बुधवार, 29 मई 2013

छिन्दवाड़ा जिले की स्थानीय बोली में लिखी कविता

रचनाकार ‘‘अवधेश तिवारी’’

लेखे बिण्डल, पुटकी, टूरा-टूरी और लुगाई रे,
पहली दफे रेल में चहगे, छिद्दी-छिद्दन दाई रे।
चहगेई थे कि दई रेल ने लम्बो पूँगा रे दादा,
सट् ने हो गये प्रान, सूख गये छिद्दी आधे से ज्यादा।

भक-भक कारो धुआँ देख के, छिद्दन बोली ‘‘ई बाई’’,
जैसेई सरकी रेल कि छिद्दी बोले ‘‘ जै माता दाई’’।
छुक-छुक-छुक-छुक सुनखे चारई की आँखी भर आई रे,
पहली दफे रेल में चहगे, छिद्दी-छिद्दन दाई रे।

जरई सरक खे रूक गई गाड़ी, मुन्ना ने पूछो ‘‘काहे’’
छिद्दी बोले-‘‘चुप्पई रह तू, सिंगल देहे जभई जाहे’’
सिंगल भओ तो चली रेल फिर, मुर्हा बजान लगो तारी,
दोई टूरन के बार पकड़ खे ठाड़ी हो गई महतारी।

लहकत-लहकत चली रेल फिर, मड़काहाँड़ी आई रे
पहली दफे रेल में चहगे, छिद्दी-छिद्दन दाई रे।
मड़काहाँड़ी से डब्बा में चहगी एक डुकरी दाई,
मुर्रा-फूटा-नड्डा-खारा, डलिया में बेचन लाई।

मुन्ना ने मुन्नी खे देखो, मुन्नी ने महतारी खे
महतारी छिद्दी खे देखे, छिद्दी डलिया वारी खे।
छिद्दी सोच रहे है-‘‘खालो, काया है आनी-जानी’’,
लये चार नड्डा फिर उन्ने, खान लखे चारई प्रानी।

नड्डा खाके फिर छिद्दी ने, अद्धी बिड़ी जलाई रे
पहली दफे रेल में चहगे, छिद्दी-छिद्दन दाई रे।
पूँगा मारत-मारत भइया, रेल पहँुच गई छिन्दवाड़ा,
सबसे पहले मुन्ना उतरो, पकड़ पिजामा को नाड़ा।

फिर छिद्दी-छिद्दन सब उतरे, ठेसन के बाहर आये,
सुकलूढाना कना निकर गये, दो दिन मिजवानी खाये।
दो दिन तक वे खूबई घूमे, गोल गंज, इतवारी में,
कभी दिखामें लालबाग में, और कभी बुधवारी में।

खाये खूब बरफ के गोला, खूब जलेबी खाई रे,
पहली दफे रेल में चहगे, छिद्दी-छिद्दन दाई रे।
दो दिन बीते छिन्दवाड़ा से लौटन की बिरिया आई,
हिलक-हिलक खे चारई रोये, बिण्डल पुटकी बँधवाई।

गाँव लौट खे आ गये छिद्दी, मगर रेल खे नई भूले,
जब तक जिन्दा रहे, आँख में रात दिना रेलई झूले।

मरती बिरिया इत्तई बोले-‘‘मेरो ठेसन आ गओ रे-
अब सिंगल दे दए प्रभुजी ने मैने टिकट कटा लओ रे-
छुक-छुक मेरे प्रान चले, प्रभु के घर राम दुहाई रे’’
पहली दफे रेल में चहगे, छिद्दी-छिद्दन दाई रे।
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शब्दार्थ:-तारी- ताली, मड़काहाड़ी-एक रेलवे स्टेशन का नाम
खारा-नमकीन,    गोलगंज,इतवारी, लालबाग,सुकलूढाना-छिन्दवाड़ा के मोहल्ले


साभार
http://awdheshtiwarichhindwara.blogspot.in/

सोमवार, 27 मई 2013

छिंदवाडा छवि से मिली जिले को नई पहचान

जिले की पहली हिंदी वेबसाइट छिंदवाडा छवि की पांचवीं सालगिरह पर सेमिनार का आयोजन
जिले को पर्यटन केंद्र बनाने में मददगार छिंदवाडा छवि : संजय गौतम
व्यक्ति और क्षेत्र की पहचान होती है वेबसाइट : डॉ ब्राउन
दैनिक भास्कर के संपादक संजय गौतम
छिंदवाडा (25 मई, 2013). वेबसाइट किसी भी व्यक्ति, व्यवसाय और क्षे़त्र की पहचान होती है। यदि आज के दौर में आपके पास ये पहचान नहीं है तो आप कुछ भी नहीं है। यह कहना था डीडीसी कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल डॉ ए के ब्राउन का। वे जिले की पहली हिंदी वेबसाइट छिंदवाडा छवि की पांचवी सालगिरह पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे।

   कार्यक्रम का आयोजन स्थानीय पीजी कॉलेज में प्राचार्य डॉ पी आर चंदेलकर की अध्यक्षता में किया गया। इस मौके पर हिंदी विभाग और छिंदवाडा छवि के संयुक्त तत्वाधान में युवा पीढी और संचार क्रांत्रि  विषय पर सेमिनार का आयोजन किया गया। इस दौरान माडरेटर एवं प़त्रकार रामकृष्ण डोंगरे ने वेबसाइट प्रजेंटेसन दिया। उन्होंने कहा कि वेबसाइट से जुडकर दुनियाभर में फैले छिंदवाडा वासियों को अनूठा अपनापन मिल रहा है।
  डॉ ब्राउन ने विषय पर बोलते हुए कहा कि हम सोशल साइट का इस्तेमाल करते हैं लेकिन इन वेबसाइटों पर डाले गए हमारे अपडेट, जानकारियां हमारी संपत्ति नहीं होती। इसलिए वेबसाइट बनाना बेहद जरूरी है। सेमिनार के मुख्य वक्ता और दैनिक भास्कर के संपादक संजय गौतम ने कहा कि छिंदवाडा छवि जिले को पर्यटन केंद्र बनाने में मददगार साबित हो रही है।  श्री गौतम ने कहा कि हमारा जिला पर्यटन की अपार संभावनाओं से भरा पडा है। हमें वेबसाइट जैसे माध्यम का सकारात्मक उपयोग करना चाहिए। तभी हम और हमारा छिंदवाडा जिला आगे बढ सकता है।

वरिष्ठ साहित्यकार प्रभुदयाल श्रीवास्तव ने छिंदवाडा छवि की पांचवीं सालगिरह पर बधाई देते हुए कहा कि वेबसाइट से जिले को नई पहचान मिली है जो कि सराहनीय प्रयास है। उन्होंने युवा पीढी के़ द्वारा सूचना माध्यम के सकारात्मक प्रयोग की आवश्यकता पर बल दिया।

विपिन वर्मा ने अपने विचार रखते हुए कहा कि युवा छिंदवाडा की ज्यादा से ज्यादा जानकारी वेबसाइट पर अपलोड करें। अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्राचार्य डॉ पी आर चंदेलकर ने कहा कि इस वेबसाइट की पांचवीं सालगिरह हमारे कॉलेज में मनाई जा रही है यह हर्ष का विषय है। उन्होंने वेबसाइट के प्रयासों को गति देने के लिए सभी के सहयोग की कामना की। 

कार्यक्रम का  संचालन टेलीविजन पत्रकार अमिताभ दुबे ने किया। कार्यक्रम को सफल बनाने में भौतिक विभाग के प्रोफेसर डॉ जे के डोंगरे का विशेष सहयोग रहा। इस मौके पर हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ लक्ष्मीचंद, प्रोफेसर विजय कलमधार, साहित्यकार ओमप्रकाश  नयन, सहजाद सिंह पटेल, विनोद बरोलिया और कई छात्र- छात्राएं मौजूद थीं।

गुरुवार, 16 मई 2013

छिंदवाड़ा छवि का पांचवां बर्थडे...

'छिंदवाड़ा छवि' से जुड़कर अनूठा अपनापन मिलता छिंदवाड़ा के दोस्तों को
 अब जल्द ही 'छिंदवाड़ा छवि'को डॉट कॉम पर लाने का प्रयास कर रहा हूं। 'छिंदवाड़ा छवि' के जरिए कई सीनियर लोगों से मेरा संबंध प्रगाढ़ होता गया। मशहूर कवि-वरिष्ठ पत्रकार बाबा विष्‍णु खरे ने मुझे अचानक ही गुगल के जरिए मुझे यानी 'छिंदवाड़ा छवि' को खोज लिया। उनसे मुलाकात भी हुई। मुंबई में कार्यरत भाई असद अली को भी मुझसे इसी ने मिलवाया।
आगामी 25 मई को ब्लॉग वेबसाइट 'छिंदवाड़ा छवि' http://chhindwara-chhavi.blogspot.in/ के पांच साल पूरे हो रहे हैं। साल 2008 में मैंने इसे शुरू किया था। उस समय ब्लॉगिंग का दौर चला था। कस्बा, मोहल्ला, भड़ास, रेडियोवाणी जैसे कई ब्लॉग बहुत मशहूर हुआ करते थे।

हमने भी इन ब्लॉगों को पढ़कर इस दिशा में कदम बढ़ाया। तब मैंने http://dongretrishna.blogspot.in/ यूआरएल पर अपना ब्लॉग बनाया। नाम दिया- 'डोंगरे की डायरी'। सोचा था कभी भी नाम बदल देंगे। लेकिन अब तक यहीं चल रहा है। लोग मुझे डायरी वाले डोंगरे जी भी कहने लगे। अपने इस ब्लॉग में मैंने कई पोस्ट डाली। इनमें हमारे छिंदवाड़ा जिले पर भी कुछ पोस्ट थी। बाद में लगा कि छिंदवाड़ा के लिए अलग प्लेटफार्म चाहिए। इसी सोच ने जन्म दिया 'छिंदवाड़ा छवि' को।

उसके बाद से लगातार इसे मैं अपडेट करता आ रहा हूं। एक-दो या तीन नहीं पूरे पांच साल बीत गए। अब जल्द ही इस डॉट कॉम पर लाने का प्रयास कर रहा हूं। 'छिंदवाड़ा छवि' के जरिए कई सीनियर लोगों से मेरा संबंध प्रगाढ़ होता गया। मशहूर कवि-वरिष्ठ पत्रकार बाबा विष्‍णु खरे ने मुझे अचानक ही गुगल के जरिए मुझे यानी 'छिंदवाड़ा छवि' को खोज लिया। उनसे मुलाकात भी हुई। मुंबई में कार्यरत भाई असद अली को भी मुझसे इसी ने मिलवाया।

देश-विदेश के तमाम छोटे-बड़े शहरों में फैले छिंदवाड़ा के दोस्तों को इससे जुड़कर अनूठा अपनापन मिलता है। क्योंकि इंटरनेट पर हिंदी में यही एकमात्र छिंदवाड़ा की साइट-ब्लॉग है। इसका कारवां लगातार बढ़ता जा रहा है। कई आमंत्रित लेखक के रूप में लोग इस प्लेटफार्म पर लिख रहे हैं। छिंदवाड़ा के कई महत्वपूर्ण जगहों की तस्वीरें इस पर देखी जा सकती है। उम्मीद करता हूं कि तमाम दोस्तों का मुझे यूं ही सहयोग मिलता रहेगा। कुछ लोगों को लेखक के रूप में इससे जोड़ने की मुहिम भी शुरू करनी है।

बुधवार, 15 मई 2013

तंसरा दरगाह शरीफ में 55 वें सालाना उर्स मेले का आगाज

  • छिंदवाड़ा में होगा यूपी के कव्वालों का मुकाबला...
  • बाबा दीवाने शाह की दरगाह पर शाही संदल 18 मई को होगा पेश

तुझ से राजी है, खुदा ऐ महज़बीने तन्सरा।
तुझ पे हो रहमत खुदा कीं, सरज़मीने तन्सरा।
- हजरत अल्लामा मौलाना अल्हाज डॉ. मुहम्मद अब्दुल 'गनी'
‌छिंदवाड़ा जिले की सरज़मीने तन्सरा यानी ग्राम तंसरामाल बाबा दीवाने शाह के 55वें सालाना उर्स के मौके पर सूफियाना रंग में रंगी नजर आएगी। सालाना उर्स यानी मेले का आगाज 16 मई से हो रहा है। इस बार का कव्वाली मुकाबला यूपी के दो मशहूर कव्वालों के बीच होगा। पहले कव्वाल बिजनौर के सरफराज शाबरी होंगे। वहीं दूसरे हमीरपुर के असलम निजामी। तंसरा दरगाह शरीफ से जु़ड़े सैयद आबिद अली उर्फ गुड्डू भाई ने बताया कि पिछले दस सालों में उर्स मेले का स्वरूप काफी बड़ा हो गया है। यहां आने वाले जायरीनों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है। एक अनुमान के मुताबिक इस बार 50 हजार से ज्यादा लोग दरगाह पर आएंगे। उन्होंने कहा कि 16 से 18 मई तक चलने वाले इस मेले का समापन 19 मई की सुबह होगा।

तंसरा दरगाह शरीफ के इस उर्स में देशभर से जायरीन आते हैं। इनमें महाराष्ट्र के मुंबई समेत कई जिले, बिहार, मध्यप्रदेश के सिवनी, बालाघाट, बैतुल आदि शामिल है। इस खास मौके पर छिंदवाड़ा जिले के कोयलांचल क्षेत्र के जामई, जुन्नारदेव, परासिया, चांदामेटा आदि कई शहरों से बड़ी तादाद में लोग आते हैं। यहां आने वाले सभी जायरीनों के लिए भोजन की भी व्यवस्‍था की जाती है। इसके अलावा सभी को प्रसाद के रूप में पुलाव भी दिया जाता है। इन तीन दिनों के दौरान गांव का माहौल काफी अच्छा होता है। सूफी कलामों की गूंज दूर तक सुनाई देती है। लोग सिर पर मखमल की चादर और अकीदत के फूल लिए अपनी बारी का इंतजार करते नजर आते हैं।

कार्यक्रम
16 मई-55 वें उर्स मेले का आगाज
17 मई- संदल और चादर चढ़ाई जाएगी
18 मई- शाही संदल गांव में गश्त करता हुआ दरगाह पहुंचेगा
                 इसके अलावा कव्वाली का महा मुकाबला हागा
               - सरफराज शाबरी (बिजनौर, यूपी)
               - असलम निजामी (हमीरपुर, यूपी)
19 मई- मेले का समापन