शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

सती प्रथा : समाज ने स्त्रियों पर जबरन थोपी कुप्रथा

जब इब्नबतूता मप्र के धार में बेहोश हुआ----

फ़िल्म पद्मावती के लिए मच रहे बवाल से मुझे याद आया। मैंने कॉलेज लाइफ में  एक लाइब्रेरी से निकाली किताब में अफ्रीकी मोररको यात्री इब्नबतूता के बारे में पढ़ा था ।कुछ रोचक या दिमाग को झकझोरने वाली बातें दिमाग मे रह जाती है उस इतिहास लेखक ने विदेशी यात्रियों से सम्बंधित इस क़िताब में लिखा था कि इब्नबतूताने भारत यात्रा के दौरान अपनी किताब में सती प्रथा का वर्णन किया है।उसने राजस्थान की यात्रा के समय साथ ही  मध्यप्रदेश के कुछ जिलों जिसमे धार छतरपुर जिलों की यात्रा का वर्णन  किया है।

    अपनी युवावस्था के आरंभिक काल मे इब्नबतूता ने मध्यप्रदेश के धार जिले में जब सती प्रथा को पहली बार अपनी आंखों के सामने देखा कि किस तरह वो महिला जो  सती  होने वाली है वह एक हाथ मे नारियल और एक हाथ में दर्पण पकड़कर  घोड़े पर सवार होकर सती स्थल की ओर बढ़ रही है चारों तरफ ढोल नगाड़ों का बहुत ज्यादा शोर है  वो पूर्ण श्रृंगार में एक हाथ मे थामे दर्पण में अपने रूप को देखते हुए आगे बढ़ रही है सती स्थल के चारों के ओर दस बारह लोग जलती हुई पतली लकड़ी थामे खड़े है उसे आग में झोंकने से पहले उसके शरीर पर कम्बल जैसा मोटा कपड़ा ओढ़ाया गया है।

इब्नबतूता ने वर्णन किया है उस समय वो स्त्री चीखे तो भी उसकी आवाज़ ढोल नगाड़ों शहनाई की आवाज़ में दब जाती है ।

इब्नबतूता ने जब यह दृश्य देखा तो इतना घबरा गया था कि बेहोश होकर गिर पड़ा। उसके मित्र ने उसके चेहरे पर पानी डालकर उसे उठाया था।

इब्नबतूता ने उस वक्त सतीप्रथा के द्वारा यहां के क्रूर  कठोर मानसिकता की आलोचना की है।

मित्रो थोड़ा इस बात पर गौर कीजिए यहां के मुग़ल बादशाह इतने ताकतवर रहे है फिर उन्होंने इस कुप्रथा को रोकने के लिए कदम क्यों नहीं उठाए सदियों ये प्रथा यहां कायम रही आश्चर्य है!

इसके पीछे ये तर्क मिलता है एक औरत किसी की कुदृष्टि का शिकार न होने पाए इसलिए सतीप्रथा की शुरुआत हुई है।

यहां पर ये तर्क सामने आए कि औरत खुद जाकर सती हो गयी और इस सती होने की क्रिया में उसने व्यवस्था भी ख़ुद की है तो ये मान लिया जाए वो अपने पति से बहुत प्रेम करती थी इसलिए उसने ऐसा किया ये उसकी अपनी मानसिकता है।

लेकिन इस सती प्रक्रिया की तैयारी उस काल में पुरुष वर्ग कर रहा है तो निंदनीय है

क्या उस समय वो इतना कमजोर था कि एक औरत की रक्षा नहीं कर सकता था?

उसके पास एक औरत पर अत्याचार करने के लिए भीड़ जुटाने के लिए ताकत है वहाँ वो कमज़ोर नहीं है आश्चर्य?
यहां मैं तारीफ करूँगी कट्टर कहे जाने वाले मुग़ल बादशाह औरंगजेब की जिसने पहली बार ये कदम उठाया कि सती प्रथा बन्द हो। अगर उस समय मीडिया सशक्त होता तो इस दिशा मे औरंगजेब कामयाब हो जाता ये निश्चित था लेकिन मुग़ल बादशाहों में वो अकेला बादशाह है,
जिसने ये कदम उठाया बहुत बाद  में  राजा राममोहन राय  ने इस दिशा में जो सराहनीय कार्य किया वो प्रशंसनीय है।

अब आगामी फिल्म पद्मावती में संजय लीला भंसाली जी क्या कहने जा रहे है किस उद्देश्य को लेकर उन्होंने फ़िल्म बनाई है ये उसे देखने के बाद ही पता चलेगा।सुनी सुनाई बाते जो आधी झूठ होती है उस पर पहले से कैसे अपनी प्रतिक्रिया दे दे?

साभार फेसबुक : https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1183941068404847&id=100003668967648

गीतांजलि गीत 18-11-2017


रविवार, 12 नवंबर 2017

आकाशवाणी छिंदवाड़ा : एनाउंसर गीतांजलि गीत के संस्मरण

फैन तो फैन होते है चाहे वो पुराने हो या नए। रामकृष्णा जी एक श्रोता के रूप में आप उत्कृष्ट श्रोता रहे है। आपके पोस्टकार्ड की लिखावट आज भी मुझे याद है। ओपी जी भी पत्र लिखते थे और उनसे फोन इन कार्यक्रम में भी मेरी बातचीत हुई है। मेरे लिए ये सुखद है कि आज मीडिया के क्षेत्र में आप दोनों सफल है। ओपी जी को तो मैंने उनकी आवाज़ को और तराशने की सलाह दी है क्योंकि कुदरत ने उन्हें भी अच्छी आवाज़ दी है। आप दोनों को असीम शुभकामनाएं।
कवयित्री गीतांजलि गीत जी के साथ ओपी पवार
रामकृष्णा जी,

आपकी बात से मुझे और किस्से याद आ गए, जिसमें से दो किस्से मैं साझा करूँगी। पहला किस्सा लगभग 10 साल पुराना है। आपके एरिया  में किसान वाणी कंपेयर नरेन्द्र शक्रवार जी रिकॉर्डिंग के लिए गए थे। उन्हें लौटते समय बस में एक नेत्रहीन व्यक्ति उमरानाला के पास मिला। वे यात्रियों को गाने सुनाकर भीख मांगकर अपना जीवन यापन किया करते थे। वो रेडियो सुना करते थे। तब उसने नरेंद्र भाई से मेरे बारे में पूछताछ शुरू कर दी और ये बताया कि वो मेरा बहुत ज़्यादा फेन है।

नरेंद्र भाई मुझे किस्सा सुनाते हुए बोलते है  अच्छा हुआ बहना उन्हें मैंने आपके घर का पता नहीं बताया। नहीें तो वे लाठी टेकते हुए आपके घर पहुंच जाते। आपके घर वाले परेशान हो जाते।

एक और किस्सा है जिसे शासकीय शिक्षा विभाग की प्राइमरी स्कूल की प्रधान पाठिका श्रीमती रजनी साहू ने मुझसे शेयर किया। वो अपने किसी परिचिता से मिलने हॉस्पिटल गयी थी। उनकी परिचिता ने एक शिशु को बेटे के रूप में जन्म दिया था। वही सामने एक बेटी को जन्म देने वाली मां का भी पलँग था। उस बेटी के पापा उस बच्ची को गोद मे खिला रहे थे और उसे गीतांजलि  नाम से संबोधित कर रहे थे। तब आवाज़ सुनकर रजनी जी ने कहा अरे वाह आपने इसका नामकरण भी कर दिया तब उन्होंने कहा मैंने इसका पूरा नाम गीतांजलि गीत रखा है। और मैं रेडियो पर बोलने वाली गीतांजलि गीत जी का बहुत बड़ा फैन हूँ। इसलिए इसका नाम भी  यही रखा है।

रजनी जी ने पूछा- क्या आप कभी उनसे मिले हो। उन्होंने कहा-नही मैं उनसे कभी नही मिला हूँ। जब रजनी जी ने मुझसे मिलकर ये किस्सा सुनाया, तब खुद की अहमियत समझ आई  और यही कारण है कि अनजान चेहरों के प्यार स्नेह ने ही मेरी स्क्रिप्ट लेखन को आत्मीयता का रंग दिया।

आप लोग तो प्रत्यक्ष रूप से लिखकर अपनी भावनाएं प्रकट कर लेते थे लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से जिन श्रोताओ का स्नेह साथ रहा और साथ है वो भी यादगर पल है जो सदा साथ रहेंगे।

फैन तो फैन होते है चाहे वो पुराने हो या नए। रामकृष्णा जी एक श्रोता के रूप में आप उत्कृष्ट श्रोता रहे है। आपके पोस्टकार्ड की लिखावट आज भी मुझे याद है। ओपी जी भी पत्र लिखते थे और उनसे फोन इन कार्यक्रम में भी मेरी बातचीत हुई है। मेरे लिए ये सुखद है कि आज मीडिया के क्षेत्र में आप दोनों सफल है। ओपी जी को तो मैंने उनकी आवाज़ को और तराशने की सलाह दी है क्योंकि कुदरत ने उन्हें भी अच्छी आवाज़ दी है। आप दोनों को असीम शुभकामनाएं।


ओपी पवार की फेसबुक पोस्ट 
उस दौर में जब मल्टीमीडिया जैसे साधन नहीं थे... तब रेडियो की आवाज ही मनोरंजन और सूचना का माध्यम हुआ करती थी.... और उसमें भी ऐसी मधुर आवाजें जिनका रोज इंतज़ार रहता था... ऐसी ही एक फ़नकार Geetanjali Geet मैम... आकाशवाणी केंद्र #छिंदवाड़ा से आज भी आपकी आवाज किसी पहचान की मोहताज नहीं है....बचपन में रेडियो कार्यक्रमों के लिए मैं चिट्ठियां लिखा करता था... कई बार तो कौन पढ़ेगा ये भी लिखकर भेजता था ... जिसमें #गीतांजलि #मैम का नाम पहले होता था... इस बार घर आया तो संयोगवश हुई ये मुलाकात हमेशा यादगार रहेगी... आपके अनुभव का पिटारा काफी बड़ा है... मार्गदर्शन और स्नेह हमेशा मिलता रहे.

नोट- 11 नवंबर 2017 को भाई ओमप्रकाश पवार के फेसबुक पोस्ट और उस कमेंट पर आधारित लेख। गीतांजलि गीत जी जानी मानी कवयित्री भी है। लेकिन उनकी पहचान आकाशवाणी छिंदवाड़ा की मशहूर एनाउंसर यानी आरजे से सबसे ज्यादा है। उनकी आवाज के जादू को शब्दों में बयां कर पाना मुमकिन नहीं है।  

बुधवार, 8 नवंबर 2017

श्रद्धांजलि : बिना बहीखाता पढ़ाते थे स्वर्गीय डीएस बोरीकर सर

राष्ट्रीय विज्ञान प्रदर्शनी 2003 में सम्मान समारोह के दौरान दाएं से दूसरे स्थान पर स्वर्गीय बोरीकर सर। साथ में वाडिया सर, गंगवार मेडम, दिनेश डिगरसे और पंकज चौधरी । 

स्वर्गीय श्री डीएस बोरीकर सेनि शिक्षक (दाएं से दूसरे स्थान पर) शाउमा वि उमरानाला में बतौर वाणिज्य के व्याख्याता व प्रभारी प्राचार्य रहे। गांव की तीन पीढ़ियों ने उनसे शिक्षा प्राप्त की।

मेरे परिवार में मेरे पिता, भाई व मातृकुल से मामा-मौसी ने भी उनसे पढ़ा। श्री बोरीकर सर को विद्यालय में अनुशासन के प्रतीक रूप में जाना जाता रहा है। बिना किताब अकाउंटस, बहीखाता पढ़ाने वाले बोरीकर सर जिन्हें पूरी किताब रटी थी वे इसी विद्यालय मे पढ़े और यहीं से सेवानिवृत्त हुए।

उमरानाला से उनका खास लगाव था। वर्ष 2003 में जब  मैंने राष्ट्रीय विज्ञान प्रदर्शनी में प्रतिभागिता की तब उस हेतु आयोजित सम्मान समारोह में श्री बोरीकर सर भी उपस्थित थे, यह मेरे लिए गौरवान्वित होने का क्षण रहा है।

आज वह वाणिज्य का महारथी अपनी भू-लोक की यात्रा को विराम दे, एक नई यात्रा पर चल पड़ा है। उनका इस संसार से विदा होना शिक्षा जगत में भारी क्षति है।

बताते हुए गर्व महसूस होता है कि सर सेवानिवृत्त होकर भी शिक्षा का ज्ञान प्रसारित करने में पीछे ना रहें वे निरंतर पढ़ाते रहे, गांगीवाड़ा के एक विद्यालय में वे बतौर मेहमान शिक्षक के तौर पर एवं घर में भी पढ़ाते रहे।

मेरे गांव के वरिष्ठ नागरिक और बोरीकर सर के मित्र दादा रामाजी खापरे (69) ने सर के दिव्यलोक प्रस्थान पर गहरे दु:खद शब्दों में कहा "मेरा एक अच्छा दोस्त भी आज चला गया, स्कूल के समय से आज यह समय कैसे आ गया पता ही ना चला। "

(इन शब्दों के साथ स्वर्गीय बोरीकर सर को श्रद्धांजलि अर्पित की है, उनके छात्र और शिक्षक पंकज चौधरी ने)

रविवार, 5 नवंबर 2017

मेडिकल प्रोफेशन में लूट तंत्र : मौत के सौदागर क्यों बन गए डॉक्टर

गौरव अरोरा

गौरव ने आज ये सोचा.......

# मेडिकल प्रोफेशन में लूट तंत्र #

कल फिर एक मरीज की अनावश्यक सर्जरी, हॉस्पिटल में लूट और मृत्यु पश्चात भी आर्थिक लाभ के लिए वेंटीलेटर पर रख बिल बढ़ाने के खेल की खबर मिली।

सवाल ये के क्यों जिंदगी के रखवाले डॉक्टर अब मौत के सौदागर बनते जा रहे है।

तो गौरव बीरबल अरोरा से जवाब भी लो-

वास्तव में आज के समय में जिस तरह हर प्रोफेशन में बेईमानी मक्कारी झूठ फरेब ठगी का बोलबाला है ....... ठीक उसी तरह मेडिकल प्रोफेशन में भी यह लूटपाट, फरेब और गलत चीज अंदर तक घुस चुकी है जो क्षुब्ध और निराश करती है  ।

जिस तरह हमारे आस पास बहुत कम ही लोग समाज में ईमानदार बचे हैं, ठीक उसी तरह बहुत कम लोग मेडिकल प्रोफेशन में भी ईमानदार बचे हैं ।

मेडिकल प्रोफेशन में मरीज एवं उसके परिजन अर्थात "ग्राहक" कि अज्ञानता का लाभ ग्रुप या सिंडिकेट बनाकर बेईमान डॉक्टर, पैथोलॉजी लैब और दवा कंपनियां उठाती हैं, इनकी सामूहिक लूट को बल मिलता है जान और बीमारी का डर बताकर..... उसके बाद भय एवं डर से अनवरत लूट-खसोट चलती है ।

मेडिकल प्रोफेशन भी हमारे समाज का ही एक हिस्सा है। डॉक्टर्स आकाश से नहीं टपकते बल्कि हमारे और आपके घरों के बच्चे ही डॉक्टर बनते हैं ।

हम व्यापार में बेईमानी करते हैं, टैक्स चोरी करते है,  सरकारी अधिकारी एवं कर्मचारी अपने कर्तव्यों में लापरवाही एवं रिश्वतखोरी करते हैं, प्राइवेट कंपनियों के कर्मचारी टीए-डीए आदि में बेईमानी करते हैं, जिसको जब मौका मिलता है तब वो हेराफेरी-छल-चोरी करता है। नियम तोड़ना शान मानी जाती है, नियमपालन मूर्ख व दब्बूपन का घोतक है।

ईमानदारी अन्ना हज़ारे का शग़ल है। देशप्रेम फैशन है जो सिर्फ नारे लगाने और 15 अगस्त-26 जनवरी की कहानी है। यह बेईमानी, पाखंड, छल, द्वैत व्यवहार हमारे बच्चे देखते हैं और जब यही बच्चे मेडिकल प्रोफेशन में जाते हैं तो यह बेईमानी के संस्कार मेडिकल प्रोफेशन में भी पुष्पित-पल्लवित होते हैं। इसलिए नेता भी भ्रष्ट हैं, डॉक्टर भी और अधिकारी कर्मचारी व्यापारी भी।

हम ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठता, नैतिकता, दया, करुणा आदि दूसरों में देखना चाहते है, लेकिन हम स्वयं अपनी सुविधा चाहते है, नियमो को तोड़-मरोड़ कर अपने हिसाब से चलाना चाहते है।

हम खुद नियम पालन करें, अपने बच्चों को नैतिकता न सिर्फ सिखाएं बल्कि अपने व्यवहार और आचरण से उन्हें उदाहरण भी प्रस्तुत करे, छोटी-छोटी चीजो से शुरू करे जैसे हेलमेट पहनना, सीट बेल्ट लगाना, ट्रैफिक सिग्नल्स को फॉलो करना, सही पार्किंग में सलीके से गाड़ी खड़ी करना, दैनिक जीवन मे झूट न बोलना, मोबाइल पर बहुत व्यापक रूप से बोले जाने वाले झूठ को त्यागना (जैसे घर पर होकर बोलना के अभी बाहर हैं आदि)
लेकिन ये याद रहे कि ये पेड़ लगाने जैसा है-आज का सत्य नैतिक आचरण आज ही फल नही देगा बल्कि इसमे सालों लगेंगे। धैर्य चाहिए इसमे।

बस यही कहानी है......

साभार - गौरव अरोरा के फेसबुक वॉल से

©® लेखक गौरव अरोरा छिंदवाड़ा शहर के जाने माने बिजनेसमैन है। आप सामाजिक गतिविधियां में भी सक्रिय रहते हैं।


शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

विपक्ष की महिमा

आप कहेंगे ये कैसा शीर्षक हुआ 'विपक्ष की महिमा' भला विपक्ष का भी कोई महत्त्व होता है, हम बात तो करते है परफ़ेक्ट वर्ल्ड की पर पक्ष-विपक्ष के संतुलन को नकार देते है विपक्ष की अपनी महिमा होती है, विपक्षी को कहीं अधिक मेहनत करनी होती हैं, मोदी जी 18 घंटे काम करते है,पर राहुल बाबा 19 घंटे अपने "विपक्षी पात्र" में बने रहने की कोशिश करते हैं राहुल बाबा की यह मेहनत नकार दी गई है।

मोदी जी के 15 लाख के कोट को बोली लगा के कोई खरीद ले गया, वही राहुल बाबा के फटे कुर्ते को कोई महत्त्व ही नहीं दिया गया। भला ये भी कोई बात हुई,
विपक्षियों की यह मेहनत हमेशा से ही उपेक्षित रही हैं।
सदन का जो हास्य है वो सिर्फ विपक्ष से है, बिना विपक्ष केवल बिजली पानी और विकास के प्रस्ताव जैसे बोरिंग विषयों पर ही बात की जाती और लोकसभा और विधानसभा सदस्यों की अटेंडेंस भी इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रों सी हो जाती।

जरा कल्पना कीजिये रामायण में यदि रावण नहीं होता तो क्या इतना रस आता, सोने की लंका पुष्पक विमान, अशोक वाटिका सारे रुचिकर द्रव्य रावण के पास थे।
भला रावण होना भी कोई आसान काम था, दस सिरों का बोझ, सोने की लंका का मेंटनेस, कुंभकर्ण सा भाई जो 6-6 महीने सिर्फ खाता था इतना सब सहते हुए भी उसने उफ नहीं की।

रावण नहीं रहे, रहते तो कोई प्रतिष्ठित पब्लिशर उनकी आत्मकथा प्रकाशित करने को उतावला होता, और यक़ीन मानिये रामायण से अधिक प्रतियां बिक गई होती।
बहुत से रामराज्य की कामना करने वाले राजनीतिक दलों को कई दिनों का रोजगार मिल जाता, कोई रावण के खिलाफ मुकदमा दायर करता तो कोई ट्विटर पर ट्वीट वॉर प्रारंभ किए देता फेसबुक पर भी #isupoort_ravan और #ban_ravan ट्रेंड कर रहा होता, मीडिया को प्राइम टाइम TRP मिल जाती, कोई जनकल्याण की संकल्पित पार्टी उन्हें प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित किए देती।

खलनायकों ने हमेशा से ही परस्वार्थ किया है, नायकों के किरदार बहुत सरल होते है, खलनायकों को बहुत मेहनत करनी होती है, अपने प्रपंच बनाने में भयानक रूप धारण करना पड़ता है, कभी घनी दाढ़ी रखनी होती हैं तो कभी केशों के अनेक स्वांग धरने होते है। नायकों को तो एक प्रेयसी मिलती है, पर खलनायक को 18% GST on cosmetics होने के बावजूद बहुत सी प्रेयसियों को झेलना पड़ता है। खलनायक अपने परिवार को छोड़कर नायक के परिवार की फ़िक्र करता है,जाने कितनी फिल्मों में बिछड़े/बिखरे हुए परिवार को खलनायकों ने अपने अड्डे /ठिकाने में मिलवाया है।

नायक को "नायक" की उपाधि खलनायक के कारण मिलती है, खलनायको की पूरी जिंदगी इसी को मेंटेन करने में ज़ाया हुई जाती है।

इति समाप्तम...

डॉ.आशीष पाल "मुसाफ़िर"


गुरुवार, 5 अक्तूबर 2017

श्रद्धांजलि मोहनलाल पवार जी : किसी को भी मंजूर नहीं था उनका ऎसे अचानक चले जाना

स्व. श्री मोहनलाल पवार का पूरा घर ही वसुधैव कुटुम्बकम था -

पापा बहुत अच्छे इंसान थे अंकल। पापा के बिना अब हमारा जीवन अधूरा रहेगा। पापा आप हमें छोड़ कर जा रहे हैं। पापा आप अच्छे से रहना। प्रियंका और दीपिका बार बार अपने पापा को याद कर अपनी आखों में आंसू भरकर रो रही थी। मन में लग रहा था वे पिता  कितने दुर्भाग्य शाली होते होंगे जिनकी अंतिम विदाई पर कोई दो आंसू भी नहीं बहाते होंगे। क्योंकि आजकर बेटी तो विलुप्त प्रजाति में गिनी जाने लगी है। चित्तोड़ काम्प्लेक्स एम् पी नगर भोपाल से श्री मोहन लाल पवार जी को अंतिम विदाई देते समय सबके चेहरे बुझे और डरे सहमे से थे।

छोटे बड़े, महिला, पुरुष, घर, परिवार, रिश्तेदा, समाज, मोहल्ले, कार्यालय, विभाग के लोग बड़ी संख्या में  श्री  मोहन लाल पवार खरफूसेजी को अंतिम विदाई देने  एकत्रित थे। श्री मोहनलाल पवार जी लोक निर्माण विभाग के प्रमुख के निज सहायक थे। सदैव चेहरे पर मुस्कराहट और ख़ुशी के भाव उनके धार्मिक और आध्यात्मिक स्वभाव के साथ साथ ईश्वर में उनकी गहरी आस्था के द्योतक थे।

सुखवाड़ा को उन्होंने लोक निर्माण विभाग की मासिक पत्रिका बना दिया था। विभाग के साथी सुखवाड़ा के अंकों का इंतज़ार किया करते थे और पढ़ते भी थे। सदैव अंकों पर उनकी सटीक और सार्थक प्रतिक्रिया भी आया करती थी।

श्री पवार जी का पूरा जीवन ही शिक्षाप्रद था। उन्होंने अपने घर को शिक्षालय बनाकर रखा था। अपने परिचितों अपने रिश्तेदारों के बच्चों को अपने घर पर उच्च शिक्षा हेतु आश्रय देना और चार पांच साल तक उन्हें बिना किसी शिकवा शिकायत के उच्च शिक्षा प्राप्त करने तक और नौकरी लगने तक सहारा देना अपने आप में एक चुनौती होता है। श्री पवार के  चाहने वालों में समाज से ज्यादा गैर समाज के लोग ज्यादा थे। समाज के बहुत कम लोग श्री पवार की बहुमुखी प्रतिभा से परिचित थे। श्री पवार के घर पर हर शनिवार को सुन्दर कांड का संगीतमय पाठ हुआ करता था। वे एक अच्छे मंच संचालक थे। अच्छे पाठक थे और अच्छे समीक्षक भी थे। वे एक अच्छे गीतकार संगीतकार भी थे।

श्री पवार का अपने परिचितों में कितना सम्म्मान था यह इस बात से ही पता चलता है कि उनके  विभाग के एक सज्जन श्री श्रीवास्तव जी द्वारा स्वेच्छा से श्री पवारजी की छोटी बेटी के फलदान का पूरा व्यय वहन किया गया था। श्री पवारजी भी सिवनी के श्रीवास्तव जी को अपनी बेटी मानते थे और उसके विवाह अवसर पर उपस्थित रहकर उन्होंने पिता के दायित्व बोध का परिचय भी दिया था।

श्री पवार जी सदैव सामाजिक कार्यक्रमों में बढ़  चढ़ कर सहभागिता किया करते थे।  भोपाल में समाज के लिए सागोनी कलां रायसेन रोड में जो भूखंड लिया गया उसमें श्री पवार जी की अहम् भूमिका रही है। समाज के बहुत काम लोग इनकी इस भूमिका से परिचित है।

श्री पवार को अंतिम विदाई देते समय ऐसा लग रहा था जैसे कोई अपना सगा हमसे बिछुड़ रहा हो। यह मेरे प्रति उनके सम्मान भावना का ही प्रतिफल प्रतीत होता है। हम श्मशान तक तो श्री पवार जी के साथ थे पर आगे की यात्रा उनको ही तय करनी थी। भगवान् उनकी आगे की यात्रा को सफल व् शुभ बनाये। उनकी दिवंगत आत्मा को शांति व् मुक्ति प्रदान करे। परिजनों को इस आकस्मिक दुःख को सहन करने और इससे उबरने की शक्ति प्रदान करे।

कहते है अच्छे इंसान की ऊपर वाले को भी जरुरत पड़ती है,इसलिए ऊपर वाला अच्छे इंसान को समय पूर्व अपने पास बुला लेता है। शायद श्री पवारजी का इस तरह समय पूर्व चले जाना यही प्रमाणित करता है।

सादर नमन पवारजी।

मिथिलेश पवार ने दिया साहस का  परिचय, पिता की मृत्यु पर केवल श्रृद्धांजलि

भोपाल। श्री मिथिलेश पवार द्वारा अपने पिता श्री मोहनलाल पवार खरफूसे गोनी निवासी बिछुआ जिला छिंदवाड़ा के आकस्मिक निधन पर केवल श्रृद्धांजलि का आयोजन कर मृत्युभोज जैसी कुरीति को तोड़ने का साहस दिखाकर एक सार्थक और सटीक सन्देश समाज को देने का प्रयास किया गया है।

पिता की आकस्मिक मृत्यु के अथाह दुःख की स्थिति में भी श्री मिथिलेश द्वारा उठाया गया यह कदम अनुकरणीय है। उसे इस दुःख की  घडी में सम्बल प्रदान करने और सही निर्णय लेने में उसकी दोनों बहनें दीपिका और प्रियंका तथा  दोनों दामादों सुनील रावत और विजय घागरे का पूरा सहयोग और समर्थन  मिला। माता अनुसुइया द्वारा भी सहमति जताई गई।

स्व. श्री मोहनलाल खरफूसे (पवार जी)
उल्लेखनीय है कि स्व.  श्री मोहनलाल पवार जी कभी भी मृत्यु भोज के पक्ष में नहीं रहे। अपने परिजनों के  इस निर्णय और कदम से निश्चित ही उनकी आत्मा को शांति मिलेगी।

सुखवाड़ा, सतपुड़ा संस्कृति संस्थान संस्थान, भोपाल


मंगलवार, 7 फ़रवरी 2017

अरशद को सुनिए वीडियो एलबम "जिंदगी खूबसूरत है" में

मोहगांव हवेली के मूल निवासी अरशद अली इन दिनों मुंबई में कार्यरत है। वे पढ़ने लिखने में भी रुचि रखते हैं।
वीडियो एलबम "जिंदगी खूबसूरत है" में सुनिए छिंदवाड़ा जिले के युवा चेहरे अरशद अली को 

गौतमी ने किया कमाल, महज 18 साल में बनीं लीडिंग ऑथर



अपने चाचा डॉ. दीपक आचार्य के साथ गौतमी।
छिंदवाड़ा . अभी तक आमतौर पर पीएचडी शोधार्थी द्वारा ही शोधपत्र पढऩा देखने और सुनने में आया होगा, लेकिन छिंदवाड़ा की एक छात्रा ने बगैर पीएचडी शोधार्थी के ऐसा किया है। वह भी उस छात्रा ने अपना शोधपत्र किसी आम साइंस सेमिनार में नहीं बल्कि गुजरात साइंस कांग्रेस में पढ़कर पूरे जिले को गौरवान्वित किया है।
हम बात कर रहे हैं छिंदवाड़ा में पली-बढ़ी गौतमी आचार्य की। बीते वर्ष गौतमी ने विद्या भूमि पब्लिक स्कूल से बायोलॉजी विषय में हायर सेकंडरी प्रथम श्रेणी में पास किया और वर्तमान में गुजरात के अहमदाबाद में लाइफ साइंसेस विषय के साथ अहमदाबाद यूनिवर्सिटी से इंटीग्रेटेड एमएससी का कोर्स कर रही हैं। इस समय वे दूसरे सेमेस्टर में हैं।
पूरी तरह से रिसर्च से जुड़े इस पाठ्यक्रम में गौतमी का चयन राष्ट्रीय चयन प्रतिस्पर्धा से हुआ है। महज 18 वर्ष की आयु में इतने बड़े विज्ञान महोत्सव में गौतमी को वक्तव्य और अपने विषय इरिटेबल बाउल सिंड्रोम पर जानकारी देने का मौका मिला जो समस्त छिंदवाड़ा वासियों के लिए हर्ष और गौरव का विषय है। चार और पांच फरवरी को पंडित दीनदयाल पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी, गांधीनगर में आयोजित इस कांग्रेस के दौरान प्रकाशित जर्नल में गौतमी के रिसर्च पेपर को भी स्थान दिया गया है। जिसमें वे लीडिंग ऑथर हैं। सामान्यत: इस तरह के शोध प्रकाशन के लिए पीएचडी शोधार्थी होना जरूरी होता है लेकिन गौतमी के शोधकार्य को चयनित किया जाना बड़ी उपलब्धि है।

जिले को नई पहचान दिलाना है उद्देश्य
गौतमी के पिता विजय आचार्य छिंदवाड़ा जिले में शिक्षा विभाग से सम्बद्ध हैं और माता अनामिका आचार्य गृहिणी हैं। गौतमी वैज्ञानिक बनना चाहती है और अपना प्रेरणा स्रोत अपने चाचा डॉ. दीपक आचार्य को मानती हैं और उनके पदचिह्नों पर चलते हुए जिले को नई पहचान दिलाना चाहती है।

कुकिंग की शौकीन गौतमी
गौतमी को गाने सुनना, टीवी पर कुकिंग शो देखना, फैमिली के साथ ट्रेवल और दोस्तों के साथ गपशप करना बहुत पसंद है। ज्यादातर वक्तअपने लैपटॉप पर पढ़ाई लिखाई करते हुए गुजारती है।

2017-02-07, पत्रिका डॉट कॉम

सोमवार, 2 जनवरी 2017

शाबास शिवानी : रेसलर शिवानी के सफर की कुछ तस्वीरें


 एक साथ पढ़ी चारों खिलाड़ी गई थी तुर्की

मध्यप्रदेश मार्शल आर्ट कुश्ती अकादमी की चार पहलवान लड़कियों की खास बात यह है कि वे चारों एक साथ पढ़ी। एक ही कोच से प्रशिक्षण लिया। एक साथ स्कूल वर्ल्ड गेम्स के लिए भोपाल की तरफ से पहली बार क्वालिफाई किया। टर्की में जुलाई 2016 में हुई इस प्रतियोगिता में इन छात्राओं में से दो ने क्रमश:रजत एवं कांस्य पदक जीते थे। शिवानी पवार ने रजत पदक जीता तो रमन यादव ने कांस्य। दो अन्य ज्योति सरेआम एवं गेशू ने उम्दा प्रदर्शन किया था। शिवानी जूनियर नेशनल चैंपियनशिप में भी सिल्वर मेडल जीत चुकी हैं।

भारतीय टीम की फीमेल कोच भी रही हैं मोनिका 

कोच मोनिका चौधरी और साथी खिलाड़ियों के साथ शिवानी
चारों बालिका पहलवानों की कोच मोनिका चौधरी हैं। वह वर्ष 2007 से 2014 तक भारतीय महिला टीम की इकलौती फीमेल कोच भी रह चुकी हैं। उन्होंने नेशनल कुश्ती में सिल्वर मेडल भी जीता है। उनके द्वारा प्रशिक्षित खिलाड़ियों ने कई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पदक जीते हैं। साईं एकेडमी पंजाब में भी वह कोच रह चुकी हैं।



साथी खिलाड़ियों के साथ शिवानी पवार।
कोच और साथी खिलाड़ियों के साथ शिवानी।


शाबास शिवानी : हमारी छाेरियां भी नहीं हैं छोरों से कम...

छिंदवाड़ा .अगर आपने फिल्म दंगल देखी है तो अभिनेता आमिर खान द्वारा बेटियों के लिए कहा गया संवाद जरूर याद होगा। जिसमें चार बेटियों से निराश पिता की चेतना जागती है तो कहता है कि हमारी छोरियां क्या छोरों से कम हैं । फिल्म का यह डायलॉग वास्तविक रूप में अब लोगों को प्रेरित करने लगा है। हालांकि छिंदवाड़ा में ऐसे भी एक पिता हैं जिन्होंने बेटियों के रेसलिंग में जाने के मन को भा लिया और पूरा परिवार मिलकर उनका सपोर्ट कर रहा है।
दो बहनें अपने सपनों को पंख लगाने में जुट गई हैं। एक ने तो शुरुआत करते हुए प्रतिभा का लोहा भी मनवा दिया है। हम बात कर रहे हैं छिंदवाड़ा जिले के उमरेठ कस्बे की पहलवान शिवानी पवार की। जिनके पिता किसान हैं। कहते हैं कि हमारी बेटियां, बेटों से कम नहीं। शिवानी ने दसवीं तक की पढ़ाई उमरेठ से करने के बाद इन दिनों भोपाल के नूतन कॉलेज से बीए की पढ़ाई कर रही हैं। तुर्की में हुए स्कूल वल्र्ड गेम में उन्होंने सिल्वर मेडल जीता था।
ओलम्पिक में मेडल जीतने की चाह: शिवानी पवार
पहलवान शिवानी पवार
पहलवान बनने का सपना कब देखा।
बचपन में सिर्फ पढ़ाई करती थी।थोड़ी बड़ी होने के बाद समर कैम्प में फुटबाल खेला। फिर एथलेटिक्स। कुछ माह बाद रेसलिंग का ट्रायल दिया। उसमें सलेक्ट होने के बाद मध्यप्रदेश मार्शल आर्ट कुश्ती अकादमी में प्रवेश मिल गया।
कुश्ती की प्रैक्टिस के बारे में कुछ बताइए।
एमपी स्पोर्टस एकेडमी में कोच मोनिका चौधरी और साथी खिलाडिय़ों के साथ हम यहां अच्छी प्रैक्टिस करते हैं। पिछले कुछ सालों में सागर, रीवा और इंदौर में कई मेडल जीते हैं। जनवरी में पटना में आयोजित जूनियर नेशनल कॉम्पीटिशन में भी गोल्ड मेडल जीतने का लक्ष्य है। मेरी कोशिश है ओलम्पिक तक जाने की। साक्षी मलिक की तरह मुझे भी मेडल लेकर आना है।
अपनी कामयाबी के सफर में किसे खास मानती हो।
 मेरे परिवार से पिता नंदलाल पवार, माता पुष्पा पवार और दादाजी रघुनंदन पवार ने हमेशा मुझे सपोर्ट किया। मेरे मामा रवि पवार कोयला खदान में कर्मचारी है। वे बहुत हेल्प करते हैं। इसके अलावा कोच कलसराम मर्सकोले, कोच फातिमा बानो, मोनिका चौधरी, विनय प्रजापति का खास योगदान रहा है।
बहन रतिका भी कुश्ती में सक्रिय
शिवानी की छोटी बहन रितिका अभी कक्षा 10वीं में अध्ययनरत हंै। वह भी अपनी बड़ी बहन की तरह कुश्ती में ही कॅरियर बनाना चाहती है। शिवानी जहां पिछले तीन साल से कुश्ती में सहभागिता कर रही हैं, वहीं रितिका को एक साल हो गया है।

और भी लड़कियां कुश्ती में आए। क्या संदेश देना चाहेंगी।
मेरा मानना है कि लड़कियां हर काम कर सकती हैं। वे फिजिकली लड़कों से कमजोर होती है यह सोचना गलत है। वे हर जगह लड़कों से अच्छा प्रदर्शन करती है। पढ़ाई हो या खेल। इसलिए लड़कियों को भी पहलवानी जैसे गेम्स भी हाथ आजमाना चाहिए।

जब अपनी प्रतिद्वंद्वी को पहले पटकनी दी, फिर मरहम लगाया
पत्रिका छिंदवाड़ा, 2 जनवरी, 2017
पिछले दिनों सागर में आयोजित राज्यस्तरीय कुश्ती प्रतियोगिता में 48 किग्रा वर्ग के फाइनल मुकाबले में खेल भावना की मिसाल देखने को मिली। यह मुकाबला भोपाल की शिवानी पवार एवं जयारानी के बीच हुआ। शिवानी के जोरदार दांव से जया चित हो गईं। इस बीच जया को पेट के पास चोट लग गई। जब जया दर्द से कराह उठीं, तो उनकी मदद शिवानी ने ही की। शिवानी पांच मिनट तक जया की चोट को ठीक करने का प्रयास करती रहीं। खेल के मैदान में ऐसा नजारा कम ही देखने को मिलता है।
साभार : पत्रिका छिंदवाड़ा