claim to have rescued more than 1,000 snakes and released them in jungles.

The group comprises Ravi Shankar Dongre, 31, Sunil Gautam, 30, and Deepak Khudrejia, Vilas Dongre, 29.

Recently, another youngster Nikhil Raut, joined the group.

"I have been rescuing snakes for as long as a decade. What began with curiosity later turned into a passion. But for the last one year we are working as professional team and we reach spot wherever any snake is seen," said Ravi, who owns a mobile shop for earning.

All of them have nothing in common as far as their backgrounds go. It is their concern to save serpents which has brought them together.

Vilas works with an automobile company, Sunil is currently seeking job, Deepak also owns a garment shop and Nikhil is a student.

The modus operandi for catching a snake varies from one snake to another. Most of the time we don't need even the stick which is provided to us by the forest department.

"In case I am out of town and get an urgent call to catch snake how can I get a stick there," said Vilas, another member.

I have been catching snakes for nearly two years now-a friend of mine died of snake bite and I was upset for some days. But one day it all changed when I saw a snake eating a mouse in the field and even passing over my leg without harming me, Vilas explained.

"It made me think that these slithery reptiles attack in self-defence," Vilas said.

It is due to their efforts that the forest department has included these men and made a team compromising forest personnel dedicated to the rescue of the animal.

Chhindwara range officer S L Pathekar said, "From January 1 till July 30, 197 snakes were rescued and released in forest areas with their. It was in December last year that we came to know about youths and thereafter a rescue squad was constituted."

Earlier, we used a snake charmer to catch these snakes but there were several complaints. He used to charge arbitrarily from scared people, Pathekar added.

"But these young men catch snakes for free and also educate people on misconceptions. They voluntarily go to schools to educate children," he added.

बुधवार, 31 जुलाई 2013

टेलीग्राम सेवा के अंत पर विशेष : कूट संकेतों की दुनिया

कभी तेजी से संदेश पहुंचाने का सबसे प्रमुख माध्यम रही टेलीग्राम सेवा 160 साल का लंबा सफर तय करने के बाद बंद हो गई। 15 जुलाई 1855 में भारत में शुरू हुई इस सेवा का 15 जुलाई 2013 को अंत हो गया। एक समय तारसेवा देशभर में खुशी और गम दोनों में कोई भी खबर तेजी से पहुंचाने का एकमात्र जरिया थी। इस मौके पर डाक विभाग में कार्यरत रहे साहित्यकार गोर्वधन यादव जी का यह आलेख....
आइए, मैं आपको कूट संकेतों की रहस्यमय दुनियां में ले चलूं. एक यन्त्र जिसने लगभग समूची दुनिया में एकछत्र राज्य किया. उस यंत्र से डैश-डाट, डैश-डाट लगातार बजता रहता था, और उन संकेतों  का जानकार, उसे अपनी भाषा में लिपिबद्ध करता चलता था. उस यंत्र का नाम था “मोर्स साउन्डर” और जिससे उसे संचालित किया जाता था, का नाम” मोर्स की” कहलाया.  

एक समय वह भी था,जब आदमी को अपने दूर-दराज में बैठे किसी व्यक्ति को कोई जरुरी खबर देनी होती थी, तो उसके पास कोई साधन नहीं थे. आम साधारण आदमी बाजार-हाट में, अपने किसी परिचित को पाकर,उसके हाथ मौखिक अथवा लिखित समाचार दे देता था,और कहता था कि अमुक आदमी तक इसे पहुँचा देना. वह यह नहीं जानता था कि वह पत्र उस आदमी तक पहुँचाया गया अथवा नहीं. वह यह भी नहीं जान पाता था कि उसकी बात गुप्त भी रह पाती है, अथवा नहीं. हाँ, राजा-महाराजाओं के समय में उन्होंने अपने तरीके इजाद कर लिए थे और वे कुछ हद तक उसमें सफ़ल भी रहे थे. लेकिन बावजूद इसके उसमें समय ज्यादा नष्ट होता था.

अमेरिका के चार्ल्स टाउन ( मेसाच्सेट्स) में 27 अप्रैल 1791 में एक बालक ने जन्म लिया,जिसका नाम सेमुअल एफ़.बी.मोर्स रखा गया. आगे चलकर इसी व्यक्ति ने एकल तार टेलीग्राफ़ी प्रणाली और मोर्स कोड का आविष्कार किया, जो चंद मिनटॊं में समाचार, एक स्थान से दूसरे स्थान को पहुँचा देता था. इसमें सबसे बडी खास बात तो यह होती थी कि, उसे जानकार व्यक्ति के अलावा, न तो कोई समझ पाता था और न ही कूट संकेतों को अपनी भाषा में लिख ही पाता था. इस तरह उस व्यक्ति ने समूचे संसार में तहलका मचा दिया. यह बालक जन्मजात चित्रकार था. वह बेहद ही सुन्दर चित्र बनाया करता था. बडा होकर उसने, उस जमाने के सम्राट के पोट्रेट बनाए और बेशुमार धन कमाया.

अपने शहर से दूर,  न्युयार्क शहर के वाशिंगटन मे चित्रकारी कर रहा था. उसके पिता जेविडिया मोर्स ने एक घुडसवार के हाथों एक दुखद समाचार भिजवाया कि उसकी पत्नि का निधन हो गया है. अपनी पत्नि के असमय निधन से उसे बेहद दुख हुआ और उसने अपनी चित्रकारी से मोह भंग हो गया. समाचार उसे मिला तो लेकिन तब तक काफ़ी समय बीत चुका था और वह चाहकर भी वहाँ शीघ्रता से पहुँच नहीं सकता था. उसने निर्णय लिया कि वह कोई ऐसा कारगर उपाय खोज निकालेगा,जिससे समाचार तेज गति से एक स्थान से दूसस्रे स्थान को भेजा जा सके.

सन 1832 में जब वह समुद्रीक यात्रा कर रहा था. संयोग से उसकी मुलाकात, बोस्टन के चार्ल्स थामस जैक्सन नामक एक व्यक्ति से हुई,जिसने विद्धुत चुंबक पर अनेकों प्रयोग किए थे. मोर्स ने उसके सिद्धांत पर आधारित एक ऐसे यंत्र को विकसित किया जो एकल-तार टेलीग्राफ़ी की अवधारणा पर आधारित था. जन्मजात बैज्ञानिक न होते हुए भी उसने यह कारनामा कर दिखाया.

टेलीग्राफ़ी के इस प्रयोग में सफ़लता प्राप्त होते ही इसे सरकारी उपक्रम डाकघर से जोड दिया गया जो उस समय तक पूरे देश में सक्रीयता के साथ अपनी सेवाएं दे रहा था. इस तरह एक नया विभाग “ भारतीय पोस्ट एण्ड टेलीग्राफ़ डिपार्टमेन्ट” अस्तित्व मे आया. देश के सभी जिलों की तहसीलों को उनके जिला मुख्यालय के प्रधान डाकघरॊं  के बीच टेलीग्राफ़ लाइने बिछायी गई और उसे प्रदेश के मुख्यालय मे खोले गए केन्द्रीय तार घरों से जोड दिया गया.  इस तरह समूचा देश टेलीग्राफ सिस्टम से जुड गया.

स्व, राजीव गांधी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश ने आई.टी युग में प्रवेश किया. देखते-ही देखते समूचे देश में कंप्युटर, मोबाईल, फ़ोन और टीवी घरों-घर पहुँच गए. पोस्ट एण्ड टेलीग्राफ दो हिस्सों में बंट गया और वह भारत संचार निगम लिमिटेड बन, एक स्वतंत्र इकाई के रुप में काम करने लगा. यह घटना 2000 की है.  विश्व में नई टेक्नोलाजी के आने के बाद, टेलीग्राफ़ी, जो पूरे विश्व में प्रयोग में लाई जा रही थी, की व्यवस्था समाप्त हो गई.  

टेलीग्राफ़ के कोड को डिकोड करना आमजन के लिए असंभव था. इसीलिए यह सबसे विश्वसनीय बना रहा. टेलीग्राफ़ की भाषा को सीखने के लिए कठिन परिश्रम और प्रशिक्षण की जरुरत होती है. डाक विभाग में कार्य करते हुए मैंने अंग्रेजी तथा हिन्दी में तार भेजने की दक्षता हासिल की थी. अब भी मुझे वे संकेत याद हैं, जिनका उल्लेख यहां कर रहा हूँ. हालांकि आज यह किसी काम के नहीं है, लेकिन इसका अपना इतिहास है और आज वह स्वयं एक इतिहास का विषय बन कर रह गया है, अतः इसका मूल्य और भी बढ जाता है.


किसी भी शब्द के लिए टेलीग्राफ़िक कोड चार अथवा उससे कम की संख्यां में बनाए गए, तथा अंकों को पांच की संख्या में, इस तरह अंग्रेजी भाषा के प्रत्येक शब्द के लिए अलग-अलग कोड बने, जो किसी अन्य से मेल नहीं खाते थे. कुछ अलग से संकेत देने पर, अंग्रेजी भाषा का वह शब्द, हिन्दी में लिखा जाता था.


A   . -       B    - . . .    C    - . - .     D   - . .   E   .  F   . . -  .  G    - - .      H. . . . I   .   J  . - - -   K    - . -    L  . - . .       M   - -        N  - .   O  - - -   P  . - - .    Q  - - . -     R  . - .   S     . . .  T    -     U   . . -     V. . . -       W   . - -    X   - . . -     Y  - . - -    Z    - - . .       


अंकों के लिए पांच चिन्हों का प्रयोग किया जाता है. जैसे  

1   . . . . -  2     . . . - -     3    . .  - - -       4   . - - - -       5    . . . . .   6  - . . . .   7    - - . . . 8 - - - .    9   - - - - .       10 - - - - -   
   

मंगलवार, 30 जुलाई 2013

ओमप्रकाश नयन की दो कविताएं

आम आदमी
_____________________________

आज
आम आदमी
'आम'
नजर आने लगा है,
जो
कुण्ठा, घुटन और संत्रास के
हाथों में आकर
चूसा जाने लगा है।

-------------ओमप्रकाश नयन

तीली
_____________________________

वक्त ने मेरी जिंदगी के
सीने पर
एक ऐसी तीली
रख दी है,
जिसे सुलगा लेना
मेरी अनिवार्यता
बन गई है।
क्योंकि, इस तीली का
आलोक,
कर सकता है दूर
मन की
घाटियों का
घना अंधेरा।

-------------ओमप्रकाश नयन

कवि का परिचय
युवा रचनाकार श्री ओमप्रकाश नयन का पहला कविता संग्रह 'सच मानो शुकंतला!' शैवाल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह में शीर्षक कविता के अलावा बची रह सके एक उम्मीद, मेरा चिंतन, जन्म दिवस, अलविदा! बीते वर्ष अलविदा, ओ मेरे अभिमन्यु मन!, सच तो यह है!, काश! यदि ऐसा हो तो, आदि कविताएं शामिल है। 22 अप्रैल, 1962 को मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में जन्में नयन जनसंपर्क विभाग में कार्यरत है। वे कविता के अलावा गीत, गजल, लघुकथा आदि भी लिखते हैं। उनकी रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है।

शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

छिंदवाड़ा जिले में पत्रकारिता की नई-पुरानी सभी कहानी

  • दैनिक भास्कर को चुनौती देने की तैयारी में लोकमत समाचार
  • राजस्‍थान पत्रिका भी जल्द ही लांच करने वाला है अपना संस्करण
  • 1989 में ब्यूरो कार्यालय बनाने वाले लोकमत पहला अखबार
  • छिंदवाड़ा के लोगों ने देखा था नवभारत नागपुर का स्वर्णिम दौर
कभी यहां नागपुर से प्रकाशित नवभारत अखबार नंबर वन हुआ करता था। पचास साल से ज्यादा समय तक नवभारत का एकछत्र राज रहा। फिर दैनिक भास्कर ने नवभारत के किले को ध्वस्त किया। अब पहुंचा है लोकमत समाचार। जाहिर सी बात है कि सतपुड़ा की वादियों में बसे मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले की पत्रकारिता में अब घमासान मचने वाला है। क्योंकि जल्द से यहां से राजस्‍थान पत्रिका भी लांच हो जाएगा।

मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले से लोकमत समाचार का एडीशन 12 जुलाई, 2013 को लांच हुआ है। यह लोकमत का प्रदेश में पहला स्वतंत्र संस्करण है। बताया जा रहा है सभी मामलों में लोकमत अपने प्रतिद्वंद्वी अखबारों दैनिक भास्कर, नई दुनिया, जबलपुर एक्सप्रेस से आगे निकलने की कोशिश में है। सूत्र बताते हैं कि अभी लोकमत समाचार की छिंदवाड़ा जिले में करीब 22 हजार कॉपियां पहुंच रही है। इसमें से 11 हजार के करीब प्रतियां शहर में बांटी जा रही है। इसके बावजूद नंबर वन बनने के लिए लोकमत को कड़ी चुनौतियों का सामना करना होगा। कुछ ही महीनों में यहां से पत्रिका का एडीशन शुरू होने वाला है। वरिष्ठ पत्रकार हरमिंदर लूथरा का इसकी कमान सौंपी गई है। भास्कर से पहले सन 2005 तक नवभारत छिंदवाड़ा में नंबर वन अखबार हुआ करता था। गौरतलब है कि इससे पहले लोकमत समूह मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा समेत चार सीमावर्ती जिलों बालाघाट, सिवनी और बैतूल के पाठकों के लिए मध्यांचल संस्करण के द्वारा अपनी पहुंच बना चुका है।

वरिष्ठ पत्रकार धर्मेंद्र जायसवाल
जिले में अपना ब्यूरो कार्यालय बनाने वाले पहला अखबार लोकमत ही था, जो 1989 में स्‍थापित किया गया था। तब से लगातार यह अखबार अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराता रहा है। जिले के संतराचल यानी रामाकोना, सौंसर, पांढुर्णा में इसकी अच्छी पकड़ रही है। आरंभ से लोकमत समाचार से जुड़े और फिलहाल इसके ब्यूरो चीफ वरिष्ठ पत्रकार धर्मेंद्र जायसवाल ने कहा कि यह अखबार लोगों की बीच अपनी पकड़ बनाने में कामयाब हो रहा है। उन्होंने बताया कि वरिष्ठ पत्रकार शिवनारायण शर्मा और कमल नयन 'पंकज' जी ने शुरूआत में इसके ब्यूरो चीफ की जिम्मेदारी संभाली। मैंने भी अपने पत्रकारिता कॅरियर की शुरूआत 2003 में लोकमत से ही की थी।

दैनिक भास्कर का 43 वां एडीशन छिंदवाड़ा में साल 2008 में लांच हुआ। इसके संपादक मनमोहन अग्रवाल और लांचिग टीम में प्रमुख थे विकास मिश्र और संजय गौतम। गौतम जी फिलहाल यहां संपादक है। छिंदवाड़ा एडीशन पहले भास्कर के भोपाल ग्रुप के पास था। बंटवारे के बाद यह जबलपुर भास्कर के हाथ में चला गया। फिलहाल जिले में इसकी 33 हजार प्रतियां पहुंच रही है। दैनिक भास्कर की लांचिग टीम का हिस्सा रहे वरिष्ठ पत्रकार विकास मिश्र इन दिनों लोकमत नागपुर के संपादक है। अब उन्हीं की अगुवाई में लोकमत का एडीशन शुरू हुआ है।

छिंदवाड़ा में फिलहाल दैनिक भास्कर, जबलपुर एक्सप्रेस जैसे अखबारों का बोलबाला है। जल्द ही यहां से राजस्‍थान पत्रिका के एडीशन शुरू होने की चर्चा है। भास्कर की बात करें तो मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ के कई शहरों की तरह यहां भी यह अखबार लोगों की पहली पसंद बन गया है, लेकिन लोकल खबरों को ज्यादा स्पेस देने की वजह से जबलपुर एक्सप्रेस की भी अपनी पहचान है। इसके अलावा  नवभारत, सतपुड़ा एक्सप्रेस, राज एक्सप्रेस, नई दुनिया, देशबंधु, जनपक्ष जैसे अखबार भी मार्केट में है।

सालों तक पाठकों की पहली पसंद रहा नवभारत नागपुर
अगर अतीत बात की जाए तो नवभारत नागपुर ने यहां अपना स्वर्णिम दौर देखा है। 90 के दशक में नवभारत अपने प्रतिद्वंदी अखबारों जबलपुर एक्सप्रेस, लोकमत, जनपक्ष और स्वतंत्र मत के बीच पाठकों की पहली पसंद रहा। आजादी के पूर्व सन 1937 में नवभारत शुरू हुआ था। तब से नवभारत यहां रेगुलर आता रहा है। इसके संस्‍थापक स्‍व. रामगोपाल माहेश्वरी उर्फ बाबूजी साल में कई बार छिंदवाड़ा आते थे। उमरानाला के वरिष्ठ पत्रकार विट्ठल पटेल ने बताया कि वे 1956 से 2002 तक नवभारत से जुड़े रहे। वे मोहखेड़ और बिछुआ ब्लॉक की खबरें भेजा करते थे। उन्होंने बताया कि माहेश्वरी जी जब भी छिंदवाड़ा आते थे, तो उमरानाला रूककर यहां के मशहूर बड़े जरूर खाया करते थे। उन्हें बड़े बहुत ज्यादा पसंद थे।

1984 में बेस्ट रिपोर्टिंग के अवार्ड से नवाजे गए वरिष्ठ पत्रकार गुणेंद्र दुबे बताते है कि नागपुर से नवभारत अखबार बस-टैक्सी से उसी दिन आ जाता था। जबकि बाकी कई राष्ट्रीय अखबार और मैग्जीन ट्रेन के द्वारा दूसरे दिन पहुंचती थी, जिनमें हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, आज, टाइम्स ऑफ इंडिया और हैदराबाद से प्रकाशित मैग्जीन 'कल्पना' शामिल थी।

आपको याद दिला दे कि 20 वीं सदी के आखिरी दशक में भोपाल और जबलपुर से प्रकाशित दैनिक भास्कर भी छिंदवाड़ा पहुंचने लगा। जबलपुर एक्सप्रेस यहां से 1991 में लांच हुआ था। 21 वीं सदी के पहले दशक यानी 2000-2010 में कई अखबारों के एडीशन शुरू हुए। 13 फरवरी, 2000 में भोपाल से प्रकाशित दैनिक भास्कर में छिंदवाड़ा के चार पेज निकलना शुरू हुए। इसके बाद 22 मार्च, 2000 को नवभारत का एडीशन शुरू हुआ। जिसका बड़ा-सा आफिस शनिचरा बाजार में बनाया गया। करीब चार-पांच साल में ही इसका दौर लगभग खत्म-सा हो गया।

देखा जाए तो दैनिक भास्कर के आने के पहले तक नवभारत और जबलपुर एक्सप्रेस के अलावा लोकमत अपने मध्यांचल जैसे कुछ पन्नों के पुलआउट के साथ छिंदवाड़ा की जनता के काफी लोकप्रिय रहे हैं। बचपन में हम लोग छिंदवाड़ा-नागपुर रोड पर स्थित उमरानाला, तंसरामाल जैसे कस्बों में नवभारत नागपुर, जबलपुर एक्सप्रेस, नई दुनिया और लोकमत जैसे अखबारों  को ही तलाशा करते थे। इनके परिशिष्ट और वीकली मैग्जीन भी खासी पढ़ी जाती थी। इसमें नवभारत की ग्‍लैमर, सुरुचि, अवकाश और लोकमत की लोकरंग, सखी, मंथन आदि शामिल थी।

जनसंपर्क विभाग में कार्यरत साहित्यकार ओमप्रकाश नयन ने बताया कि 90 के दशक में नवभारत के अलावा जबलपुर से प्रकाशित नवीन दुनिया, देशबंधु भी यहां पढ़े जाते थे। उमरानाला कस्बे में सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले अखबारों की बात करें तो 1980-82 के आसपास से ही यहां नवभारत नागपुर और नई दुनिया इंदौर खासे चर्चित रहे। जानकार बताते हैं कि उमरानाला में उस जमाने में नवभारत की करीब 150 और नई दुनिया इंदौर की 25 कॉपियां आती थी।

लोकमत का साहित्य से रहा है गहरा नाता
साहित्यकारों के बीच में लोकमत समाचार काफी पहले से भी लोकप्रिय रहा है। कई साहित्यकारों को लोकमत से नई पहचान मिलीं। बाबा हनुमंत मनगटे को पहली बार मैंने लोकमत में ही पढ़ा था। उसके बाद उनसे मिलने काव्या दूरसंचार, बुधवारी बाजार में पहुंचा था। छिंदवाड़ा के कॉलेज में एडमिशन लेने से पहले यानी यहां रहने से पहले तक मैंने साहित्य बिरादरी के कम ही लोगों के बारे में सुना था। लोकमत समाचार के साहित्य से जुड़ाव का ही परिणाम रहा कि जब छिंदवाड़ा से लोकमत का शुभारंभ हुआ तो इस मौके पर निकले लोकार्पण विशेष में साहित्य को खासी तवज्जो मिली।

स्पेशल पेज पर वरिष्ठ साहित्यकार बाबा हनुमंत मनगटे का लेख ''आजादी बाद छिंदवाड़ा की साहित्यिक यात्रा '' का प्रकाशन हुआ। साथ ही वरिष्ठ कवि लीलाधर मंडलोई का लेख भी प्रकाशित हुआ, जो छिंदवाड़ा के उन साहित्यकारों पर है ,जो बाहर रहकर अपना सृजनकर्म कर रहे हैं।  इसके अलावा तस्वीरों में- जनवरी 1978 में आयोजित सातवें अखिल भारतीय समांतर कथा लेखक सम्मेलन जिसमें सर्वश्री कमलेश्वर,जितेन्द्र भाटिया,मधुकर सिंह, धूमकेतु, सुभाष पन्त, ओम गोस्वामी, धीरेन्द्र अस्थाना, आलमशाह खान, राजेन्द्र दानी, असगर अली इंजीनियर, दामोदर सदन ,मनीष राय, दया पवार, सतीश कालसेकर, सूर्यभान रणशुम्भे, शौरी राजन और अन्य साहित्यकारों ने शिरकत की थी, इस कार्यक्रम का संयोजन हनुमंत मनगटे ने किया था। दूसरी तस्वीर - म.प्र. हिंदी साहित्य सम्मेलन, छिंदवाड़ा के एक वार्षिक कार्यक्रम की, छपी है। 

दैविक चाणक्य के संपादक रहे पुण्य प्रसुन वाजपेयी
छिंदवाड़ा में पहला दैनिक अखबार मई 1991 में सनत जैन के संपादन में 'जबलपुर एक्सप्रेस' निकला। वहीं अक्टूबर, 1993 में राजू अरोरा ने दैविक चाणक्य प्रकाशित किया। करीब दो साल तक इसके संपादक थे, आज के मशहूर टेलीविजन पत्रकार, संपादक और सीनियर एंकर पुण्य प्रसुन वाजपेयी। उनके साथी रहे वरिष्ठ पत्रकार कमल नयन 'पंकज' ने बताया कि पुण्य प्रसुन जी उस समय नागपुर में रहा करते थे और लोकमत नागपुर की नौकरी छोड़कर दैविक चाणक्य में आए थे।

छिंदवाड़ा का पहला हिंदी अखबार मध्यप्रांत समाचार पं. गोपीनाथ दीक्षित के संपादन में सन 1921 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद सन 1949 को चार पेज का 'साप्ताहिक इंकलाब' प्रकाशित हुआ। इसके संपादक स्‍व. आर. के. हलदुलकर जी थे। पचास से साठ के दशक के बीच रवि दुबे जी के संपादन में सतपुड़ा टाइम्स प्रकाशित हुआ था। इसी समय 'साप्ताहिक जनसेवक' का भी प्रकाशन हुआ था। इसमें साहित्यकार और पत्रकार पं. रामकुमार शर्मा का एक चर्चित कॉलम छपता था।

एक और साप्ताहिक अखबार 'सतपुड़ा के स्वर' भी चर्चा में रहा। इसका प्रकाशन सन 1968 में हुआ, जिसके संपादक थे स्‍व. शैलेंद्र शुक्ला। जिले के वरिष्ठ साहित्यकार स्‍व. बाबा संपतराव धरणीधर ने 1976 में हाशिया नामक समाचार पत्र निकाला था। होली के अवसर पर 1989 से लगातार संतोष जैन 'सरल' हास्य-व्यंग्य पर आधारित वार्षिक बुलेटिन 'हरामखाऊ टाइम्स' निकालते हैं। उन्होंने बताया कि पहली बार इसकी दो हजार कॉपियां निकली थी। वहीं 2013 में 20 हजार प्रतियां छपी। एक सांध्य दैनिक 'हिंदी हेराल्ड' की भी चर्चा होती है। नवंबर 1996 में प्रकाशित इस समाचार पत्र का संपादन रजत गुप्ता ने किया था। जनवरी, 2010 में विश्वेश चंदेल ने साप्ताहिक मैग्जीन 'किसान अभिकल्पना' निकाली।

छिंदवाड़ा की नई और पुरानी पत्रकार पीढ़ी
छिंदवाड़ा के पत्रकारों की पुरानी पीढ़ी में स्‍व. आर. के हलदुलकर, स्‍व. शैलेंद्र शुक्ला, स्‍व. शिवप्रसाद साहू, स्‍व. प्रकाश पण्डया, स्व. रविंद्र सिंह शक्रवार, नरेंद्र जायसवाल, कैलाश पाटनी, शिवनारायण शर्मा, के. के. हलदुलकर, रवि दुबे, रघुराज पारिख, गोविंद चौरसिया, आर. एस. वर्मा, वनराज जडेजा, गुणेंद्र दुबे, राजेंद्र राही, महेश चांडक, राकेश प्रजापति, सुंदर सिंह शक्रवार आदि का नाम शुमार है।

वर्तमान पीढ़ी के पत्रकारों में रवि वर्मा उजाला, धर्मेंद्र जायसवाल, रत्नेश जैन, सुधीर दुबे, हर्षित दुबे, गिरीश लालवानी, जगदीश पवार, दिनेश लिखितकर, दीप्ति शुक्ला, राजेश करमेले, संतोष गौतम, सचिन श्रीवास्तव, अंशुल जैन जैसे दर्जनों नाम शामिल है।

जिले से बाहर सक्रिय पत्रकारों की श्रेणी में प्रिंट मीडिया से नवभारत टाइम्स दिल्ली के संपादक रहे वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार विष्‍णु खरे, आरती पांडे, नेहा घई पंडित, सुमित वर्मा, रामकृष्‍ण डोंगरे, निश्चय बोनिया आदि शामिल है। वहीं टेलीविजन जर्नलिस्ट की लिस्ट में सीनियर एंकर दिनेश गौतम, अमिताभ अरुण दुबे, धर्मेंद्र रघुवंशी, आशीष मिश्रा, शैलेंद्र सिंह, इमरान खान, प्रशांत नेमा, अरुण खोबरे, मनीष शेंडे, हरीश देशमुख आदि नाम है।  

- रामकृष्‍ण डोंगरे

मीडिया वेबसाइट भड़ास4मीडिया से साभार

बुधवार, 24 जुलाई 2013

प्रभु नारायण नेमा की यादों में 80 के दशक का मीडिया

वास्तव में 80 के दशक में प्रिंट मीडिया और उनसे जुड़े मित्रों की आज भी याद है। मैं उस समय (1983) सतपुड़ा विधि महाविद्यालय में छात्रसंघ का अध्यक्ष था और प्रेस में समाचार भी मजेदार होते थे। नवभारत में आधा पेज ही छिंदवाड़ा जिले के लिए होता था। शहर के एक या दो समाचार होते थे। बाकी नईदुनिया इंदौर श्री कैलाश पटनी जी, नव भारत नागपुर श्री नरेन्द्र जैसवाल जी, देशबंधु वनराज जडेजा जी, महेश चांडक जी दैनिक जागरण सहित साप्ताहिक समाचार जनपक्ष, सतपुड़ा के स्वर, इन्कलाब सहित समाचार पत्र थे।

खास बात ये थी कि उस समय आप का समाचार छपना बहुत बड़ी चीज थी। हां, प्रेस विज्ञप्ति मित्रों के पास ले जाते थे। वे उस समाचार को प्रेस के समाचार पैड पर फिर से हाथ से लिखते थे और लिफाफा डाक से पोस्ट होता था, जो कि 4 या 5 दिन में कम से कम समाचार पत्र के दफ्तर में जबलपुर, इंदौर, नागपुर, भोपाल में पहुचता था। समाचार कम से कम एक हफ्ते में पढ़ पाते थे और वो ख़ुशी आज भी याद है जब रोक कर मित्र कहते थे आज तुम्हारा संचार आया है।

उस समय समाचार टेलीग्राम से भी जाते रहे पर इसके लिए खास मशक्कत करनी होती थी। प्रेस कार्ड का जलवा भी था, मैं भी प्रभावित हो मालवा समाचार साप्ताहिक का उस समय जिला प्रतिनिधि बन गया। वो भी दिन थे पर दैनिक संस्करण की शुरुआत जबलपुर एक्सप्रेस से हुई और रत्नेश जैन जी उस समय तरुनाई में थे। श्री आर एस वर्मा जी की शुरुआत भी जहां तक वहीं से थी। आज मीडिया के बढ़ते कदम छिंदवाडा शहर को बड़े शहरों की पहचान दे रहा है।

 (लेखक प्रभु नारायण नेमा मध्य प्रदेश विधुत कर्मचारी संघ फेडरेशन (इंटक), छिंदवाड़ा (मप्र) के प्रांतीय उपाध्यक्ष है। इसके अलावा वे 'नेमा दर्पण' के संपादक भी है।)

शनिवार, 13 जुलाई 2013

लोकमत समाचार के 7वें संस्करण का छिंदवाड़ा में लोकार्पण

 शुक्रवार को छिंदवाड़ा में आयोजित भव्य समारोह में 'लोकमत समाचार' के छिंदवाड़ा संस्करण का लोकार्पण हुआ. इस मौके पर 'लोकमत समाचार' के
संपादक विकास मिश्र, लोकमत पत्र समूह के संयुक्त प्रबंध संचालक ऋषि दर्डा, आईबीएन 7 के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष, लोकमत पत्र समूह के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ सांसद विजय दर्डा, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण, केंद्रीय संसदीय कार्यमंत्री कमलनाथ, राज्यसभा में विपक्ष के उपनेता रविशंकर प्रसाद, महाराष्ट्र के शालेय शिक्षा मंत्री राजेंद्र दर्डा, 'आज तक' के कार्यकारी संपादक पुण्यप्रसून वाजपेयी, लोकमत पत्र समूह के कार्यकारी संचालक करण दर्डा तथा छिंदवाड़ा संस्करण के स्थानीय संपादक देवेश ठाकुर मौजूद थे.

छिंदवाड़ा की अपनी दुनिया है. भोपाल छिंदवाड़ा नहीं बन सकता, लेकिन छिंदवाड़ा भोपाल बन सकता है. - कमलनाथ, केंद्रीय संसदीय कार्यमंत्री

लक्ष्य से दूर न हो मीडिया और राजनीति

'आम आदमी के विकास में राजनीति और मीडिया की भूमिका' पर वक्ताओं के उद्गार

छिंदवाड़ा। 12 जुलाई (लोस टीम)
कभी धुएं की तरह पर्वतों से उड़ते हैं,
कभी महक की तरह फूलों से उड़ते हैं,
कैंचियां हमें उड़ने से खाक रोकेंगी,
हम परों से नहीं हौसलों से उड़ते हैं.

ऐसे ही कुछ हौसलों के साथ लोकमत समाचार के 7वें संस्करण का लोकार्पण आज छिंदवाड़ा से किया गया. लोकमत पत्र समूह ने अपने इस 21वें संस्करण के साथ मध्यप्रदेश में पदार्पण किया. इस अवसर पर आयोजित 'आम आदमी के विकास में राजनीति और मीडिया की भूमिका' पर विचारोत्तेजक परिसंवाद में अतिथियों ने अपने उद्गार व्यक्त किए. अतिथियों का मत था कि मीडिया और राजनीति आम आदमी के विकास के अपने लक्ष्य से भटक रहे हैं. मीडिया और राजनीति को आम आदमी पर केंद्रित रहना चाहिए क्योंकि वही उनका लक्ष्य है.

केंद्रीय संसदीय कार्यमंत्री कमलनाथ ने कहा कि छिंदवाड़ा की अपनी दुनिया है. भोपाल छिंदवाड़ा नहीं बन सकता, लेकिन छिंदवाड़ा भोपाल बन सकता है. छिंदवाड़ा आज वह नहीं रहा जो 80 के दशक में हुआ करता था. यहां के लोगों ने अपनी सोच बदली है. वे विकास के मायने जानते हैं. उक्त विचार केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री कमलनाथ ने मुख्य अतिथि के रूप में प्रकट करते हुए कहा कि तकनीकी बदलाव को उपलब्धि नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह तो विज्ञान की देन है. उपलब्धि तो वह है जिससे शहर का विकास हो, परिवर्तन हो. यह तभी संभव है जब आम आदमी अपनी सोच बदलेगा. मध्यप्रदेश में छिंदवाड़ा से लोकमत समाचार के पदार्पण को सही वक्त पर उठाया गया उचित कदम बताते हुए कमलनाथ ने लोकमत पत्र समूह को बधाई दी.

पंकज टॉकीज में आयोजित भव्य लोकार्पण समारोह में लोकमत समाचार के छिंदवाड़ा संस्करण का विमोचन केंद्रीय शहरी विकास मंत्री कमलनाथ, राज्यसभा में विपक्ष के नेता रविशंकर प्रसाद, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण, लोकमत पत्र समूह के चेयरमैन एवं एडिटर इन चीफ सांसद विजय दर्डा, महाराष्ट्र के शिक्षा मंत्री राजेंद्र दर्डा, आज तक के कार्यकारी संपादक पुण्यप्रसून वाजपेयी तथा आईबीएन 7 के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष की उपस्थिति में हुआ. कार्यक्रम की शुरुआत आकर्षक गणेश वंदना के साथ की गई. इसके पश्‍चात अतिथियों ने दीप प्रज्‍जवलन किया. लोकार्पण के अवसर पर लोकमत समाचार के संपादकीय संचालक एवं संयुक्त प्रबंध संचालक ऋषि दर्डा, कार्यकारी संचालक करण दर्डा, संपादक विकास मिश्र, प्रोडक्ट हेड मतीन खान, स्थानीय संपादक देवेश ठाकुर सहित अन्य अतिथिगण उपस्थित थे.

निष्पक्ष रहे मीडिया : पृथ्वीराज चव्हाण
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने लोकमत परिवार को महाराष्ट्र की जनता की ओर से बधाई देते हुए कहा कि राजनीति लोगों को समाज में समानता का दर्जा दिलाने में हरसंभव कोशिश कर रही है. मीडिया इस कार्य में एक सेतु के रूप में अपनी भूमिका अदा कर रहा है. इस कार्य में मीडिया और राजनीति दोनों के कंधों पर अहम जिम्मेदारी है. उन्होंने राजनीति के साथ-साथ मीडिया में भी दुगरुणों का जिक्र किया. चव्हाण ने कहा कि पाठक या दर्शक संख्या बढ़ाने के लिए मीडिया में विषयवस्तु का स्तर गिर रहा है जिसे बनाए रखने की जरू रत है. कॉर्पोरेट के चलते परिदृश्य बदला है, लेकिन फिर भी मीडिया को निष्पक्ष रहने की जरूरत है. हालांकि उन्होंने इस दौरान मीडिया में सकारात्मक प्रस्तुति की सराहना भी की. मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार के हर पहलू चाहे व सही हों या गलत, इसे लोगों तक पहुंचाने की जवाबदेही मीडिया की है.

देश को लेकर आमजन निराश नहीं : रविशंकर प्रसाद
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राज्यसभा में विपक्ष के उपनेता तथा भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने कहा कि लोकमत तभी प्रासंगिक बनेगा जब वह जनमत से जुडे.गा. उनका मानना है कि मीडिया के साथ-साथ जनप्रतिनिधियों को भी आम जनता से जुड.ना होगा. यदि आम आदमी से जुड़ाव नहीं होगा तो कोई भी राजनेता या समाचार पत्र सफल नहीं हो सकता. मीडिया जब तक लोगों की पीड़ा, वेदना, उत्कंठा को नहीं समझेगा तब तक वह आमजन में अपनी पैठ नहीं बना सकता. उन्होंने कहा कि देश का जन हमें समझ रहा है. अब सवाल यह है कि हम देश के जन को कितना समझ रहे हैं. देश का जन मीडिया को भी समझ रहा है. आज पेड न्यूज मीडिया के लिए अभिशाप है. संपादक भी बिकता है. देश को लेकर मीडिया तथा राजनेता दोनों निराश हैं, लेकिन आमजन निराश नहीं है. उन्होंने कहा कि मुझे हर जगह आशा की किरण दिखाई देती है. चाहे वह किसान हो, मजदूर हो या फिर देश का नौजवान हो. ये सदैव आशान्वित होकर कार्य करते हैं. इन्हें देश से कोई मतलब नहीं होता है. उन्होंने कहा कि ये लोकतंत्र है और हमें जमकर आलोचना करनी चाहिए.

दो दशक से आया बदलाव : राजेंद्र दर्डा
महाराष्ट्र के स्कूल शिक्षा मंत्री राजेंद्र दर्डा ने कहा कि राजनीति और मीडिया में पिछले दो दशकों से बदलाव आया है. आजादी के पहले भारत में राजनीति और मीडिया का सामंजस्य इतिहास में दर्ज है, जो अब दिखाई नहीं देता. मीडिया जनहित का संरक्षक है. घटना का साक्षी होता है. मीडिया को जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए. उन्होंने कहा कि राजनेता मीडिया के लिए रॉ मटेरियल होता है, और होना भी चाहिए. मीडिया में हमेशा राजनीति को लेकर बहस चलती रहती है.

देना होगा हिन्दी को महत्व : विजय दर्डा
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए लोकमत मीडिया प्रा. लि. के एडिटर-इन-चीफ विजय दर्डा ने कहा कि मीडिया की प्रमुख भूमिका, लोगों के जीवन में सुधार लाना है. देश को जोड.ना है तो हमें हिन्दी को महत्व देना होगा. इसी को ध्यान में रखते हुए मध्यप्रदेश के पहले संस्करण का लोकार्पण छिंदवाड़ा से किया गया है. उन्होंने कहा कि समाज का विकास तभी संभव है जब मीडिया निष्पक्ष होकर कार्य करे. लोकमत हमेशा से किसी पार्टी विशेष का अखबार नहीं रहा है. यह निष्पक्ष होकर काम करता है. उन्होंने कहा कि लोकमत आपकी बात राजनेताओं तक पहुंचाने का एक प्लेटफार्म है. आप इस पत्र के माध्यम से अपनी बात खुलकर रख सकते हैं. उन्होंने छिंदवाड़ा से भव्य लोकार्पण पर सभी छिंदवाड़ावासियों का धन्यवाद भी ज्ञापित किया.

मीडिया व राजनीति को आना होगा आगे : आशुतोष
परिसंवाद के दौरान आईबीएन-7 के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष ने कहा कि 1950 के बाद देश में तेजी के साथ बदलाव आया है. यह सिर्फ टेक्नालॉजी की बदौलत नहीं बल्कि लोगों की सोच के कारण संभव हो पाया है. उन्होंने कहा कि भारतीय समाज परिपक्व हो गया है. आमजन को पता है कि कौन सही है, कौन गलत. मीडिया और राजनीति बदलते समाज के हिसाब से अब भी बहुत पीछे हैं. आज जरूरत है कि मीडिया और राजनीति दोनों आम लोगों को समझें कि आखिर वे क्या चाहते हैं. उन्होंने पेड न्यूज के संबंध में कहा कि मीडिया में आए दिन पेड न्यूज के बारे में सवाल खड़े होते हैं. इसके लिए पेड न्यूजदाता भी जिम्मेदार हैं.

आम आदमी से नहीं है जुड़ाव : पुण्यप्रसून वाजपेयी
परिसंवाद में 'आज तक' के कार्यकारी संपादक पुण्यप्रसून वाजपेयी ने कहा कि छिंदवाड़ा की अपनी दुनिया है. आज सरोकार की राजनीति खत्म हो चुकी है. राजनेताओं का आम आदमी से जुड़ाव नहीं रहा है. हमेशा से आम आदमी का उपयोग राजनेता करते आए हैं.

साभार- लोकमत समाचार

शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

लोकमत समाचार का मध्यप्रदेश से पहला संस्करण आज से

छिंदवाड़ा। 11 जुलाई, 2013। लोकमत समूह के हिंदी दैनिक लोकमत समाचार का सातवां और मध्य प्रदेश से पहला संस्करण 12 जुलाई को छिंदवाड़ा से शुरू हो रहा है. इस अवसर पर 'आम आदमी के विकास में राजनीति और मीडिया की भूमिका' विषय पर विचारोत्तेजक परिसंवाद का भी आयोजन किया गया है. इसमें राजनीति एवं मीडिया जगत के अनेक दिग्गज शिरकत करेंगे.

स्थानीय पंकज टॉकीज में सुबह 11 बजे आयोजित लोकार्पण समारोह में क्षेत्रीय सांसद एवं केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री कमलनाथ, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण, राज्यसभा में विपक्ष के उपनेता रविशंकर प्रसाद, राज्यसभा सदस्य एवं लोकमत मीडिया प्रा. लि. के चेयरमैन तथा एडिटर इन चीफ विजय दर्डा, महाराष्ट्र के स्कूली शिक्षा मंत्री राजेंद्र दर्डा, आईबीएन 7 के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष, आज तक के कार्यकारी संपादक पुण्यप्रसून बाजपेयी उपस्थित रहेंगे. वे परिसंवाद में भी हिस्सा लेंगे.


लोकमत समाचार का प्रकाशन अभी नागपुर, औरंगाबाद, अकोला, जलगांव, कोल्हापुर तथा पुणे से हो रहा है. महाराष्ट्र के बाहर लोकमत समाचार का यह पहला कदम है. लोकमत समाचार महाराष्ट्र का नंबर-वन हिंदी दैनिक है और देश के कई दिग्गज लेखक इससे जुडे हुए हैं. देश भर में लोकमत समाचार के रिपोर्टर तैनात हैं ताकि पल-पल की खबर को पाठकों तक पूरी सचाई के साथ प्रस्तुत किया जा सके. लोकमत समाचार निश्‍चय ही छिंदवाड़ा की आवाज बनकर उभरेगा और मध्य प्रदेश की पत्रकारिता में नए आयाम स्थापित करेगा.
    
साभार- लोकमत समाचार

शुक्रवार, 21 जून 2013

स्मरण ....बाबा सं.रा. धरणीधर की गज़लें

खुशी कभी तो ग़म कभी, पी रहे हैं लोग

खुशी कभी तो ग़म कभी, पी रहे हैं लोग
स्व. बाबा संपतराव धरणीधर
किश्त किश्त ज़िन्दगी, जी रहे हैं लोग

पैबन्द अन्धकार के, माँग कर उधार
फटी-फ़टी सी रोशनी, सी रहे हैं लोग

सूखा पडा तो देखिये, प्यास बढ गई
नहरें खुदा के नद्दियाँ, पी रहें हैं लोग

खुशी तो एक शब्द है, खुशी मिली किसे
खुशी की एक लकीर सी,छी रहे हैं लोग

बीमार शाम को हुए ,  रात मर गए
सुबह हुई कि फिर उठे, जी रहे हैं लोग


-किस्त किस्त जिंदगी से--------------------------------- सं. रा. धरणीधर

कन्या से कश्मीर हमारा, पावन कितना है घर सारा
मन्दिर मस्जिद देहरी-देहरी, आँगन आँगन है गुरूद्वारा.

गंगा जमुना दूध पिलाकर, माँ ने हमको समझाया है.
हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई, आपस मे हो भाईचारा.

मज़हब तो हैं राहें रब की, लिये रोशनी चलते चलिये
धर्मग्रंथ सब कन्दीले हैं, गीता हो या शबद हजारा.

पंजाबी मदरासी सारे ऊपर की ये पोशाखे हैं.
चाक जिगर करके देखो तो, सुर्ख सभी में खून हमारा.

अमृतसर का पाक सरोवर, जम जम या कृष्णा का पानी
गहरे कोई पैठ तो देखे, एक सभी में अक्स हमारा.


----------------------------------- सं. रा. धरणीधर


लम्बी बहर की कोई, ऎसी ग़ज़ल सुनाएँ
कश्मीर का तराना, कन्या मे गुनगुनाएँ


केरल रदीफ़ मे हो, आसाम काफ़िये में
गुजरात की ज़मी से, मतला कोई उठाएँ


आबे-रवाँ वो गंगा, लफ्ज़ों मे हो रवानी
 चश्मे हिमालया के, संगीत गुनगुनाएँ.


मज़हब की सूफ़ियाना, ख़्यालों मे हो बुलंदी
हिन्दू मुसलमाँ मिल के, पुख्ता गिरह लगाएँ


बंगाल के वज़न पर, पंजाब है सुखन में
हिन्दी हैं हम तख़ल्लुस, मक़्ता सभी सुनाएँ


----------------------------------- सं. रा. धरणीधर


अलविदा हम जा रहे हैं, आज अपने गाँव यारों

आग का दरिया उफ़नता, मोम की है नाव यारों
 अलविदा  हम जा रहे हैं, आज अपने गाँव यारों

तलवार सर लटकी  हुई  है,  एक   कच्चे सूत से
फिर भी हैं हम खुश कि हमको, मिल गई है छाँव यारों

जिस जगह से थे चले हम, आज भी हैं उस जगह
 कौन  अंगद  को  बताए, और  भी  हैं  पाँव यारों

खुशनुमा क्या सिलसिला है, ज़िन्दगी के खेल का
 जीत  होती  है  हमारी,  हार  कर हर  दाँव  यारों

तैर कर सारा समन्दर, ये हमे हासिल हुआ
डूब मरने की जगह ही, था हमारा ठाँव यारों


----------------------------------- सं. रा. धरणीधर
साभार- 'साक्षिता' ब्लॉग
http://sakshita2012.blogspot.in

रविवार, 9 जून 2013

आपका इंतजार कर रहा है मोगलीलैंड...

 सुंदर प्राकृतिक आवास में वन्य जीवों की अठखेलियां, वो भी रोमांच के जायके के साथ, किसी को भी वाइल्ड लाइफ टूरिज्म के प्रति आकर्षित करने के लिए काफी है।
बाघों के सैरगाह की उपाधि के लिए प्रसिद्ध मध्यप्रदेश में कान्हा, बांधवगढ, पन्ना और पेंच जैसे वन्य-जीव राष्ट्रीय-पार्कों में जंगल की शान यानी बाघों से साक्षात्कार कर आप रोमांच की सटीक परिभाषा से यकीनन परिचित हो जाएंगे। आइए चलते है पेंच टाइगर रिजर्व यानी 'मोगलीलैंड' की सैर पर।

पेंच टाइगर रिजर्व मध्यप्रदेश के सिवनी जिले में स्थित है। इसे 'मोगलीलैंड' के नाम भी जाना जाता है। इसका एक नाम इंदिरा प्रियदर्शिनी पेंच राष्ट्रीय पार्क है। यहां मोगली पेंच अभयारण्य भी है। महाराष्ट्र के नागपुर शहर से इसकी दूरी 80 किमी और छिंदवाड़ा से 120 किमी है। जबलपुर से इसकी दूरी 190 किमी है। राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 7 से जुड़े इस उद्यान को आपने मशहूर टीवी सीरियल 'मोगली' में देखा होगा। 'द जंगल बुक' की एनिमेटेड मोगली की कहानी इसी जंगल से ताल्लुक रखती है। इस उद्यान में जाने का सबसे बेहतरीन समय मार्च से जून का होता है। इस पार्क में सभी वन्य जीवों और देशी और प्रवासी पक्षियों से रूबरू होंगे। यहां आप बोटिंग का भी मजा ले सकते हैं। पेंच में ठहरने के लिए मध्यप्रदेश टूरिज्म की ओर से कई रिजॉर्ट बनाए गए है।

पेंच टाइगर रिजर्व का इतिहास
मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में सतपुड़ा पहाड़ियों के दक्षिणी ढलानों में पेंच वन्य-जीव राष्ट्रीय पार्क फैला है। मूल रूप से 449.39 वर्ग किमी इलाके को 1977 में पेंच अभयारण्य घोषित किया गया था। 1983 में इसके 292.85 वर्ग इलाके को राष्ट्रीय पार्क घोषित कर दिया गया और 118.31 वर्ग किमी इलाका अभयारण्य ही रहा। 1992 में राष्ट्रीय पार्क का इलाका 757.90 वर्ग किमी हो गया और अभयारण्य देश का 19वां टाइगर रिजर्व बन गया। 2002 में राष्ट्रीय पार्क का नामकरण इंदिरा प्रियदर्शिनी पेंच राष्ट्रीय पार्क और पेंच अभयारण्य का नाम मोगली पेंच अभयारण्य कर दिया गया।

यह अभयारण्य रुडयार्ड किपलिंग की प्रसिद्ध पुस्तक 'द जंगल बुक' के मौलिक परिवेश को समेटे हुए है। पेंच के वन्य संसार में इस पुस्तक के सभी पात्र जीवंत से लगते हैं। किपलिंग ने जंगल के माहौल के लिए रॉबर्ट आर्मिटेज स्ट्रैन्डल की किताबों- 'सिवनी : मैमेलिया ऑफ इंडिया एंड सीलोन' और 'डेनजिंस ऑफ जंगल' से जमकर प्रेरणा ली। वहीं, मोगली का पात्र सर विलियम हेनरी स्लीमैन की पुस्तिका 'एन अकाउंट आफ वुल्फस : नर्चरिंग चिल्ड्रेन इन देअर डेन्स' से लिया था, जिसमें कहा गया है कि 1831 में सिवनी जिले के सन्त बावड़ी गांव के निकट भेड़िया-बालक पकड़ा गया था। द जंगल बुक में वर्णित अधिकतर स्थल सिवनी जिले स्थित वास्तविक स्थान हैं, जिनमें वैनगंगा नदी की तंगघाटी, जहां शेर खां मारा गया था, कान्हीवाडा गांव और सिवनी पहाड़ियां महत्वपूर्ण हैं। पार्क का नाम यहां बहने वाली पेंच नदी पर पड़ा है जो इसे पश्चिमी छिंदवाडा (141.61 वर्ग किमी) और पूर्वी सिवनी (145.24 वर्ग किमी) में विभाजित करती है।

क्या है अनूठे आकर्षण

वन्य जीवों की बहुलता: दुर्लभ व संकटग्रस्त किस्मों समेत औषधीय गुणों से युक्त लगभग 1200 से अधिक वनस्पति प्रजातियों के लिए मशहूर इस पार्क में वन्य जंतुओं का अनूठा संसार बसा है। पेंच बाघों का प्रिय स्थल है क्योंकि मिश्रित जंगलों, झाड़ियों और घास के मैदानों की विविधता के कारण यह चीतल व सांभर जैसे शाकाहारियों की पसंदीदा जगह है, जो बाघों व तेंदुओं के आहार हैं। 90.3 प्राणी प्रति वर्ग किमी के साथ पेंच टाइगर रिजर्व भारत में शाकाहारी प्राणियों का सबसे अधिक घनत्व वाला पार्क है। यह क्षेत्र मुख्यतया गौर (इण्डियन बायसन), चीतल, सांभर, नीलगाय, जंगली कुत्तों और जंगली सुअरों के लिए जाना जाता है। इसके अतिरिक्त यहां स्लॉथ बीयर, चौसिंघा, चिंकारा, बार्किग डियर, सियार, लोमडी, जंगली बिल्ली, सीवेत, लकडबग्घा और साही जैसे जंतु भी पाए जाते हैं। वैसे गर्मी का मौसम पेंच के स्थानीय जंतुओं को देखने के लिए सबसे उपयुक्त है जब ये पानी की तलाश में यहां के जलकुण्डों के पास आते हैं।

पक्षी-संसार: पक्षियों के विविध प्रकारों के लिए भी पेंच राष्ट्रीय पार्क का कोई जवाब नहीं है। मालाबार हार्नबिल, इण्डियन पिट्टा (नौरंग), मछारंग व गरूड के साथ ही यहां 285 से भी अधिक देशी व प्रवासी पक्षी प्रजातियों की संख्या पाई जाती है। लुप्तप्राय गिद्धों (वल्चर्स) की 4 प्रजातियां- ह्वाइट रम्प्ड, लांग-बिल्ड, ह्वाइट स्कैवेंजर और किंग वल्चर की अच्छी-खासी संख्या के लिए भी पेंच अत्यंत मशहूर है। जाड़े के मौसम में ब्राह्मणी बत्तख, बुडार और टिकरी जैसे हजारों प्रवासी जलपक्षियों का समूह पेंच के जलाशयों व कुण्डों में जल-क्रीडा करते देखा जा सकता है।

जंगल सफारी : जीप सफारी पेंच का खास आकर्षण है। भोर में भोजन व पानी की तलाश में खुले में निकले जंगली जानवरों को देखना वास्तव में एक अविस्मरणीय अनुभव है। बाघों व तेंदुओं को जलाशयों के समीप और गर्मियों में तो सड़कों तक पर देखा जा सकता है। पेंच नदी के तटों व जंगलों में चीतल, सांभर और नीलगाय को विचरते देखना रोचकता से भरपूर होता है, वहीं बांस के झुरमुटों के आस-पास गौर के विशाल झुंड और घने वनों में भोजन की तलाश में लगे सियारों, जंगली कुत्तों और रहीसस बंदरों को देखने का अहसास भी बड़ा ही अनोखा होता है।

हाथी की सवारी : पार्क में पर्यटकों द्वारा हाथियों की सवारी बाघों को देखने के लिए की जाती है जिसका अपना अलग ही आनंद है।

बोटिंग : पार्क में पेंच जलाशय के विभिन्न छोटे-छोटे पानी से घिरे भूखण्डों तक नाव द्वारा पहुंचने का अनुभव भी कुछ कम नहीं होता है। पर्यटकों के लिए यहां मोटरबोट्स, पैडलबोट्स और चप्पू नाव जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध हैं।

कैसे जाएं
नागपुर-जबलपुर राजमार्ग क्रमांक-7 पर स्थित पेंच टाइगर रिजर्व जाने के लिए सबसे पहले आपको महाराष्ट्र के नागपुर शहर आना होगा। नागपुर देश के तमाम शहरों से रेल और वायु मार्ग से जुड़ा हुआ है। नागपुर से पेंच की दूरी 92 किमी है। यहां से बस आपको खवासा (80 किमी) तक पहुंचाती है जो पेंच के तूरिया गेट से लगभग 12 किमी दूर है। इसके अलावा मध्यप्रदेश के जबलपुर शहर (190 किमी) और छिंदवाड़ा (120 किमी) से भी यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। पर्यटक नागपुर, जबलपुर और सिवनी से टैक्सी के जरिए भी जा सकते हैं। अधिक जानकारी के लिए सिवनी की वेबसाइट- www.seoni.nic.in विजिट कर सकते हैं। 

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रामकृष्‍ण डोंगरे 

(अमर उजाला काम्पैक्ट में 09-06-2013  को प्रकाशित आर्टिकल.)

बुधवार, 29 मई 2013

छिन्दवाड़ा जिले की स्थानीय बोली में लिखी कविता

रचनाकार ‘‘अवधेश तिवारी’’

लेखे बिण्डल, पुटकी, टूरा-टूरी और लुगाई रे,
पहली दफे रेल में चहगे, छिद्दी-छिद्दन दाई रे।
चहगेई थे कि दई रेल ने लम्बो पूँगा रे दादा,
सट् ने हो गये प्रान, सूख गये छिद्दी आधे से ज्यादा।

भक-भक कारो धुआँ देख के, छिद्दन बोली ‘‘ई बाई’’,
जैसेई सरकी रेल कि छिद्दी बोले ‘‘ जै माता दाई’’।
छुक-छुक-छुक-छुक सुनखे चारई की आँखी भर आई रे,
पहली दफे रेल में चहगे, छिद्दी-छिद्दन दाई रे।

जरई सरक खे रूक गई गाड़ी, मुन्ना ने पूछो ‘‘काहे’’
छिद्दी बोले-‘‘चुप्पई रह तू, सिंगल देहे जभई जाहे’’
सिंगल भओ तो चली रेल फिर, मुर्हा बजान लगो तारी,
दोई टूरन के बार पकड़ खे ठाड़ी हो गई महतारी।

लहकत-लहकत चली रेल फिर, मड़काहाँड़ी आई रे
पहली दफे रेल में चहगे, छिद्दी-छिद्दन दाई रे।
मड़काहाँड़ी से डब्बा में चहगी एक डुकरी दाई,
मुर्रा-फूटा-नड्डा-खारा, डलिया में बेचन लाई।

मुन्ना ने मुन्नी खे देखो, मुन्नी ने महतारी खे
महतारी छिद्दी खे देखे, छिद्दी डलिया वारी खे।
छिद्दी सोच रहे है-‘‘खालो, काया है आनी-जानी’’,
लये चार नड्डा फिर उन्ने, खान लखे चारई प्रानी।

नड्डा खाके फिर छिद्दी ने, अद्धी बिड़ी जलाई रे
पहली दफे रेल में चहगे, छिद्दी-छिद्दन दाई रे।
पूँगा मारत-मारत भइया, रेल पहँुच गई छिन्दवाड़ा,
सबसे पहले मुन्ना उतरो, पकड़ पिजामा को नाड़ा।

फिर छिद्दी-छिद्दन सब उतरे, ठेसन के बाहर आये,
सुकलूढाना कना निकर गये, दो दिन मिजवानी खाये।
दो दिन तक वे खूबई घूमे, गोल गंज, इतवारी में,
कभी दिखामें लालबाग में, और कभी बुधवारी में।

खाये खूब बरफ के गोला, खूब जलेबी खाई रे,
पहली दफे रेल में चहगे, छिद्दी-छिद्दन दाई रे।
दो दिन बीते छिन्दवाड़ा से लौटन की बिरिया आई,
हिलक-हिलक खे चारई रोये, बिण्डल पुटकी बँधवाई।

गाँव लौट खे आ गये छिद्दी, मगर रेल खे नई भूले,
जब तक जिन्दा रहे, आँख में रात दिना रेलई झूले।

मरती बिरिया इत्तई बोले-‘‘मेरो ठेसन आ गओ रे-
अब सिंगल दे दए प्रभुजी ने मैने टिकट कटा लओ रे-
छुक-छुक मेरे प्रान चले, प्रभु के घर राम दुहाई रे’’
पहली दफे रेल में चहगे, छिद्दी-छिद्दन दाई रे।
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शब्दार्थ:-तारी- ताली, मड़काहाड़ी-एक रेलवे स्टेशन का नाम
खारा-नमकीन,    गोलगंज,इतवारी, लालबाग,सुकलूढाना-छिन्दवाड़ा के मोहल्ले


साभार
http://awdheshtiwarichhindwara.blogspot.in/

सोमवार, 27 मई 2013

छिंदवाडा छवि से मिली जिले को नई पहचान

जिले की पहली हिंदी वेबसाइट छिंदवाडा छवि की पांचवीं सालगिरह पर सेमिनार का आयोजन
जिले को पर्यटन केंद्र बनाने में मददगार छिंदवाडा छवि : संजय गौतम
व्यक्ति और क्षेत्र की पहचान होती है वेबसाइट : डॉ ब्राउन
दैनिक भास्कर के संपादक संजय गौतम
छिंदवाडा (25 मई, 2013). वेबसाइट किसी भी व्यक्ति, व्यवसाय और क्षे़त्र की पहचान होती है। यदि आज के दौर में आपके पास ये पहचान नहीं है तो आप कुछ भी नहीं है। यह कहना था डीडीसी कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल डॉ ए के ब्राउन का। वे जिले की पहली हिंदी वेबसाइट छिंदवाडा छवि की पांचवी सालगिरह पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे।

   कार्यक्रम का आयोजन स्थानीय पीजी कॉलेज में प्राचार्य डॉ पी आर चंदेलकर की अध्यक्षता में किया गया। इस मौके पर हिंदी विभाग और छिंदवाडा छवि के संयुक्त तत्वाधान में युवा पीढी और संचार क्रांत्रि  विषय पर सेमिनार का आयोजन किया गया। इस दौरान माडरेटर एवं प़त्रकार रामकृष्ण डोंगरे ने वेबसाइट प्रजेंटेसन दिया। उन्होंने कहा कि वेबसाइट से जुडकर दुनियाभर में फैले छिंदवाडा वासियों को अनूठा अपनापन मिल रहा है।
  डॉ ब्राउन ने विषय पर बोलते हुए कहा कि हम सोशल साइट का इस्तेमाल करते हैं लेकिन इन वेबसाइटों पर डाले गए हमारे अपडेट, जानकारियां हमारी संपत्ति नहीं होती। इसलिए वेबसाइट बनाना बेहद जरूरी है। सेमिनार के मुख्य वक्ता और दैनिक भास्कर के संपादक संजय गौतम ने कहा कि छिंदवाडा छवि जिले को पर्यटन केंद्र बनाने में मददगार साबित हो रही है।  श्री गौतम ने कहा कि हमारा जिला पर्यटन की अपार संभावनाओं से भरा पडा है। हमें वेबसाइट जैसे माध्यम का सकारात्मक उपयोग करना चाहिए। तभी हम और हमारा छिंदवाडा जिला आगे बढ सकता है।

वरिष्ठ साहित्यकार प्रभुदयाल श्रीवास्तव ने छिंदवाडा छवि की पांचवीं सालगिरह पर बधाई देते हुए कहा कि वेबसाइट से जिले को नई पहचान मिली है जो कि सराहनीय प्रयास है। उन्होंने युवा पीढी के़ द्वारा सूचना माध्यम के सकारात्मक प्रयोग की आवश्यकता पर बल दिया।

विपिन वर्मा ने अपने विचार रखते हुए कहा कि युवा छिंदवाडा की ज्यादा से ज्यादा जानकारी वेबसाइट पर अपलोड करें। अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्राचार्य डॉ पी आर चंदेलकर ने कहा कि इस वेबसाइट की पांचवीं सालगिरह हमारे कॉलेज में मनाई जा रही है यह हर्ष का विषय है। उन्होंने वेबसाइट के प्रयासों को गति देने के लिए सभी के सहयोग की कामना की। 

कार्यक्रम का  संचालन टेलीविजन पत्रकार अमिताभ दुबे ने किया। कार्यक्रम को सफल बनाने में भौतिक विभाग के प्रोफेसर डॉ जे के डोंगरे का विशेष सहयोग रहा। इस मौके पर हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ लक्ष्मीचंद, प्रोफेसर विजय कलमधार, साहित्यकार ओमप्रकाश  नयन, सहजाद सिंह पटेल, विनोद बरोलिया और कई छात्र- छात्राएं मौजूद थीं।

गुरुवार, 16 मई 2013

छिंदवाड़ा छवि का पांचवां बर्थडे...

'छिंदवाड़ा छवि' से जुड़कर अनूठा अपनापन मिलता छिंदवाड़ा के दोस्तों को
 अब जल्द ही 'छिंदवाड़ा छवि'को डॉट कॉम पर लाने का प्रयास कर रहा हूं। 'छिंदवाड़ा छवि' के जरिए कई सीनियर लोगों से मेरा संबंध प्रगाढ़ होता गया। मशहूर कवि-वरिष्ठ पत्रकार बाबा विष्‍णु खरे ने मुझे अचानक ही गुगल के जरिए मुझे यानी 'छिंदवाड़ा छवि' को खोज लिया। उनसे मुलाकात भी हुई। मुंबई में कार्यरत भाई असद अली को भी मुझसे इसी ने मिलवाया।
आगामी 25 मई को ब्लॉग वेबसाइट 'छिंदवाड़ा छवि' http://chhindwara-chhavi.blogspot.in/ के पांच साल पूरे हो रहे हैं। साल 2008 में मैंने इसे शुरू किया था। उस समय ब्लॉगिंग का दौर चला था। कस्बा, मोहल्ला, भड़ास, रेडियोवाणी जैसे कई ब्लॉग बहुत मशहूर हुआ करते थे।

हमने भी इन ब्लॉगों को पढ़कर इस दिशा में कदम बढ़ाया। तब मैंने http://dongretrishna.blogspot.in/ यूआरएल पर अपना ब्लॉग बनाया। नाम दिया- 'डोंगरे की डायरी'। सोचा था कभी भी नाम बदल देंगे। लेकिन अब तक यहीं चल रहा है। लोग मुझे डायरी वाले डोंगरे जी भी कहने लगे। अपने इस ब्लॉग में मैंने कई पोस्ट डाली। इनमें हमारे छिंदवाड़ा जिले पर भी कुछ पोस्ट थी। बाद में लगा कि छिंदवाड़ा के लिए अलग प्लेटफार्म चाहिए। इसी सोच ने जन्म दिया 'छिंदवाड़ा छवि' को।

उसके बाद से लगातार इसे मैं अपडेट करता आ रहा हूं। एक-दो या तीन नहीं पूरे पांच साल बीत गए। अब जल्द ही इस डॉट कॉम पर लाने का प्रयास कर रहा हूं। 'छिंदवाड़ा छवि' के जरिए कई सीनियर लोगों से मेरा संबंध प्रगाढ़ होता गया। मशहूर कवि-वरिष्ठ पत्रकार बाबा विष्‍णु खरे ने मुझे अचानक ही गुगल के जरिए मुझे यानी 'छिंदवाड़ा छवि' को खोज लिया। उनसे मुलाकात भी हुई। मुंबई में कार्यरत भाई असद अली को भी मुझसे इसी ने मिलवाया।

देश-विदेश के तमाम छोटे-बड़े शहरों में फैले छिंदवाड़ा के दोस्तों को इससे जुड़कर अनूठा अपनापन मिलता है। क्योंकि इंटरनेट पर हिंदी में यही एकमात्र छिंदवाड़ा की साइट-ब्लॉग है। इसका कारवां लगातार बढ़ता जा रहा है। कई आमंत्रित लेखक के रूप में लोग इस प्लेटफार्म पर लिख रहे हैं। छिंदवाड़ा के कई महत्वपूर्ण जगहों की तस्वीरें इस पर देखी जा सकती है। उम्मीद करता हूं कि तमाम दोस्तों का मुझे यूं ही सहयोग मिलता रहेगा। कुछ लोगों को लेखक के रूप में इससे जोड़ने की मुहिम भी शुरू करनी है।

बुधवार, 15 मई 2013

तंसरा दरगाह शरीफ में 55 वें सालाना उर्स मेले का आगाज

  • छिंदवाड़ा में होगा यूपी के कव्वालों का मुकाबला...
  • बाबा दीवाने शाह की दरगाह पर शाही संदल 18 मई को होगा पेश

तुझ से राजी है, खुदा ऐ महज़बीने तन्सरा।
तुझ पे हो रहमत खुदा कीं, सरज़मीने तन्सरा।
- हजरत अल्लामा मौलाना अल्हाज डॉ. मुहम्मद अब्दुल 'गनी'
‌छिंदवाड़ा जिले की सरज़मीने तन्सरा यानी ग्राम तंसरामाल बाबा दीवाने शाह के 55वें सालाना उर्स के मौके पर सूफियाना रंग में रंगी नजर आएगी। सालाना उर्स यानी मेले का आगाज 16 मई से हो रहा है। इस बार का कव्वाली मुकाबला यूपी के दो मशहूर कव्वालों के बीच होगा। पहले कव्वाल बिजनौर के सरफराज शाबरी होंगे। वहीं दूसरे हमीरपुर के असलम निजामी। तंसरा दरगाह शरीफ से जु़ड़े सैयद आबिद अली उर्फ गुड्डू भाई ने बताया कि पिछले दस सालों में उर्स मेले का स्वरूप काफी बड़ा हो गया है। यहां आने वाले जायरीनों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है। एक अनुमान के मुताबिक इस बार 50 हजार से ज्यादा लोग दरगाह पर आएंगे। उन्होंने कहा कि 16 से 18 मई तक चलने वाले इस मेले का समापन 19 मई की सुबह होगा।

तंसरा दरगाह शरीफ के इस उर्स में देशभर से जायरीन आते हैं। इनमें महाराष्ट्र के मुंबई समेत कई जिले, बिहार, मध्यप्रदेश के सिवनी, बालाघाट, बैतुल आदि शामिल है। इस खास मौके पर छिंदवाड़ा जिले के कोयलांचल क्षेत्र के जामई, जुन्नारदेव, परासिया, चांदामेटा आदि कई शहरों से बड़ी तादाद में लोग आते हैं। यहां आने वाले सभी जायरीनों के लिए भोजन की भी व्यवस्‍था की जाती है। इसके अलावा सभी को प्रसाद के रूप में पुलाव भी दिया जाता है। इन तीन दिनों के दौरान गांव का माहौल काफी अच्छा होता है। सूफी कलामों की गूंज दूर तक सुनाई देती है। लोग सिर पर मखमल की चादर और अकीदत के फूल लिए अपनी बारी का इंतजार करते नजर आते हैं।

कार्यक्रम
16 मई-55 वें उर्स मेले का आगाज
17 मई- संदल और चादर चढ़ाई जाएगी
18 मई- शाही संदल गांव में गश्त करता हुआ दरगाह पहुंचेगा
                 इसके अलावा कव्वाली का महा मुकाबला हागा
               - सरफराज शाबरी (बिजनौर, यूपी)
               - असलम निजामी (हमीरपुर, यूपी)
19 मई- मेले का समापन

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

आज भी प्रतुल चंद द्विवेदी के प्रशंसक है कमलनाथ

आरपी कस्तूरे

प्रतुल जी के स्वभाव ने गैरों को भी अपना बना लिया था। कमलनाथ आज भी उनके प्रशंसक है।

एक जमाना था जब संघ का स्वयंसेवक जनसंघ में जाता था। इनकी राजनीति के दुश्मन भी, इनकी ईमानदारी पर आँख बंद कर भरोसा करते थे। उस समय के जनसंघ के नेता पूजनीय थे। उनका दामन साफ था। जो कुछ भी करते, समाज के लिए करते थे। उनका अपना कोई स्वार्थ नहीं था। मैं दो-तीन ऐसे लोगो को जानता हूं, जो आज भी घर- घर में वंदनीय है। उनमें से एक स्वर्गीय प्रतुल चंद द्विवेदी है। जो संघ के उस समय के नामी गिरामी प्रचारक थे।

मेरे गृह नगर छिंदवाडा (मध्यप्रदेश) में हर कोई उन्हें सम्मान से देखता था। उस समय के कलेक्टर भी उन्हें सम्मान देते थे। मास्टर साहब के नाम से जाने जाते थे। बीजेपी में आए, दुर्भाग्य से एक भी चुनाव नहीं जीत सके। बीजीपी ने नहीं, कमलनाथ ने उनके घर के पास उनकी मूर्ति लगाई। वे आज भी सबके दुलारे है। संघ की शिक्षा के अनुसार वे किसी को दुश्मन नहीं मानते थे। सबके लिए वे आदरणीय थे। आज भी है। दूसरे श्री सुदरलाल शक्रवार है, जिनकी गिनती संघ के हार्डकोर नेताओं में होती है। एक समय तक साथ देना, इनका स्वभाव है। शिवराज सिंह चौहान जी ने इन्हें शायद कोई पद दिया था। उस पद की गरिमा को बखूबी निभाया, न कोई हल्ला था, ना कोई गुल्ला। अनुशासित स्वयं सेवक के रूप में इनकी गणना होती है। ये व्यवहारिक नहीं थे जबकि प्रतुल जी व्यवहारिक थे।

लोकप्रियता में कोई भी प्रतुल जी की बराबरी नहीं कर सकता था। हालांकि वे एक भी चुनाव नहीं जीते, कमलनाथ से हमेशा हारे। कहा जाता है कि मैदान में पराजित योध्या का कोई स्थान नहीं होता। किंतु यह अपवाद ही था कि विजेता उनके हर सुख दुःख में शामिल रहा था। ऐसा विजेता मिलना कठिन है। प्रतुल जी के स्वभाव ने गैरों को भी अपना बना लिया था। कमलनाथ आज भी उनके प्रशंसक है।

सोमवार, 8 अप्रैल 2013

कॉमेडी सर्कस से चर्चा में छिंदवाड़ा के मुबीन सौदागर

लाफ्टर शो कॉमेडी सर्कस से चर्चा में आए मुबीन सौदागर छिंदवाड़ा जिले के कोयलांचल क्षेत्र के निवासी है। सोनी टीवी पर आने वाला यह शो प्रत्येक शनिवार-रविवार को रात साढ़े आठ बजे
डायलॉग से पहचान बना चुके मुबीन सौदागर
आता है। इस शो का उनके प्रशंसकों को बड़ी बेसब्री से इंतजार होता है। मिमिक्री आर्टिस्ट और एक्टर मुबीन ने कई टीवी सीरियलों में भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है। जैसे- लाफ्टर के फटके, हॅलो कौन पहचान कौन (स्टार वन), जॉनी आला रे (जी टीवी), कॉमेडी चैम्पियनस (सहारा वन), ये चंदा कानून (सबटीवी), अहसान कुरैशी की पान की दुकान (मस्ती चैनल) और राजू श्रीवास्तव के साथ बकवास आदि। डायलॉग से पहचान बना चुके मुबीन  का कहना है कि उन्हें लोगों को हंसाने में मन को संतुष्टि मिलती है। उन्होंने देशभर में कई स्टेज शो भी किए है। 



Mubeen Saudagar's profile
Actor, Stand-up Comedian, Mimicry artist, Live Show Performer, Film TV & Stage Artist..
Google Talk
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Yahoo! Messenger   
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गुरुवार, 14 मार्च 2013

छिंदवाड़ा के सौ चेहरों की तलाश...

 'माय छिंदवाड़ा, माय पीपुल्स' की मुहिम 
'माय छिंदवाड़ा, माय पीपुल्स' टीम जल्द ही एक नायाब किताब "छिंदवाड़ा के सौ चेहरे" प्रकाशित करना चाह रही है जिसमें तलाश है छिंदवाड़ा जिले में जन्में, शिक्षा-दीक्षा लिए और फ़िर छिंदवाड़ा से बाहर जाकर देश या विदेश के किसी शहर में जॉब कर रहे सफ़ल प्रोफेशनल लोगों की। इसमें महिला और पुरुष, दोनों ही वर्गों का बराबर प्रतिनिधित्व होगा। अगर आप महसूस करते हैं कि आप हमारे जिले के नौनिहालों को एक राह दिखा सकते है, उन्हें बेहतर करियर चुनने में मदद कर सकते है या किसी भी तरह से प्रेरणा प्रदान कर सकते है तो जल्द संपर्क करिए अपने अपडेटेड प्रोफाइल और फोटो के साथ इस टीम से।
 हर गाँव और शहर की अपनी एक अलग पहचान होती है, उस गाँव और शहर से जुडी हर शख्सियत अपनी माटी की खुश्बू लिये होती है। अपना जिला छिंदवाडा भी है कमाल का, यहाँ के पानी जो दम है, पता नहीं, कहीं इतना हो या न हो। जब-जब छिंदवाडा से जुडे लोगों की उपलब्धियों की सुनाई पडती है, सीना गर्व से चौडा हो जाता है। 
 एक बार छिंदवाडा में किसी परिचर्चा के दौरान पद्मश्री पंडित विश्वंभर्नाथ पाँडे जी का जिक्र हुआ, हद तो तब हो गयी कि मंच पर आसीन नेताजी को पता तक ना था कि ये शख्सियत कौन है? जितने लोग इस वक्त ये जानकारी पढ रहे है, हम दावा कर सकते है, 90% प्रतिशत से ज्यादा लोगों को पता ही नहीं होगा कि पंडित जी हमारे जिले में जन्में, पढाई की और राजनीति से लेकर समाजसेवा, राज्यपाल होने से लेकर पद्मश्री जैसा सम्मान प्राप्त करा। हमारे जिले के लोग ही इन्हे नही जानते। 
मेजर अमित ठेंगे के शहीद होने पर सारा जिला तिरंगे लेकर इस जवान की अंतिम यात्रा में चला। शहीद मॆजर अमित के बारे में कितने अधिकारी/ जिले के लोग जानते थे कि वे फ़ौज में है? क्या कभी किसी स्थानीय संस्था ने शाल और श्रीफ़ल देकर देश सेवा के लिये उन्हें जीते जी धन्यवाद भी दिया? आज हमारे जिले से कितने युवा और जवान देश सेवा के लिये अपनी जान लगाये फ़ौज में काम कर रहे है, कोई नही जानता। शहर में मेजर अमित की प्रतिमा लगा जरूर लगा दी गयी है, लेकिन उनकी देश-भक्ति और देश के लिये मर मिटने का जज्बा हमारे युवाओं में और भी कूट कूट के आता, बशर्ते शहीद मेजर अमित की मुलाकात हमारे जिले के युवाओं से उस वक्त होती जब बो जीवित थे, माँ भारती के सेवा में थे। अच्छा होता जब उनकी मुलाकात यहाँ के युवाओं से हो पाती.. खैर

मुद्दा दरअसल ये है कि हम अपने जिले कि प्रतिभाओं के बारे मे जानते ही नही। "माय छिंदवाडा माय पीपुल्स" जैसे डेटाबेस बनाने का उद्दॆश्य ही यही है कि आप सब लोगों को हमारे जिले के उन लोगों से मिलवाए जो छिंदवाडा के लिये छोटी ही सही, पर एक मिसाल साबित किये है। 
 यहाँ हमारा उद्धेश्य कतई ये नही कि हम इन लोगों को या इनकी उपल्ब्धियों को प्रचार प्रसार करें। उद्देश्य यह है कि छिंदवाडा का युवा ये बात समझे कि वो भी इन ऊचाईयों को पा सकता है जहाँ तक ये तमाम लोग पहुँचे है। जिस जिलें मे आप उत्तम शिक्षा न मिल पाने की दुहाई देते है, अंग्रेजी भाषा बोलने के लिये माहौल न मिलने की बात करते है, ठीक उसी जगह से ये लोग पढ-लिखकर आगे आए है, यहाँ से बाहर निकल आसमाँ चूम लिया, सच ही है, जहाँ चाह होती है, राह भी वहीं होती है। आप सब युवाओं से उम्मीद की जा सकती है कि आप इस डेडाबेस में जिक्र लोगों की प्रोफ़ाईल पढें, आप उनसे कुछ जानकारी लेना चाहें, मार्गदर्शन लेना चाहें, बेशक उनसे संम्पर्क करें या हमें लिखें, हम आपका विचार उन तक जरूर पहुँचा देंगे। 
इन सभी की सारी जानकारी हमारे डेटाबेस www.chhindwara.patalkot.com पर उपलब्ध है।

आखिर क्या है ये तलाश सौ चेहरों की
क्या छिंदवाड़ा की माटी में आपका जन्म हुआ है, क्या आपने अपनी लाईफ़ के कुछ साल छिंदवाडा में बिताये हैं या आपकी शिक्षा-दीक्षा इस जिले में हुयी है? क्या आप छिंदवाड़ा से प्यार करते हैं? और यहाँ के युवाओं के लिए अपनी तरफ़ से कोई मार्गदर्शन के लिए तत्पर हैं?...अपनी माटी और अपने लोगों से आपका लगाव या जुड़ाव है? क्या आप चाहते हैं कि हमारे जिले की नई पीढ़ी के लोग आगे आए और देश-दुनिया में अपना और जिले का नाम रोशन करें? तो आईये जुड जाईये एक अनोखे प्रयास के साथ जिसका नाम है 'माय छिंदवाड़ा, माय पीपुल्स' ..

.'माय छिंदवाड़ा, माय पीपुल्स' टीम जल्द ही एक नायाब किताब "छिंदवाड़ा के सौ चेहरे" प्रकाशित करना चाह रही है जिसमें तलाश है छिंदवाड़ा जिले में जन्में, शिक्षा-दीक्षा लिए और फ़िर छिंदवाड़ा से बाहर जाकर देश या विदेश के किसी शहर में जॉब कर रहे सफ़ल प्रोफेशनल लोगों की। इसमें महिला और पुरुष, दोनों ही वर्गों का बराबर प्रतिनिधित्व होगा। अगर आप महसूस करते हैं कि आप हमारे जिले के नौनिहालों को एक राह दिखा सकते है, उन्हें बेहतर करियर चुनने में मदद कर सकते है या किसी भी तरह से प्रेरणा प्रदान कर सकते है तो जल्द संपर्क करिए अपने अपडेटेड प्रोफाइल और फोटो के साथ इस टीम से। अगर आप ऐसे प्रोफेशनल लोगों के नाम या संपर्क नंबर हैं तो आप हमें ई-मेल या फ़ेसबुक पेज पर बता सकते हैं, हम उन लोगों से संपर्क करेंगे।

कौन होंगे सौ चेहरे
'माय छिंदवाड़ा, माय पीपुल्स' पर ऑनलाइन एडीशन में आप फिलहाल उन 60 से ज्यादा प्रोफेशनल लोगों के प्रोफाइल देख सकते हैं, जो विदेश के कई शहरों में है और हमारे जिले का नाम चमचमा रहें हैं जैसे- आस्ट्रेलिया के सीबीसी रेडियो में राखी बटाविया, लंदन में डॉ. विजय वाघ, अमेरिका के सेन फ्रांसिस्को में अभिनव तिवारी, डॉ. विशाल कोठारी, शारजाह यूनिवर्सिटी में डॉ सेन, भूटान में ललित लोखंडे, मलेशिया में अखिलेश बाँगरे, आस्ट्रेलिया में आकाश राय या फ़िर यूएई में विनय चाँदले आदि। इस ऑनलाइन एडीशन में भारत के प्रमुख शहरों जैसे दिल्ली, मुंबई, बंगलूरू, अहमदाबाद, सूरत, इंदौर में अलग-अलग क्षेत्रों में कार्यरत छिंदवाडा के तमाम होनहार लोग भी शामिल है जिन्होनें कड़ी मेहनत और लगन के बूते पर आज यह मुकाम हासिल किया है। कठिन परिस्थितियों और कम संसाधनों के बावजूद ये लोग अपने कॅरियर में सफल हुए है। हमें ऐसे ही युवा और वरिष्ठ लोगों के प्रोफाइल चाहिए जो आने वाली पीढ़ी के युवाओं का मागदर्शन और हेल्प करने का इरादा रखते हो।

छिंदवाड़ा के कई बड़े नाम आज विश्व के फलक पर चमक रहे हैं। इनमें वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार विष्‍णु खरे, दूरदर्शन के महानिदेशक लीलाधर मंडलोई, बॉलीवुड के आर्ट डायरेक्टर अजय देशमुख, टीवी चैनलों के जाने माने नाम एंकर दिनेश गौतम, संगीतकार शिव राजोरिया, गज़ल गायक रवि नासेरी, डी आर डी ओ के डायरेक्टर पी आर बघेल, प्रोफ़ेसर महेन्द्र राय जैसे कई नाम शामिल हैं।

क्या है किताब का मकसद?
इस किताब का मकसद है, स्कूली बच्चों को अपने कॅरियर की प्लानिंग और मार्गदर्शन उपलब्‍ध कराना। स्कूली बच्चे उन सौ लोगों से फोन, ई-मेल से संपर्क कर सकते हैं। 'माय छिंदवाड़ा, माय पीपुल्स' टीम के द्वारा तैयार की जा रही सौ प्रोफेशनल लोगों के प्रोफाइल वाली किताब को जिले के ग्रामीण और शहरी स्कूलों के बच्चों को निशुल्क वितरित किया जाएगा ताकि हमारी नई पीढ़ी के बच्चों को इन धुरंधरों से कुछ प्रेरणा मिल सकें। इस किताब का मकसद यह कदापि नहीं है कि हमारी टीम उन सौ लोगों को महान या सर्वश्रेष्ठ होने का खिताब दे रही है, लेकिन यह जरूर बताने का प्रयास किया जा रहा है कि विपरीत परिस्थितीयों में, शिक्षण व्यवस्था को बगैर कोसे, संसाधनों की कमी का जिक्र किए इन लोगों ने एक मुकाम हासिल किया है, ये हमारे प्रेरणा स्रोत हैं।

आप कैसे कर सकते हैं मदद
अगर आप है हमारे सौ चेहरे तो जल्द भेजिए अपना अपडेट प्रोफाइल फोटो के साथ। अगर आपके पास है उन प्रोफेशनल लोगों के नाम या नंबर है, तो आप हमें ई-मेल या फोन पर बता सकते हैं। हम उन लोगों से संपर्क करेंगे या आप किसी ऐसी शख्सियत को जानते है, जिसे यहाँ फ़ीचर किया जाए, हमारी मदद करें, जो छिंदवाडा की एक प्रतिभा हो, या अपने क्षेत्र में अच्छा काम कर रहे, और छिंदवाडा से बाहर रह रहें है, हम तक उनकी जानकारी, संपर्क जानकारी आदि जरूर दें।

देखिए तमाम प्रफ़ाईल्स को  www.chhindwara.patalkot.com पर या ईमेल करें chhindwara@gmail.com पर..य़ा जुडे इस पेज से फ़ेसबुक पर https://www.facebook.com/pages/My-Chhindwara-My-People/127991423917653?ref=hl

आपके विचार आमंत्रित है..

धन्यवाद
टीम ~ My Chhindwara My People