सोमवार, 26 अगस्त 2013

मैं रविशंकर डोंगरे बोल रहा हूं...


Ravishankar Dongre (13 march, 1982-15 Aug, 2013)
सुनिए , मैं रविशंकर डोंगरे बोल रहा हूं , जी हां! वही रविशंकर जिसने तीन
साल में सर्पमित्र के रूप में अपनी अनूठी पहचान बना ली थी। परिवार के लोग और यार-दोस्त मुझे पप्पू भैया के नाम से भी जानते थे। आप सोच रहे होंगे की मरने के बाद मैं यहां क्या कर रहा हूं?। बस यों ही, सोचा की आज आप लोगों से बात की जाए।

मेरा बचपन-
मेरा जन्म मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के छोटे से कस्बे उमरानाला में हुआ। तारीख थी 13 मार्च, 1982। मेरा पिता का नाम नारायण डोंगरे। उनकी यहां किसी जमाने में बड़ी किराना दुकान हुआ करती ‌थी। नारायण सेठ की दुकान के नाम से लोग जानते थे। बचपन से खेत-खलियान, नदी-नालों के किनारे खेलने मस्ती करना मुझे बहुत ज्यादा पसंद था। मेरा बालपन भी आम बच्चों की तरह ही बिता। आप सोचते होंगे कि मुझे सांपों से इतना ज्यादा प्रेम कैसे हो गया? मैंने बचपन में देखा कि लोग अपने घरों और खेतों में निकलने वाले सांपों को मार देते हैं। मुझे उस वक्त बहुत दुख होता था। मैं सोचता- आखिर इन्हें कैसे बचाऊं। फिर जैसे-2 मैं बड़ा होता गया, मैंने कचुए, केकड़े और छोटे सांप पकड़ना शुरू किया। धीरे-धीरे यह सब मेरे लिए जुनून बन गया और आप सबका प्‍यारा पप्पू सर्पमित्र बन गया।

मुझे और मेरे जैसे स्नेक फ्रेंड को सभी लोग यह कहकर रोकते हैं कि जो सांप पकड़ता है उसकी मौत भी उससे ही होती है। उनके घरवाले और सब उन्हें डराते हैं। पर वहीं लोग उन दोस्तों को बाइक या कार लेकर देते हैं। तो मैं उन लोगों को कहना चाहता हूं कि- जो स्नेक फ्रेंड है। अभी तक शायद सिर्फ कुछ 100 लोग ही मरे होंगे। पर बाइक या कार के एक्सीडेंट से हर साल लाखों लोग मरते हैं। तो वो ये सब चलाना बंद क्यों नहीं कर देते हैं और शराब , गुटखा और अन्य चीजों से भी हर साल लाखों लोग मरते हैं। तो लोग हमें क्यों ताने मारते हैं कि तू भी स्नेक्स बाइट से मरेगा...। इस बारे में कहना तो मैं बहुत चाहता हूं मगर अभी नहीं।

आप यह भी पूछ सकते हैं कि इतने खतरनाक सांपों को पकड़ने के लिए कोई भी ट्रेनिंग ली होगी? तो मेरा जवाब- 'हां है। मैंने भोपाल में रहने वाले पेशेवर सर्पमित्र सलीम खान से कुछ महीने ट्रेनिंग ली थी। साथ में विलास भी था। सलीम साहब को शायद आप लोग कम जानते होंगे। वे पिछले 28 सालों से खतरनाक सांपों को पकड़ने का काम कर रहे हैं। उन्होंने अब तक करीब पौने तीन लाख सांपों को बचाया है। वे राजधानी भोपाल में नगर निगम में कार्यरत है। वन विहार से भी सलीम भाई लगातार जुड़े हुए है। वे यहां निकलने वाले सभी स्नेक को पचमढ़ी की पहाड़ियों में छोड़ आते है। आपके लिए यह जानना रोचक होगा कि मेरे साथ जो हादसा हुआ। यानी कोबरा के काटने का। यह उनके साथ भी चार-चार बार हो चुका है। मगर बेहतर इलाज की वजह से वे हरबार मौत के मुंह से निकलकर बाहर आ गया। मगर मैं...। खैंर।

सांपों को बचाने की मुहिम
मैंने पिछले तीन सालों में लगातार सांपों को बचाने की मुहिम जारी रखी। मेरे साथ कुछ मित्र भी आ गए। विलास डोंगरे (29), दीपक , सुनील गौतम (30), निखिल राऊत। विलास ऑटोमोबाइल कंपनी में काम करता है। दीपक की कपड़े की दुकान है। निखिल अभी पढ़ाई कर रहा है। विलास ने मुझे बताया था‌ कि उसके एक मित्र की मौत सांप के काटने से हुई थी। तब से वह परेशान रहता था। मगर एक दिन ऐसा कुछ हुआ कि मेरा जीवन ही बदल गया और भी सर्पमित्र बनकर सांपों को बचाने लगा। विलास को इस बात का पता चल गया था कि सांप वैसे किसी को काटता नहीं है, वह अपनी रक्षा करने के लिए हम पर हमला करते हैं। हमारी टीम ने हजार के करीब सांपों को अब तक बचाया।

हमारी टीम को छिंदवाड़ा के वन विभाग का भी पूरा सपोर्ट मिलता था। जब हम सिल्लेवानी के जंगल में सांपों को छोड़ने जाते थे तब भी कुछ फारेस्ट गार्ड हमारे साथ होते थे।  पिछले साल यानी दिसंबर, 2012 में ही हमारी टीम के बारे में वन‌ विभाग को पता चला था। वनविभाग पहले पैसा लेकर सांप पकड़ने वालों यानी सपेरों की सेवाएं लेते थे। मगर चूंकि हम फ्री में यह काम करते थे। इसलिए हम उन्हें ज्यादा अच्छे लगे। मेरी टीम ने एक साल पूरी तरह प्रोफेशनल होकर काम किया। सोशल साइट फेसबुक के जरिए मेरे कई दोस्त बने। महाराष्ट्र के आकाश जाधव, समीर। कनाडा, अमेरिका के कई शहरों जैसे- लास एंजलिस में भी मेरे कई फ्रेंड है। उनसे मेरी लगातार बात होती थी। मुझे पता है कि मेरी मौत का उन्हें गहरा सदमा लगा है। आकाश और समीर ने कई दिन उदासी में गुजारें।

ऐसे हुई मेरी मौत
अब आप यह भी जानना चाहेंगे मेरी मौत कैसे हुई ? तो उस दिन (15 अगस्त, 2013) का किस्सा यूं है। मैं अपने पास रखें 20-25 सांपों को लेकर सिल्लेवानी के जंगल के लिए निकला। मेरे साथ फारेस्ट के गार्ड और मेरा दोस्त, हमारी टीम का मेंबर विलास डोंगरे भी था। हम लोगों ने पहले सिल्लेवानी के स्कूल में बच्चों को अवेरनेस के लिए सांपों को दिखाया। फिर हम लोग सांपों को छोड़ने जंगल में चले गए। हमारे पास 10-12 कोबरा भी थे। कुछ गांव के लिए और बच्चे भी तमाशा देखने के लिए हमारे साथ आ गए। हमने एक-एक करके जार से सांपों को बाहर निकलना शुरू कर दिया। सभी सांप जंगल की तरफ चले गए। मगर एक कोबरा वहीं रुक गया। लोगों ने कई तरह की बातें की। आखिर मुझे उसे उठाकर जंगल की तरफ ले जाना पड़ा।



इसी बीच उसने मेरी अंगुली पकड़ ली। मैंने तुरंत लोगों को बताया। सिल्लेवानी से हम जल्दी ही उमरानाला पहुंचे। वहां कुछ फौरी इलाज करने के बाद भी मुझे राहत नहीं मिली। उल्टियां शुरू हुई तो दोस्तों ने गाड़ी का इंतजाम करके मुझे छिंदवाड़ा के जिला अस्पताल में भर्ती कराया। वहां डॉक्टरों ने मुझे बचाने की भरसक कोशिश की मगर वे बचा न सकें और इस तरह मैं हमेशा- हमेशा के लिए आप सब से दूर चला गया। मुझे मेरी मौत का कोई अफसोस नहीं है।

हां! आप लोगों के लिए एक खुशखबरी है कि अब कोई और रव‌ि आपसे दूर नहीं जाएगा। क्योंकि मेरी टीम के मेंबरों ने अस्पताल में ही अबसे कोई भी सांप न पकड़ने का संकल्प ले लिया है। विलास, सुनील, दीपक, निखिल मेरे भाईयों तुम मुझे भुला नहीं पाओगे और मैं तुम्हें। पर मैं हमेशा सांपों के बारे में ही सोचता रहूंगा। मुझे खुशी है कि मैं सर्पमित्र बना। कुछ और बनता तो उतनी खुशी कभी न होती।

दोस्तों, कहने को तो बहुत कुछ है, मगर आज यहीं विराम लेता हूं, आप सभी को एक बार फिर से प्रणाम!

विशेष नोट-
(मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के सर्पमित्र रविशंकर डोंगरे की आपबीती। इससे मैंने उनकी मौत से पहले की गई बातचीत, उनके दोस्तों और फेसबुक वॉल की मदद से तैयार किया है। भाई रविशंकर यानी पप्पू भैया को 15 अगस्त, 2013 को कोबरा के काटने से मौत हो गई। वे सांपों से बहुत प्यार करते थे उनका प्यार यहां तक था कि उन्हें सांप के काटने से अपनी जान जाने का भी डर नहीं लगता था। )

RAVISHANKAR DONGRE FACEBOOK LINK :

https://m.facebook.com/ravishankar.dongre?refid=46

बुधवार, 21 अगस्त 2013

छिंदवाड़ा शहर में चारफाटक पर मनेगा भुजलिया पर्व

छिंदवाड़ा। सार्वजनिक भुजलिया उत्सव समिति चारफाटक सुकलूढाना क्षेत्र की भुजलिया 23 अगस्त शुक्रवार को दोपहर 2 बजे श्री संतोषी माता मंदिर चार फाटक से मंदिर में पूजन-अर्चना के पश्‍चात् दोपहर 2 बजे चल समारोह प्रारंभ होगा. भुजलिया उत्सव समिति के कार्यक्रम के मुख्य अतिथि नानाभाऊ मोहोड, स्कूल शिक्षा राज्य मंत्री एवं कार्यक्रम के अध्यक्ष पूर्व केबिनेट मंत्री चौ. चन्द्रभान सिंह एवं विशेष आमंत्रित अतिथि भाजपा जिलाध्यक्ष रमेश पोफली, छिंदवाड़ा के विधायक दीपक सक्सेना, नपा. अध्यक्ष कन्हईराम रघुवंशी, पूर्व विधायक पंडित रमेश दुबे, पूर्व विधायक चौ. गंभीर सिंह, कृषि उपज मंडी अध्यक्ष शेषराव यादव, गंगाप्रसाद तिवारी सहित शहर के गणमान्य नागरिकों की उपस्थिति में सम्पन्न होगा. चल-समारोह में आल्हा-गायन, वीर पृथ्वीराज की सेना, आल्हा-उदल, रानी चन्द्रवती का डोला सहित हाथी-घोड़े चलेंगे.

23 को आल्हा गायन एवं शैला नृत्य
सुकलूढाना क्षेत्र में स्व. दहलान सिंह की स्मृति में 23 अगस्त शुक्रवार को दोपहर 12 बजे पदम कॉम्पलेक्स में श्री सार्वजनिक भुजलिया उत्सव समिति चौहारीनाला द्वारा आल्हा गायन एवं शैला नृत्य प्रतियोगिता का आयोजन किया गया है. इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में विधायक दीपक सक्सेना उपस्थित रहेंगे. कार्यक्रम की अध्यक्षता कन्हईराम रघुवंशी करेंगे. आयोजन समिति के अध्यक्ष सोनू मागो और संयोजक संजय मैद ने बताया कि प्रथम विजेता को 1100 शील्ड एवं प्रमाण पत्र, द्वितीय पुरस्कार के रूप में 750 रूपए शील्ड एवं प्रमाण पत्र, तीसरा पुरस्कार के रूप में 500 रूपए दिए जाएंगे. मंडलों के लिए प्रवेश निशुल्क रखा गया है.


साभार- लोकमत समाचार, 20 अगस्त, 2013

शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

एक हमारे जिले के सर्पमित्र और दूसरे ये सांपों के दुश्मन....

(पढ़िए नवंबर, 2012 को मीडिया में आई सर्पमित्रों के काले कारनामों की कुछ खबरें)

।। ज़हर का व्यापार करने के लिए सांपों को दी जाती है प्रताड़ना।।

नागपुर। एक तरफ तो हम सांप का आदर-सत्कार और पूजा करते हैं वहीं दूसरी तरफ सांप को देखते ही मार भी दिया जाता है. वैसे तो सांप जंगलों में रहते हैं या फिर खेत-खलिहानों में पाए जाते हैं. लेकिन बढ़ते शहरीकरण की वजह से सांप अक्सर लोगों के घर में भी निकल आते हैं. अब हालत ये है कि जब भी कोई इंसान सांप को देखता है तो वह डर के मारे थर-थर कांपने लगता है. ऐसे में याद आता है एक ही नाम, सर्प मित्र. तुरंत ही आनन-फानन में सर्प मित्र को बुलवाया जाता है और सांप को सुरक्षित पकड़ कर जंगलों की ओर रवाना करने की व्यवस्था की जाती है. सर्प मित्र सांप को बिना कोई नुकसान पहुंचाए पकड़ते हैं और ऐसा कुछ नहीं करते जिससे सांप को कोई नुकसान हो.

अब कल्पना कीजिए कि अगर सर्प मित्र ही सांप का दुश्मन बन जाए तो. महाराष्ट्र के नागपुर में ऐसा ही कुछ हुआ. यहां सर्प मित्र के चोले में सांपों का कारोबार करने वाला गिरोह सक्रिय था. नागपुर वन सुरक्षा कर्मियों ने इस मामले को सुलझाने का दावा किया है. इन लोगों ने दस आरोपियों को गिरफ्तार किया है.यह गिरोह ज़हरीले सांपों को पकड़ कर उन्हें तकलीफ देकर, उनका जहर निकाल लेता था. इस ज़हर को काले बाज़ार में देश-विदेश में भारी रकम में बेच दिया जाता था.

इस काम लगे पांच लोगों ने तो बाकायदा सर्प मित्र का विज़िटिंग कार्ड तक छपवा रखा था. इसे देखकर लोग इन्हें सांप दिखने की सूरत में सूचित करते थे और इन लोगों को आसानी से सांप सुलभ हो जाते थे. इतना ही नहीं किसी को इन पर कोई शक भी नहीं होता था. वन विभाग को इस गिरोह की भनक लगी तो उसने गिरोह को भंडाफोड़ करने के लिए एक मज़बूत जाल बिछाया और दस लोगों को गिरफ्तार करने में सफलता पाई.

गिरोह के पास से 8 मिली ग्राम ज़हर मिला है. अधिकारियों ने इनके पास से 8 कोबरा सांपों को भी छुड़ाया है. नागपुर बाजार में गुरुवार 13 सितंबर को पकड़े गए ज़हर का मूल्य सात से आठ लाख आंका जा रहा है. कुछ सर्प विशेषज्ञों का कहना है की इस ज़हर का प्रयोग नशे के लिए भी किया जाता है. सामूहिक रेव पार्टी जैसी जगहों पर उन्माद के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है.

------------------------
।। सांपों की तस्करी के अड्डे बने नागपुर और वर्धा ।।

महराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के अमरावती जिले की चार बरस पहले की घटना। एक प्रसिद्ध सर्पमित्र के घर वनविभाग ने जब दबिश दी तो करीब 7 सौ प्रजातियों का पता चला। इनमें सांप, नेवले और छिपकलियां भी थीं। इन सब का वह क्या वह करना चाहता था, यह आज भी राज ही है। वह मुकदमा आज भी चल रहा है।

ठाणे में हाल ही में एक सर्पमित्र के यहां से 50 लाख के विष की बरामदगी के साथ उसको गिरफृतार किया गया। ऐसी ही कार्रवाई पिछले महीनों मुंबई, कोल्हापुर और नागपुर में भी की गई। अमरावती में छत्री तालाब के पास एक सर्पमित्र की पान की टपरी है। इसके काउंटर पर सांप रखे गए हैं। लोग कौतूहलवश आते हैं और उसकी ग्राहकी भी बढती है। 15 साल पहले जिले में मात्र 4 सर्पमित्र थे। आज उनकी संख्या बढकर सात हजार के उपर पहुंच गई है। वन विभाग के पास केवल 40 सर्पमित्र ही पंजीबंद्ध हैं। राज्य के सभी जिलों में कमोबेश ऐसी ही स्थिति है, लेकिन पूरे राज्य में नागपुर और वर्धा ये दोनों जिले सांपों की तस्करी के बडे अड्डे बन गए हैं।

।। विष के नाम पर अलग ही बाजार ।।
सांपों का विष बताकर अलग ही कुछ बेचने का गोरखधंधा जारी है। नशे के लिए, औषधि के लिए अंधश्रद्धा के चलते यह विष लिया जाता है। सांपों का विष निकालने के बाद उसे एक खास पद्धति से ड्राय करना पडता है। इसके लिए 30 से 40 लाख रुपए की मशीन लगती है। राज्य में किसी तो भी सर्पमित्र के पास यह मशीन होगी? इस कारण विष के नाम पर कुछ तो भी गोरखधंधा चलने की बात गले उतरती है।

।। सांपों के अंग और व्यापार— जिंदा सांप की कीमत 5 हजार से लेकर एक लाख रुपए ।।
अजगर की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में 10हजार डॉलर यानी 5 लाख रुपए के करीब है। रेड सेंड बोआ यानी दोमुंह प्रजाति का सांप 30 से 50 लाख तक बिकता है। दक्षिण—पूर्व एशिया में इस सांप की बहुत मांग है। केंसर के इलाज के लिए भी उसका इस्तेमाल किया जाता है। कुछ लोग सांपों को खाते भी हैं। खासतौर पर दक्षिण एशियाई देशों की अधिकांश होटल्स में सांपों के मांस से बनाए गए पदार्थों के व्यंजन बडे चाव से खाए जाते हैं। कुछ लोग शौकिया तौर पर सांप पालते हैं। अपने इस शौक की खातिर वे अलग—अलग प्रजातियों के सांपों की खोज में रहते हैं।

।। सांप की खाल की कीमत एक लाख रुपए ।।
सांप की खाल से बने कोट, हेंडबेग, पर्स, जूते आदि वस्तुओं की अमेरिका, यूरोप केनेडा, और चीन के मार्केट में जबरदस्त मांग है। अजगर, धामण, घुघ्घुस और कोबरा आदि की खाल विशेष तौर पर पसंद की जाती है। विश्व प्रसिद्ध डिजाइनर्स द्वारा निर्मित अजगर की खाल के बेग सेलिब्रिटी की शान समझी जाती है। इसके अलावा अजगर की खाल के जॅकेट, बेल्ट और स्कर्टस का फैशन जोरों पर है और इसके लिए लगने वाले लाखों अजगरों और सांपों की आपूर्ति भारत, श्रीलंका, इंडोनेशिया, थायलेंड, न्यूजीलेंड और फिलीपींस से होती है। अकेले यूरोप में ही साल भर में लाख से ज्यादा अजगरों की खाल आयात की जाती है।

सांपों के विष की कीमत प्रति ग्राम 75 हजार से लेकर एक लाख रूपए
सांपों के अवयवों में उसका विष सर्वाधिक मूल्यवान होता है। विभिन्न प्रकार की औषधियों में उसका इस्तेमाल किया जाता है। केंसर, एचआयवी यानी एड्स और मधुमेह जैसी बीमारियों की रोकथाम के लिए ये दवाएं उपयोगी साबित होती हैं। सांपों के विष का एक विशेष प्रकार का घटक केंसर का मूल माने वाले ट्यूमर को रोक सकता है, ऐसी विशेषज्ञों की राय है। इस कारण दुनिया भर की प्रयोगशालाओं में सांपों की विभिन्न प्रजातियों के विष पर बडी तादाद में प्रयोग शुरु हैं। खास तौर पर चीन में अनेक पारंपरिक औषधियों में विष का इस्तेमाल होता है। इसके लिए उन्हें विष की जरुरत पडती है। मादक पदार्थों की तस्करी करने वाले माफिया भी सांपों की भारी तस्करी करते हैं। केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार में ही नहीं तो देश में मादक पदार्थों के निर्माण में सर्प के विष का धडल्ले से इस्तेमाल होता है।

।। निष्ठुरता के साथ मारे जाते हैं सांप ।।
सांपों का विष निकालते समय उन पर बडी निर्दयता से अत्याचार किए जाते हैं। उनके दांत गंभीर रुप से जख्मी होने से कई बार वे मौत के मुंह में समां जाते हैं। विष ग्रंथि सांपों को मिली एक बडी देन है। सांपों का विष एक प्रकार से लाल होता है। सांपों का शिकार करने के लिए या आत्मरक्षा करने के लिए उसका इस्तेमाल किया जाता है। उसी प्रकार उसकी खाल निकालने का तरीका भी बहुत ही निष्ठुर है। सबसे पहले जिंदा सांप को झाड से लटकाकर ताना जाता है और कीलें ठोकी जाती हैं। एक बाजू से चीरा लगाकर खाल को साइड किया जाता है। उसे नमक लगाकर सुखाया जाता है। कई बार इसके लिए रसायन का इस्तेमाल भी किया जाता है। इस प्रकार से चमडी तैयार की जाती है। खाल निकालने के बाद वह सांप दो से तीन दिन जिंदा रहता है। इस कारण उसे भारी पीडा होती है।

।। सांप पालने की भी अनुमति लेना होती है ।।
किसी भी वन प्राणी के प्रदर्शन करने के लिए केंद्रीय प्राणि संग्रहालय प्राधिकरण, भारत सरकार की पूर्व अनुमति लेना आवश्यक है। सीझेडए के नियम बहुत सख्त हैं, इसके लिए उनकी खानापूर्ति के बाद ही अनुमति मिल सकती है। सांप केवल प्राणि संग्रहालय में ही प्रदर्शित किए जाते हैं।

।। सर्पमित्रों के अधिकार ।।
खेती और वन भूमि ये सांपों के नैसर्गिक आश्रय स्थल हैं किंतु शहरीकरण बढने से, कृषि भूमि का आबादी में बदलने के कारण उनका आश्रयस्थल खतरे में है। बढती बस्तियों के कारण सांप ज्यादा संख्या में दिखने लगे और इसके साथ ही सर्पमित्रों का उदय हुआ। 10 से 15 साल पहले सर्पमित्रों का सिलसिला शुरु हुआ, तब गिने—चुने ही सर्प मित्र थे। कालांतर में उनकी संख्या बढ गई। शहरी और ग्रामीण भाग के अनेक सर्पमित्र अपनी जान की परवाह न करते हुए सांपों की जान बचाने बचाकर उन्हें जंगल में छोडने का महती कार्य कर रहे हैं।

राज्य में साधारणत: एक से डेढ लाख सर्पमित्र हैं। उनके पास कितने कोबरा हैं, कितने अजगर हैं, इस पर से उनका वजन तय होता है। ऐसे शौकिया सर्पमित्रों की संख्या देखने पर साधारणत: हरेक के बंद दरवाजों में एक समय करीब दस सांप मिलेंगे। अर्थात राज्य भर में इन सर्पमित्रों के घरों में सामन्यत: दस लाख सांप होने का अंदाज है। इन सांपों का आगे का क्योता है, यह भी एक रहस्य है। पकडे गए सांपों को तुरंत जंगल में छोडना होता है।

कई सर्पमित्र ऐसा करते भी हैं, लेकिन सर्पों का संग्रह करने वाले सर्पमित्रों की संख्या भी कम नहीं है। इस पर वनविभाग का कोई नियंत्रण नहीं है। सांपों के संदर्भ में बढते खतरे को ध्यान में रखकर सर्पमित्रों को पहचान पत्र देने का नया प्रस्ताव सामने आया है। एक वार्ड में दो सर्पमित्र होना चाहिए और वे भी प्रशिक्षित होना चाहिए, यह सूचना इस नए प्रस्ताव में दी गई है।

गुरुवार, 15 अगस्त 2013

सर्पमित्र रविशंकर डोंगरे : मौत का डर भी उसे नहीं डराता था

  • सांपों को बचाने की मुहिम में जुटे छिंदवाड़ा के  उमरानाला निवासी रविशंकर
  • कोबरा के काटने से 15 अगस्त, 2013 को हो गई आकस्मिक मौत
  • फेसबुक वॉल पर किया था सांपों के प्रति अपने प्रेम का खुलासा
RAVISHANKAR DONGRE KE FACEBOOK WALL SE....
जो स्नेकस फ्रेंड्स है। अभी तक शायद सिर्फ कुछ 100 लोग ही मरे होंगे। पर बाइक या कार के एक्सीडेंट से हर साल लाखों लोग मरते हैं। तो वो गाड़ी चलाना बंद क्यों नहीं कर देते। और शराब, गुटका और अन्य चीजों से भी लाखों लोग मरते हैं। तो लोग हमें क्यूं ताने मारते हैं कि तू भी स्नेकस बाइट (सांप के काटने) से मरेगा--- - सर्पमित्र रविशंकर डोंगरे






21 JULY, 2013
____________

hello friends,
aap se ak mera sawal hai, jo log snakes friends banana chahte hai. to log unhe rokte hai, ki jo snakes pakadta hai. us ki muot us se hi hoti hai. unke gar wale or sab unhe datte hai. par wahi log us ko bike ya kar lakar dete hai.

to ab me un logo ko kahana chata hu--- ki jo snakes friends hai abhi tak shayd sirf kuch 100 logo hi mare hoge. par bike ya kar ke aekshident se har sal lakho log marte hai. to wo ye sab chanala band kyo nahi kar dete hai. or sarab .gutkha or adar chijo se bhi har sal lakho log marte hai. to log hame kyo tane marte hai. ki tu bhi snakes bait se marega ...........

COMMENT---
ok sir india me har sal snakes bite se 30 hajar log marte hai or iekshident se 10 lakh log . tv se 2.50 lakh log cenchar se 4 lakh log .......or adar bimariyo se 5 lakh log to fir bhi snakes bite se kam log hi marte hai or usme se bhi 60% log chhar phuk se let haspital me lejanese or 30% log haspital me anti venoem nahi hone se ye jo data hai is me kuch kam ya jayada ho sakta hai par ye sach hai.................or snakes friends pichle 10 shalo me sirf 30 hi snakes bite se jan gai hai us mese bhi 15 ne vain pi the............. ---ravishankar dongre,
____________
friends aap ko pata hai. jaha bhi ham sankes pakadne jate hai, to waha ke logo ka pahala sawal ye hota hai.

ki snakes tum ko katta kyo nahi. tumhare pass jaudu hai. ya mantr hai ya tum snakes ko bandh dete ho.
to aap ko ham bata de. ki a hamre pass koi jadu hota hai. nahi hame koi mantr ata hai. sab andhawisvas hai. ham bhi aap jese hai. alag kuch bhi nahi hai. hamme or log muche bhi sab kahte hai, ki snakes tumhe katta kyo nahi, to aap chahte ho ki wo hame katte .........
______________


Snake Awareness Program batkakhapa chhindwara 2000 pupils watching .program by sir. rajkumar viswkarma and rescue squad m. ravisahnkar dongre .vilash dongre.dipak and nikhil raut..

बुधवार, 14 अगस्त 2013

14 अगस्त, 1947 : छिंदवाड़ा में आजादी की वो रात

छिंदवाड़ा में देश की आजादी का पर्व 14 अगस्त, 1947 को रात्रि 12 बजे से शुरू हुआ था। नगर के बीचों बीच स्थित मोती बाजार (छोटी बाजार) से महिलाओं का एक विशाल जूलूस श्रीमती दुर्गा बाई मांजरेकर के नेतृत्व में निकला था। जिसमें एक विशाल तिरंगा ध्वज लहराते हुए लोगों का अभिनंदन किया जा रहा था।

यह कोई आयोजित जुलूस नहीं था। बल्कि जनता जनार्दन और वो भी महिलाओं के द्वारा आजादी के ऐतिहासिक पल को अपनी भावनाओं से भर कर जनता को एहसास कराने के लिए निकाला गया था। तब शहर भी बहुत छोटा सा था।

छोटी बाजार से बुधवारी बाजार और वहां से वापस हुआ था जूलूस। क्या नजारा रहा होगा! हर घर में तिरंगा लहरा रहा था। और उस रात को जो शहर जागा तो दूसरे दिन 15 अगस्त को हर स्कूल सरकारी कार्यालय में तिरंगा फहराया गया था।

साभार- वरिष्ठ पत्रकार गुणेंद्र दुबे जी के फेसबुक वॉल से, 14 अगस्त, 2013

सोमवार, 12 अगस्त 2013

सांपों को बचाने की मुहिम में जुटे छिंदवाड़ा के युवा

टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के मुताबिक छिंदवाड़ा जिले के चार युवकों ने सांपों को बचाने का बीड़ा उठाया है। इसके साथ ही ये सभी सांपों के संबंध में लोगों को शिक्षित करने का भी कार्य कर रहे हैं। उमरानाला निवासी रविशंकर डोंगरे की टीम में सुनील गौतम, दीपक, निखिल राऊत और विलास डोंगरे शामिल है। रवि मोबाइल शॉप चलाते हैं। वहीं विलास एक ऑटोमोबाइल कंपनी से जुड़े हुए है। इसके अलावा दीपक की कपड़े की दुकान है। निखिल अभी पढ़ाई कर रहे है।

इन साहसी युवाओं को वन विभाग का भी भरपूर सहयोग मिल रहा है।

पढ़िए अमरजीत सिंह की पूरी रिपोर्ट...

Band of youths on a mission to save serpents

Amarjeet Singh, TNN | Aug 12, 2013

BHOPAL: They are no wildlife experts nor do they have an expertise in magical language of snakes-parseltongue-like spoken by Harry Potter, but handling snakes, including venomous is no big deal for them.

Owing to their concern for snakes-a group of four youths in Chhindwara district joined hands to rescue snakes and educate residents on their utility. They claim to have rescued more than 1,000 snakes and released them in jungles.

The group comprises Ravi Shankar Dongre, 31, Sunil Gautam, 30, and Deepak Khudrejia, Vilas Dongre, 29.

Recently, another youngster Nikhil Raut, joined the group.

"I have been rescuing snakes for as long as a decade. What began with curiosity later turned into a passion. But for the last one year we are working as professional team and we reach spot wherever any snake is seen," said Ravi, who owns a mobile shop for earning.

All of them have nothing in common as far as their backgrounds go. It is their concern to save serpents which has brought them together.

Vilas works with an automobile company, Sunil is currently seeking job, Deepak also owns a garment shop and Nikhil is a student.

The modus operandi for catching a snake varies from one snake to another. Most of the time we don't need even the stick which is provided to us by the forest department.

"In case I am out of town and get an urgent call to catch snake how can I get a stick there," said Vilas, another member.

I have been catching snakes for nearly two years now-a friend of mine died of snake bite and I was upset for some days. But one day it all changed when I saw a snake eating a mouse in the field and even passing over my leg without harming me, Vilas explained.

"It made me think that these slithery reptiles attack in self-defence," Vilas said.

It is due to their efforts that the forest department has included these men and made a team compromising forest personnel dedicated to the rescue of the animal.

Chhindwara range officer S L Pathekar said, "From January 1 till July 30, 197 snakes were rescued and released in forest areas with their. It was in December last year that we came to know about youths and thereafter a rescue squad was constituted."

Earlier, we used a snake charmer to catch these snakes but there were several complaints. He used to charge arbitrarily from scared people, Pathekar added.

"But these young men catch snakes for free and also educate people on misconceptions. They voluntarily go to schools to educate children," he added.